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मेघा पाटेकर की गिरफ्तारी और लोकतंत्र का कारपोरेट के हाथों गिरवी हो जाना

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की जनक एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर की छिंदवाड़ा में जिस तरह गिरफ्तारी की गयी वह कमज़ोर होते लोकतंत्र एवं आम जनमानस से दूर होते सत्ता के शीर्ष की सच्ची तस्वीर है। यह इशारा करती है कि अब जल-जंगल-ज़मीन की लड़ाई में हर तरह के हथियारों का इस्तेमाल होगा और उन हथियारों का सबसे पहला शिकार उन्हें बनाया जाएगा जो आम जनता की हित की बात करेगा। मेधा पाटेकर की गिरफ्तारी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि कार्पोरेट से उलझना और उनकी महत्वाकांक्षा से टकराना मतलब जेल की चाहरदीवारी के पीछे क़ैद हो जाना।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की जनक एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर की छिंदवाड़ा में जिस तरह गिरफ्तारी की गयी वह कमज़ोर होते लोकतंत्र एवं आम जनमानस से दूर होते सत्ता के शीर्ष की सच्ची तस्वीर है। यह इशारा करती है कि अब जल-जंगल-ज़मीन की लड़ाई में हर तरह के हथियारों का इस्तेमाल होगा और उन हथियारों का सबसे पहला शिकार उन्हें बनाया जाएगा जो आम जनता की हित की बात करेगा। मेधा पाटेकर की गिरफ्तारी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि कार्पोरेट से उलझना और उनकी महत्वाकांक्षा से टकराना मतलब जेल की चाहरदीवारी के पीछे क़ैद हो जाना।

 

इंदौर में आज़ादी बचाओ आन्दोलन का राष्ट्रीय सम्मलेन में शामिल होने के बाद रविवार को मेधा पाटेकर छिंदवाड़ा में अर्चना भार्गव की दिवंगत माता की तेरहवीं में शामिल होने के लिए आई थी। पुलिस को इसकी सूचना पहले से ही थी कि मेधा पाटेकर तेरहवीं कार्यक्रम के उपरान्त छिंदवाडा में भू अधिग्रहण के खिलाफ धरना प्रदर्शन करेंगी इसलिए एहतियातन उन्हें स्टेशन पर ही नज़रबंद कर लिया गया, पर जैसे-तैसे मेधा एवं उनके साथी छापाखाना मोहल्ले तक पहुंच गये, इसी मोहल्ले में अर्चना भार्गव का घर भी है, पुलिस ने अर्चना को उनकी माँ की तेरहवीं के दिन ही गिरफ्तार कर ये साबित कर दिया कि उसकी नज़रों में संवेदना एवं भावनाओं का कोई सम्मान नही। बहरहाल मेधा जी ने भी दोपहर होते-होते यह एलान कर दिया कि वो कमलनाथ एवं अडानी पवार प्रोजेक्ट का विरोध करेंगी। मेधा के साथ सैकड़ों की संख्या में वो विस्थापित भी धरने पर बैठ गये जिनकी ज़मीन छिंदवाडा के उन प्रोजेक्ट के नाम पर अधिग्रहित कर ली गयी है, जिनके मालिक बीजेपी एवं कांग्रेस दोनों में पाए जाते हैं।

 

धरने पर बैठे विस्थापितों के दर्द का न तो सरकार बाबू को एहसास हुआ और न ही ‘कारपोरेट दैत्यों’ की सहयोगी स्थानीय पुलिस को। छिंदवाड़ा में प्रशासन ने धारा -१४४ लागू कर दी ताकि जल-जंगल और ज़मीन की लड़ाई लड़ रहे लोग मुट्ठी तान कर एक साथ विरोध न कर पाएं, फिर भी मेधा पाटेकर ने पूंजीपतियों के हाथ बिकी सरकार के पहरेदारों से बिना घबराए अनशन ज़ारी रखा। आजादी बचाओ आन्दोलन मध्य प्रदेश के संयोजक एवं पेशे से अधिवक्ता डी.के. प्रजापति ने हमसे बात करते हुए कहा कि एडिशनल एसपी विनीत जैन एवं सिटी मजिस्ट्रेट के.डी त्रिपाठी ने निहत्थे एवं लोकतांत्रिक रूप से धरने पर बैठे विस्थापितों एवं मेधा पाटेकर को ज़बरदस्ती खींचते हुए गाड़ियों में भरा एवं जेल ले गये। मेधा पाटेकर के साथ २१ अन्य लोगों को भी पुलिस ने धारा -१५१ के तहत गिरफ्तार किया है। !

 

नर्मदा बचाओ आन्दोलन के श्रीनिवास ने बताया कि जब गिरफ्तारी के बाबत हमने सिटी मजिस्ट्रेट को शिकायती पत्र सौंपना चाहा तो उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ‘शासन’ का दबाव है। इससे व्यथित होकर एनएपीएम दिल्ली में एमपी हाउस के सामने विरोध प्रदर्शन एवं चीफ जस्टिस जबलपुर हाई कोर्ट को पत्र लिखेंगे। छिंदवाडा में कमलनाथ एवं अडानी ग्रुप के कई पवार प्रोजेक्ट के लिए राज्य सरकार ने भूमि का अधिग्रहण किया था, जिसका प्रारंभ से ही विरोध प्रदर्शन हो रहा है इन सब को दरकिनार करते हुए सरकार ने एसकेएस ग्रुप को भी ज़मीन देने के लिए खुद को तैयार कर रही है। आम जनमानस के कड़े विरोध को देखते हुए तो सरकार को मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए वहीँ सरकार आग में घी डालने का कार्य कर रही है।

 

श्रीनिवास ने छिंदवाडा की तुलना छत्तीसगढ़ से करते हुए कहा कि जेल के भीतर से मेधा पाटेकर ने एक पत्र लिखा है जिसे प्रशासन बाहर नहीं आने दे रहा है। वहीँ देर रात तक स्थानीय पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की जेल गेट पर पुलिस से तीखी बहस भी हुई। धारा -१४४ का हवाला देकर लोगों को कहीं भी खड़े नहीं होने दिया जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे छिंदवाड़ा को बाकी के देश से अलग-थलग कर देने की साजिश रची जा रही है। इस पूरे मामले में राज्य की बीजेपी शासित शिवराज की सरकार का रुख पूरी तरह उनके पक्ष में है, जो आम जनता को पूरी तरह लूट लेना चाहते हैं। वहीँ मेधा पाटेकर की गिरफ्तारी  का विरोध कांग्रेसी इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि खुद कमलनाथ छिंदवाड़ा में कई ‘विकास कार्य ‘ अपने हाथों से कर रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में  सामाजिक आन्दोलन एवं विस्थापितों के हक के लिए लड़ने वाली मेधा पाटेकर के सामने ही लोकतंत्र और कानून दोनों को गिरवी रख सत्ता के लोभी आम जनता को कमज़ोर कर रहे हैं।

 

लेखक मोहम्‍मद अनस पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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