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मुलायम के दिल में क्‍यों जागा ‘अमर’ प्रेम

कैश फॉर वोट कांड में जिस तरह नित नए खुलासे हो रहे हैं उसमें बड़े-बड़ों के दामन पर छींटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट की फटकार के बाद आखिकर तीन साल बाद दिल्ली पुलिस ने इस मामले में संजीव सक्सेना और सुहैल हिंदुस्तानी को गिरफ्तार किया है। संजीव और सुहैल से मिली जानकारी के बाद समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव राज्यसभा सांसद अमर सिंह से दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पूछताछ की। अमर सिंह से पूछताछ में के आधार पर धीरे-धीरे जांच का दायरा फैलता जा रहा है।

कैश फॉर वोट कांड में जिस तरह नित नए खुलासे हो रहे हैं उसमें बड़े-बड़ों के दामन पर छींटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट की फटकार के बाद आखिकर तीन साल बाद दिल्ली पुलिस ने इस मामले में संजीव सक्सेना और सुहैल हिंदुस्तानी को गिरफ्तार किया है। संजीव और सुहैल से मिली जानकारी के बाद समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव राज्यसभा सांसद अमर सिंह से दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पूछताछ की। अमर सिंह से पूछताछ में के आधार पर धीरे-धीरे जांच का दायरा फैलता जा रहा है।

सपा सांसद रेवती रमण सिंह और कांग्रेसी नेता अहमद पटेल का नाम भी सामने आ रहा है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह के दिल में अपनी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह के लिए एकाएक जागा प्रेम कुछ और ही संकेत करता है। क्योंकि राजनीति में हर बयान में गूढ़ अर्थ और स्वार्थ छिपा होता है,  ऐसे में मुलायम सिंह की मुख से अमर सिंह के लिए ‘मुलायम’ बातें सुनकर कुछ अटपटा लगना स्वाभाविक है। क्योंकि जो अमर सिंह सपा को मिटाने और मुलायम सिंह को उसकी औकात बताने की घुड़की और धमकी देता है उसकी तरफदारी किस मजबूरी और स्वार्थवश मुलायम सिंह कर रहे हैं। क्या सपा सांसद रेवती रमण सिंह को बचाने के लिए या फिर आगामी यूपी विधानसभा चुनावों में सपा की छवि साफ-सुथरी रखने की कवायद में मुलायम अमर सिंह की तरफदारी कर रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुलायम अमर के बहाने कांग्रेस को लपेटने के जुगाड़ में हैं। दाल में कुछ तो काला जरूर है क्योंकि मुलायम के अमर प्रेम के पीछे की कहानी में पेंच और राज से इनकार नहीं किया जा सकता। कोई खास वजह है तभी तो सियासी अखाड़े के पुराने धुरंधर मुलायम सिंह अपने धुर विरोधी के तरफदारी और हिमायत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि 22 जुलाई 2008 को तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आयोजित विश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए भाजपा के तीन सांसदों अशोक अर्गल, महावीर भगोरा और फग्गन सिंह कुलस्ते को खरीदने की कयावद शुरू की गई थी। पूर्व एसपी नेता अमर सिंह और कुछ कांग्रेसी नेताओं ने उससे 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत के समर्थन में वोट के लिए कुछ बीजेपी सांसदों से सौदा करने के लिए संपर्क किया था। अमर सिंह के पूर्व सहयोगी संजीव सक्सेना को कुछ सांसदों के यहां रुपये पहुंचाने का आरोप है। सांसदों ने आरोप लगाया था कि उन्हें तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा आयोजित विश्वास मत के दौरान गैरहाजिर रहने के लिए पैसे दिए गए थे। इस मामले में तीन साल के बाद भी दिल्ली पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। 15 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए पूछा कि अब तक किसी को हिरासत में लेकर पूछताछ क्यों नहीं की गई। कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने गजब की फुर्ती दिखाते हुये संजीव सक्सेना और सुहैल हिन्दुस्तानी को गिरफ्तार किया है, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे खिसक रही है राजनीतिक बयानबाजी और माहौल गर्माने लगा है।

पूरे प्रकरण में मुलायम की अमर सिंह की तरफदारी करना ये साफ तौर पर चुगली करता है कि दाल में कुछ काला है। मुलायम अमर सिंह से अपनी पुरानी दोस्ती का फर्ज नहीं निभा रहे हैं बल्कि राजनीतिक नफे-नुकसान और गुणा-भाग को ध्यान में रखकर ही वो अमर सिंह का पक्ष ले रहे हैं। सपा सांसद रेवती रमण सिंह का जांच में नाम आने की भनक लगते ही मुलायम ने अमर के तरफदारी शुरू कर दी। अमर के प्रति सहानुभूति दिखाकर मुलायम ने एक पत्थर से दो निशाने लगाये। मुलायम के बयान की आड़ में रेवती रमण सिंह को कुछ मदद तो मिलेगी ही लेकिन इससे बढ़कर मुलायम ने इस मामले में राजनीति घुसेड़कर राजनीतिक माहौल का श्रीगणेश कर दिया है। असल में मुलायम यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में विरोधियों खासकर कांग्रेस के हाथ कोई मुद्दा बैठै बैठाए थमाना नहीं चाहते हैं, और अगर सपा के दामन पर कीचड़ उछलता है तो उसका सीधा फायदा यूपी में कांग्रेस को ही मिलेगा। कांग्रेस को घेरने की नीयत से ही मुलायम ने अमर के पक्ष में बयानबाजी करके अपरोक्ष रूप से कांग्रेस आलाकमान और पीएम को कटघरे में खड़ा किया है।

मुलायम ने मीडिया के सामने कहा कि अमर सिंह के साथ अन्याय हो रहा है। उन्हें संकट में डालने की यह साजिश है और उन्हें मामले में फंसाया जा रहा है। मुलायम ने सवालिया लहजे में कहा कि हमें (सपा) क्या फायदा था? क्या समाजवादी पार्टी सरकार में शामिल हो रही थी? क्या हमें मंत्री पद मिल रहा था? मुलायम के सवाल चाहे कितने मासूम हो लेकिन उसके अर्थ और निहतार्थ बहुत ही गहरे हैं, कैश फॉर वोट का असल लाभ तो मनमोहन सिंह की सरकार को मिला था ना कि मुलायम सिंह को। पर्दे के पीछे का खेल अमर, मुलायम और कांग्र्रेस आलाकमान बखूबी जानता है। मुलायम ने सोची समझी रणनीति के तहत अमर सिंह के कंधे पर बंदूक रखकर कांग्रेस द्वारा यूपी में बुने जा रहे चुनावी घोंसले में सीधा निशाना साधा है, ये आना वाला वक्त ही बताएगा कि मुलायम का ‘अमर’  प्रेम और कांग्रेस पर निशाना कितना असरदार साबित होगा। लेकिन इस सारी बयानबाजी के बीच कोर्ट के आदेश के बाद तीन साल बाद खुली फाइल को शायद एक बार फिर ठंडे बस्ते में डालने की स्क्रिप्ट का प्रथम अध्याय मुलायम सिंह ने लिख दिया है।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ में स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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