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मुश्किल है भ्रष्‍टाचार एवं भ्रष्‍टों के साम्राज्‍य से छुटकारा

यह माना जाने लगा है कि जो शख्स भ्रष्टचरित्र है, उसे उपदेश की चाहे जितनी घुट्टी पिला दी जाए, अंतत: वह भ्रष्टाचार के रास्ते होकर ही गुजरेगा। स्थिति यह है कि भ्रष्टाचारियों से जिन लोगों ने ‘लोहा’ लेने का दुस्साहस किया, वे या तो मिटा दिए गए या फिर उन्हें झेलनी पड़ी जलालत! जब हर क्षेत्र में भ्रष्टाचारियों की फौज ‘मुस्तैद’ हो और उनके बीच पिस रहा हो आम आदमी, तो क्या ऐसी स्थिति में देश को भ्रष्टाचारमुक्त समाज मिल पाएगा? नासूर बन बैठी इस समस्या को ‘भस्म’ करने के लिए अन्ना हजारे ने जो ‘हवन’ शुरू किया है, उसमें सभी देशवासियों को मिलकर ‘आहुति’ डालनी चाहिए, और उन लोगों की ‘कुर्बानी’ को याद रखना चाहिए, जिन्होंने महाभ्रष्टों से टकराकर बलिदान दिया। हमें, उन्हें भी सहयोग देना होगा, जो व्यावहारिक रूप से आज भी महाभ्रष्टों से ‘लोहा’ ले रहे हैं। पहले उनकी बात, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में ‘शहीद’ हो गए।

यह माना जाने लगा है कि जो शख्स भ्रष्टचरित्र है, उसे उपदेश की चाहे जितनी घुट्टी पिला दी जाए, अंतत: वह भ्रष्टाचार के रास्ते होकर ही गुजरेगा। स्थिति यह है कि भ्रष्टाचारियों से जिन लोगों ने ‘लोहा’ लेने का दुस्साहस किया, वे या तो मिटा दिए गए या फिर उन्हें झेलनी पड़ी जलालत! जब हर क्षेत्र में भ्रष्टाचारियों की फौज ‘मुस्तैद’ हो और उनके बीच पिस रहा हो आम आदमी, तो क्या ऐसी स्थिति में देश को भ्रष्टाचारमुक्त समाज मिल पाएगा? नासूर बन बैठी इस समस्या को ‘भस्म’ करने के लिए अन्ना हजारे ने जो ‘हवन’ शुरू किया है, उसमें सभी देशवासियों को मिलकर ‘आहुति’ डालनी चाहिए, और उन लोगों की ‘कुर्बानी’ को याद रखना चाहिए, जिन्होंने महाभ्रष्टों से टकराकर बलिदान दिया। हमें, उन्हें भी सहयोग देना होगा, जो व्यावहारिक रूप से आज भी महाभ्रष्टों से ‘लोहा’ ले रहे हैं। पहले उनकी बात, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में ‘शहीद’ हो गए।

एक थे मंजुनाथ षणमुगम। लखनऊ से बिजनेस की पढ़ाई करने के बाद मंजुनाथ की तैनाती इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में बतौर सेल्स मैनेजर के पद पर हुई। 2005 में उन्होंने पेट्रोल में मिलावट का भंडाफोड़ किया। माफिया ने हर तरह से तोड़ने की कोशिश की और अंत में न झुकने वाले मंजुनाथ की हत्या कर दी गई। ठीक इसी तरह की मौत ईमानदार अमित जेठवा की हुई। जेठवा ने गुजरात के गिरवन में अवैध खनन को उजागर कर कई सफेदपोशों की पोल खोली थी। कई भाजपा नेता इसमें फंसे थे। बिहार के सत्येंद्र दुबे को तो आप जानते ही हैं। हाइवे में धांधली क्या उजागर की, उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा। अन्ना के सहयोगी सतीश शेट्टी इसलिए मारे गए कि उन्होंने ताले गांव जमीन घोटाले को उजागर किया। बेगुसराय के शशिधर मिश्र सरकारी योजनाओं में हो रहे भ्रष्टाचार का खुलासा कर अपनी जान गंवा बैठे।

– सबसे ज्यादा भ्रष्ट नौकरशाह हैं, जो नेताओं को ‘काली कमाई’ का मार्ग बताते है।
– खाकी वर्दी’ हर साल 22,200 करोड़ की अवैध वसूली करती है।
– देश में 33 लाख से ज्यादा एनजीओ। फंड लेकर भी 85 फीसदी काम नहीं करते।
– हर्षद मेहता कांड से घोटालों की जो लाइन लगी, वह आज तक जारी है।

मुंबई के मनमाड़ में कलेक्टर यशवंत को ‘तेल माफिया’ ने जिंदा ही जला डाला। हाल ही में भोपाल में आरटीआई एक्टिविस्ट शहला मसूद को दिन-दहाड़े गोली से उड़ा दिया। वह भी अवैध खनन के आंकड़े जमा कर रही थी। देश के कई सपूतों ने महाभ्रष्टों से लड़ते हुए जान गंवाई है, तो दर्जनों ‘सपूत’ आज भी ऐसे लोगों के लिए ‘खौफ’ बने हुए हैं। ऐसे जांबाजों के लिए अन्ना हजारे आदर्श बने हुए हैं। मुजफ्फरपुर के डॉ. सतीश पटेल भ्रष्ट नौकरशाहों से आज भी लोहा लेते नजर आ रहे हैं। उधर, झारखंड के दुर्गा उरांव से पूरा प्रशासन सहम रहा है। दुर्गा ने ही मधु कोड़ा समेत छह मंत्रियों को जेल भिजवाने में अहम भूमिका निभाई। इलाहाबाद के कमलेश सिंह, रांची के रंजीत राय, लखनऊ के सिपाही ब्रजेंद्र सिंह यादव, भागलपुर के अनिल कुमार सिंह और इलाहाबाद के आनंद मोहन ने सरकारी धन लुटेरों की सांसें थाम रखी हैं। आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब साढे़ पांच हजार ऐसे आईएएस हैं, जो लोकतांत्रिक सरकार को अपने तरीके से ‘हांक’ रहे हैं। ये लोग उन 15 हजार नौकरशाहों के ‘गुरु’ हैं, जो पुलिस, राजस्व, वन और राज्य सेवाओं में तैनात हैं।

महाभ्रष्टों से लड़ते इन्होंने दी कुर्बानी

– लखनऊ के मंजुनाथ षणमुगम
– गुजरात के अमित जेठवा
– बिहार के सत्येंद्र दुबे
– अन्ना के सहयोगी सतीश शेट्टी
– बेगुसराय के शशिधर मिश्र
– मुंबई के डीएम यशवंत
– भोपाल की शहला मसूद

‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ के अनुसार, देश में 80 फीसदी नौकरशाह भ्रष्ट हैं, जो अपनी जिम्मेदारी का वहन नहीं कर रहे। जाहिर है, जब ऊपर के अफसरों का ये हाल है, तो नीचे के कर्मचारी क्या करते होंगे? केंद्र और राज्य सरकारों में लगभग दो करोड़ कर्मचारी ऐसे हैं, जो अपने-अपने तरीके से ‘विभागीय व्यवस्था’ को चलाने की ‘कूबत’ रखते हैं।

खाकी वर्दी का भ्रष्टाचार : कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस पुलिस पर नाज करना चाहिए, वह भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबी हुई है। ऐसे में आम आदमी करे तो क्या करे? पैसा ही पुलिस के लिए ‘सब कुछ’ हो गया है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल ‘खाकी वर्दी’ देश भर में 22,200 करोड़ रुपयों की अवैध वसूली करती है। हैरतअंगेज यह है कि 214 करोड़ रुपये तो गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों से ही वसूले जाते हैं! पुलिस की लूट और इस महकमे में जारी भ्रष्टाचार को देखते हुए ही इसे ‘लाइसेंसधारी गुंडा’ की संज्ञा दी गई है। एक बार दुख जताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण भल्ला ने 1967 में कहा भी था कि ‘उत्तर प्रदेश पुलिस के दामन पर ‘दाग ही दाग’ हैं। आमतौर पर उसकी छवि जनता के खिलाफ ‘बर्बर गिरोह’ के रूप में उभरती है, जिसे वर्दी की आड़ में कुछ भी करने की आजादी है।’

देश के लुटेरे एनजीओ : इसमें कोई दो राय नहीं कि विकास और कल्याण के नाम पर सरकार की ओर से गैर-सरकारी संस्थाओं को अरबों रुपये का फंड जारी किया जाता है। जनता के इस खजाने में ‘सेंध’ लगाने के लिए ‘कुकरमुत्तों’ की तरह उग आए ज्यादातर एनजीओ की ‘गिद्धदृष्टि’ इस फंड पर जमी रहती है। हालांकि कई एनजीओ ने अनुकरणीय उदाहरण भी पेश किए हैं, लेकिन कुल मिलाकर यही कहा जाएगा कि समाज सेवा के नाम पर लूट की होड़ मची हुई है। देश में 33 लाख से ज्यादा एनजीओ हैं, यानी कि 400 लोगों पर एक एनजीओ। 2003 में हुए एक सर्वे से पता चला कि 85 फीसदी एनजीओ काम ही नहीं करते। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और केरल में सबसे ज्यादा एनजीओ चल रहे हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना में एनजीओ को 18 हजार करोड़ रुपये जारी किए गए, इस राशि का कितना उपयोग सही तरीके से हुआ है, इसकी जांच की जा रही है।

घोटाले-दर-घोटाले : हालांकि आजादी के बाद से ही घोटाले और भ्रष्टाचार की शुरुआत हो गई थी, लेकिन 1991 के बाद इस प्रवृत्ति में तेजी आई। हर्षद मेहता कांड से घोटालों की जो लाइन लगी, वह आज तक जारी है। यहां हम कुछ उन बड़े घोटालों की बात कर रहे हैं, जिसने देश की राजनीति में उफान खड़ा कर दिया था। नौकरशाही के चार घोटालों ने देश को 2 लाख 646 करोड़ की चोट पहुंचाई। इनमें 2 लाख करोड़ का यूपी का अनाज घोटाला, 107 करोड़ का कर्नाटक आईएडीबी घोटाला, 225 करोड़ का सीआरपीएफ घोटाला और बिहार झारखंड का 314 करोड़ का फ्यूचर ट्रेडिंग घोटाला। इसी के साथ पांच कॉरपोरेट घोटालों ने लगाई 50 हजार 700 करोड़ की चपत। इसमें 14 हजार करोड़ का सत्यम घोटाला, 4 हजार करोड़ का शेयर घोटाला, 1200 करोड़ का सीआरबी घोटाला, 1500 करोड़ का सिक्युरिटी घोटाला और 30 हजार करोड़ का स्टांप घोटाला शामिल है।

इसके अलावा 2010 में एक लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्कैम, 1000 करोड़ का आदर्श घोटाला, 1000 करोड़ का सिक्किम में पीडीएस घोटाला, 600 करोड़ का कर्नाटक में जमीन घोटाला और 318 करोड़ के कॉमनवेल्थ खेल घोटाले हुए। इन्हीं दो दशकों में 950 करोड़ का लालू का चारा घोटाला, करीब 4 करोड़ का सुखराम से जुड़ा टेलीकॉम घोटाला, करोड़ों का जयललिता संपत्ति घोटाला, साढ़े तीन करोड़ का नरसिम्हा राव घूसकांड और एक लाख का बंगारू लक्ष्मण घूसकांड सामने आया। जाहिर है, इन घोटालों में देश के दिग्गज नेताओं के दामन पर भी दाग लगे। इसी दौर में सेना भी दागदार हुई। सेना में भी कई तरह के घपले सामने आए और इस तरह से 4 हजार करोड़ की राशि की लूट हुई। न्यायपालिका से जुड़े लोग भी दागदार हुए। जस्टिस बी रामास्वामी, जस्टिस शमित मुखर्जी, जस्टिस सौमित्र सेन, जस्टिस पीडी दीनाकरण और जस्टिस निर्मल यादव पर अवैध रूप से धन कमाने के मामले दर्ज हुए।

महाभ्रष्टों से ये ले रहे हैं ‘लोहा’
– महाराष्ट्र के अन्ना हजारे
– मुजफ्फरपुर के डॉ. सतीश पटेल
– झारखंड के दुर्गा उरांव और रंजीत
– इलाहाबाद के कमलेश और आनंद मोहन
– लखनऊ के ब्रजेंद्र सिंह यादव
– भागलपुर के अनिल कुमार सिंह

नेताओं के ‘कमाऊ पूत’ नौकरशाह : सीबीआई कहती है कि हर साल देश के 315 अरब रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते हैं। 2010 में 110 आईएएस और 105 आईपीएस पर आपराधिक और आर्थिक मामले दर्ज हुए। मजे की बात तो यह है कि ये सारे लोग अभी भी काम कर रहे हैं। ‘कुर्सीतंत्र’ का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है? सतर्कता विभाग के मुताबिक, 2006 से 2010 तक बिहार में करीब 365 सरकारी कर्मचारियों के यहां छापे मारे गए, जिनमें 300 कर्मचारी करोड़पति पाए गए। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह कहते हैं कि ‘देश में करीब दो करोड़ सरकारी कर्मचारी और 5300 नेता हैं। इनमें सबसे ज्यादा नौकरशाह भ्रष्ट हैं। नौकरशाह नेताओं के लिए ‘कमाऊ पूत’ हैं। यही लोग उन्हें ‘काली कमाई’ का जरिया बताते हैं। यही वजह है कि सरकारें बदलती हैं, मंत्री भी बदल जाते हैं, लेकिन नौकरशाह वहीं के वहीं जमे रहते हैं।

जरा सोचिए…? : आज तक घोटालों के कई मामलों में दोषी होने के बावजूद कोई भी आदमी सजा नहीं पा सका। कुछ लोगों को जेल के भीतर कुछ समय के लिए भेजा भी गया, तो ‘वीआईपी’ बनाकर। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन पैसों की लूट की गई, क्या वे पैसे वापस सरकारी कोष में आए? किसी नेता ने वह धन लौटाया? किसी नौकरशाह ने लूटे धन को वापस किया? किसी कॉरपोरेट घराने ने घोटाले की राशि वापस की?

अखिलेश अखिल

अभी तक एक भी ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं है, और जब ऐसा नहीं हो सकता, तब ये तमाम कायदे-कानून बेकार हैं। यह जनता के धन की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं, फिर किस आधार पर सरकार कह रही है कि नक्सलियों ने देश को तबाह कर रखा है? नक्सली तो संसदीय व्यवस्था के विरोध में काम कर रहे हैं और ये लोग संसदीय व्यवस्था में रहकर लूट रहे हैं। अब तो जनता को ही निर्णय करना है कि देश का असली नक्सली कौन लोग हैं, जो हमें तहस-नहस कर रहे हैं?

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के निवासी हैं. पटना-दिल्ली समेत कई जगहों पर कई मीडिया हाउसों के साथ कार्यरत रहे. इन दिनों हमवतन से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख हमवतन में प्रकाशित हो चुका है. मिशनरी पत्रकारिता के पक्षधर अखिलेश अखिल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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