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मूल निवासी आंदोलन की चुनौतियां

दलित आंदोलन के बाद भारत में मूलनिवासी आंदोलन की सुगबुगाहट हो चली है। इस आंदोलन में दो प्रकार के लोग जुड़े हुए है, पहला वे लोग जो दलित आंदोलन से जुड़े थे, इन्हें अब लगता है कि दलित आंदोलन का दायरा बड़ा किया जाना चाहिए एवं दूसरे वे लोग जो पिछड़ी जातियों से हैं तथा ये समझते हैं कि वे अनार्य है एवं आर्यों ने उनका शोषण किया है। यहां पर मै बताना चाहूंगा कि अभी आदिवासी इस आंदोलन से नहीं जुड़ पाया है। भले ही मूलनिवासी आंदोलन के लोग इन्हें मूलनिवासियों का ही अंग मानते हों। मूलनिवासी आंदोलन की पृष्ठभूमि में मनुवादियों द्वारा मुसलमानों-ईसाइयों को विदेशी बताकर खदेड़े जाने की साजिश की कलई खोलना इनके लक्ष्यों में शामिल है। यह सिध्दांत यह बतलाता है कि भारत के मुसलमान एवं इसाई विदेशी नहीं बल्कि यहां के ही दबे कुचले तबके के मूलनिवासी लोग हैं। जिन्होंने प्रताड़नाओं से तंग आकर अन्य धर्म ग्रहण कर लिया। जबकि वास्तविक विदेशी लोग यहां के सवर्ण है, जो अपने आपको आर्य कहकर गौरवांवित होते हैं।

दलित आंदोलन के बाद भारत में मूलनिवासी आंदोलन की सुगबुगाहट हो चली है। इस आंदोलन में दो प्रकार के लोग जुड़े हुए है, पहला वे लोग जो दलित आंदोलन से जुड़े थे, इन्हें अब लगता है कि दलित आंदोलन का दायरा बड़ा किया जाना चाहिए एवं दूसरे वे लोग जो पिछड़ी जातियों से हैं तथा ये समझते हैं कि वे अनार्य है एवं आर्यों ने उनका शोषण किया है। यहां पर मै बताना चाहूंगा कि अभी आदिवासी इस आंदोलन से नहीं जुड़ पाया है। भले ही मूलनिवासी आंदोलन के लोग इन्हें मूलनिवासियों का ही अंग मानते हों। मूलनिवासी आंदोलन की पृष्ठभूमि में मनुवादियों द्वारा मुसलमानों-ईसाइयों को विदेशी बताकर खदेड़े जाने की साजिश की कलई खोलना इनके लक्ष्यों में शामिल है। यह सिध्दांत यह बतलाता है कि भारत के मुसलमान एवं इसाई विदेशी नहीं बल्कि यहां के ही दबे कुचले तबके के मूलनिवासी लोग हैं। जिन्होंने प्रताड़नाओं से तंग आकर अन्य धर्म ग्रहण कर लिया। जबकि वास्तविक विदेशी लोग यहां के सवर्ण है, जो अपने आपको आर्य कहकर गौरवांवित होते हैं।

दरअसल मूलनिवासी सिध्दांत की पैदाइश डा. अम्बेडकर की किताब ‘शूद्र कौन थे?’ एवं ‘अछूत कौन और कैसे?’ में प्रतिपादित किये गये सिध्दांत पर हुई है। जिसमें डा. अम्बेडकर स्पष्ट संदर्भों के हवाले से बताते हैं कि आर्य विदेसी जाति है, जिन्होंने भारत आकर अनार्यों (भारत के मूलनिवासी) को युध्द में हराया और अपना गुलाम बना दिया। इस प्रकार ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्‍य आर्य हैं, और दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग अनार्य है। यह बात भारत के परिप्रेक्षय में बिल्कुल सही है। लेकिन मूल निवासी सिध्दांत एवं उनके पैरोकरों द्वारा इस पर स्पष्ट सिध्दांत के प्रतिपादन की अपेक्षा है। जैसा कि वैज्ञानिक तथ्य है कि संसार में मानव कि उत्पत्ति फ्रीका में हुई। भूगर्भ वैज्ञानिक के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप किसी समय फ्रीका का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। बाद में यही टुकड़ा एशिया महाद्वीप से आकर जुड़ गया एवं भारतीय प्रायद्वीप कहलाया। यह घटना अमूमन लाख साल पहले की रही होगी। लेकिन मानव का विकास 5.4 लाख वर्ष पूर्व पिथिकेन्थ्रोपस, हायडेलबर्ग मानव के रूप में प्रारंभ हुआ माना जाता है। इसी विकास क्रम में मानव अफ्रीका से संसार के तमाम द्वीपों एवं महाद्वीपों में पहुंचते गये। प्रत्येक महाद्वीपों में ये मानव दो से तीन लाख वर्षों से निवास कर रहे हैं। इस प्रकार मनुष्य की चार मुख्य प्रजातियां विकसित हुईं अफ्रीकन, मंगोलियन, नौर्डिक एवं आर्यन। भारत के मूल निवासी इसी आफ्रिकी नस्ल के वंशज हैं।

अब यहां पर प्रश्‍न खड़ा होता है कि मूल निवासी होने के आधार क्या होंगे- यहां पर मुझे दो संभावनाएं दिखती है-

1.  भारतीय प्रायद्वीप अफ्रीका का अंश था। इसलिए भारत के अफ्रीकी प्रजाति के लोग मूल निवासी कहलाने का हक रखते हैं। या

2.  विदेशी आर्यों से युध्द में हारे हुऐ अनार्य लोग पहले से भारत के निवासी हैं, इसी आधार पर वे भारत के मूल निवासी कहलाने का हक रखते हैं।

दरअसल मूलनिवासी सिध्दांत के मामले में इन पेचिदगियों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण रहा होगा कि डा. अम्बेडकर ने अनार्यों को मूल निवासी तो माना, लेकिन मूल निवासी जैसी किसी आंदोलन कि संभावना पर जोर नहीं दिया। मूलनिवासी आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत के वास्तविक मूलनिवासी दूसरे राज्यों में बाहरी करार दिये जा रहे हैं। शायद यह मनुवादियों की चाल का एक हिस्सा है कि लगभग प्रत्येक राज्य में पचासों साल रहने के बावजूद दलित बहुजन उस राज्य द्वारा राजनीतिक सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया। क्योंकि दलित बहुजन लोग अपने स्थानीय टाईटल या सरनेम से शोभित होते है। जहां मिश्रा, शर्मा, ठाकुर, गुप्ता पूरे देश में एक सा मिलेगा। वहीं दूसरी ओर जाटव, बंजारे, समुंद्रे, केरकेटा जैसे दलित बहुजन सरनेम किसी स्थानीयता को प्रदर्शित करते हैं। इस मामले में दुखद पहलू यह है कि इस दलित बहुजन बहिस्करण में वहां का स्थानीय दलित बहुजन वर्ग भी मूक समर्थन करता है।

स्पष्ट है भारत जैसे बड़े भू-भाग में क्षेत्रीयवाद ने मूलनिवासी आंदोलन की जड़ें कमजोर करना शुरू कर दिया है, अब मूलनिवासी आंदोलन के लिए चुनौती यही है सबसे पहले इनसे कैसे निपटा जाय। जैसा कि मैं पहले चर्चा कर चुका हूं कि भारत में क्षेत्रीयवाद शुरू से हावी रहा है। अंग्रेज शासन के दौरान हुये सियासी संघर्ष के दौर में क्षेत्रीयवाद की जड़ें कुछ कमजोर हुई, लेकिन आजादी के बाद यह और बढ़ा है। यह भारत जैसे कम्युनल, धर्मान्ध देश में कोई आश्‍चर्य नहीं है। इस दौरान गरीब दलित बहुजन समाज के लोग अपने अपने मूल निवासी क्षेत्र को छोड़कर, जहां उनके पूर्वज सदियों से प्रताड़ित होते रहे है अन्य क्षेत्र में चले गये। ये वो लोग थे जिन्होंने बाबा साहब के इस सिध्दांत का पालन किया कि जातिगत प्रताड़नाओं का केन्द्र ग्रामीण क्षेत्र है। इसलिये दलित बहुजन को शहर की ओर आ जाना चाहिए। इस दौरान बहुत सारे दलित, बहुजन उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम की ओर पालायन करने लगे। ऐसा पालायन आज भी जारी है।

अब, जब भारत के अनन्य राज्यों में क्षेत्रीयवाद का प्रभाव बढ़ने लगा है और आम्ची मुंबई, आम्चा महाराष्ट्र, मेरा मध्यप्रदेश, मेरा पंजाब, सबले बढ़िया छत्तीसगढि़या, जय झारखण्डी आदि नारे बुलंद होने लगे। इन नारों के निशाने में सिर्फ और सिर्फ उस क्षेत्र विशेष के गैर राज्य-वासी दलित बहुजन समाज के मेहनत-कश लोग ही हैं। आज आम्ची मुंबई के झंडा बरदारों के द्वारा मेहनत कश यूपी-बिहारियों को खदेड़ना तथा टाटा, बिडला, अंबानी, अमिताभ बच्चन को रिझाना ही एक मात्र लक्ष्य बन कर रह गया है। ये कहानी सिर्फ महाराष्ट्र की नहीं बल्कि देश के सभी राज्यों की है। इस काम में स्थानीय प्रशासन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है क्योंकि प्रसाशन में इन्ही फासीवादियों का कब्जा है। दलित बहुजन आज किसी भी प्रदेश में मूलनिवासी होने का प्रमाण देने में अक्षम है। इसलिए प्रत्येक प्रदेश में गैर मूलनिवासी आर्य नहीं दलित बहुजन हैं जैसे महाराष्ट्र में प्रताड़ित यू.पी. बिहारी कोई और नहीं दलित बहुजन ही हैं। छत्तीसगढ़ में गैर मूल निवासी कोई और नहीं उड़ीसा और महाराष्ट्र के दलित हैं। ये हाल आसाम, बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु, आंध्रा सहित देश के पूरे राज्य में है। स्थानीय प्रसाशन पूरी तैयारी में है कि इन दलित बहुजनों को गैर मूल निवासी करार करके उनके मूल गांव में भेज दिया। गाय जहां वे पहले की तरह तेल पिरोये, घड़ा बनावे, मवेशी चराए, मैला उठावे या मरे जानवर फेंके, यानि दलित बहुजन अपने मूलवास (गांव) में भी शोषित है और नये वास में भी।

बावजूद इसके मूल निवासी आंदोलन अपने पथ पर अग्रसर है। यहां पर इन्हें देश के सभी दलित बहुजन को एक सूत्र में बांधने की भी जरूरत है। ताकि वे क्षेत्रीयवाद के षड़यंत्र का मुकाबला कर सके। इस प्रकार के क्षेत्रियवाद बहिस्कारण से मुकाबला करने के लिए दलित बहुजनों के पास दो रास्ते बचे है-

1.  वे सौ दो सौ साल पहले छोड़े हुए अपने गांव चले जाये। जहां जाति के दानव उनका इंतजार कर रहे हैं।

2. या वे संगठित होकर स्थानीय प्रशासन में अपना अधिकार जमा लें।

यहां पर मेरा उद्देश्‍य मूलनिवासी आंदोलन को ठेस पहुंचाना नहीं है बल्कि उसे मजबूती से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है, क्योंकि किसी भी आंदोलन की सफलता उसके मजबूत नींव पर टिकी होती है न की भावनाओं पर। इसलिए यह देखना होगा कि मूलनिवासी सिध्दान्त क्या अपने मजबूत नींव पर खड़ा हो रहा है? साथ-साथ यह भी देखना होगा कि जो लोग 5,000 वर्षों से रह रहे हैं उनका क्या होगा? क्या वे 5000 साल भारत में रहने के बाद भी इसे एवं इस देश के निवासियों को अपना पाये हैं? यदि हां तो इस प्रकार के किसी आंदोलन का औचित्य नहीं बनाता लेकिन यदि वे इस देश एवं इसके मूल निवासियों को अपनाने की स्थिति में अभी तक नहीं है तो अब मूलनिवासी को ये फैसला लेने का अधिकार बनता है कि वे विदेसियों के साथ विदेसियों जैसा व्यवहार करें।

लेखक संजीव खुदशाह रायपुर के रहने वाले हैं और पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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