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मेरी किताबें सोची-समझी साज़िश के तहत हमेशा पीछे धकेली जाती रही हैं

: ‘‘छोटे मियां! ‘मज़ाक’ को न समझ अपने तथाकथित ‘नाम’ (शातिर) के सही अर्थ के खुलासे वाली मूर्खता क्यों!’’ : ‘पाखी’ का मई, 2012 का अंक देखा। अभी जितना पढ़ा, उस पर प्रतिक्रिया दे रहा हूं। दुख की भारतीय दर्शन में पड़ताल करते हुए आज की सामाजिक विडंबनाओं से जोड़ता संपादकीय विचारोत्तेजक है। अपूर्व जोशी की कितनी भी व्यस्तताएं हों, मगर उन्हें अपने चर्चित स्तंभ ‘मेरी बात’ के लिए समय निकालना चाहिए। काशी के अंतरंग को स्पष्ट करता साक्षात्कार अच्छा है। उनका कहना ठीक है कि लेखक को दुकानदार नहीं होना चाहिए, जो जेनुइन लेखक कभी हो भी नहीं सकता। लेकिन बहुत-सी विधाओं में लिखने की जहां तक बात है वह लेखक तभी लिखता है जब उसमें वैसा करने की क्षमता या प्रतिभा हो। प्रमुख विधा तो हर लेखक की एक ही होती है। जैसे कि काशी के ही महाकवि प्रसाद। राजेंद्र दानी की कहानी और अशोक कुमार पांडेय की कविताएं अच्छी लगीं। भारद्वाज के स्तंभ में भी कुछ नई जानकारियां हैं। मैं आमतौर से पत्र लिखने में आलस्य कर जाता हूं। इसे लिखने के मूल में दो विरोधी चीज़ें हैं। पहले अच्छी बात।

: ‘‘छोटे मियां! ‘मज़ाक’ को न समझ अपने तथाकथित ‘नाम’ (शातिर) के सही अर्थ के खुलासे वाली मूर्खता क्यों!’’ : ‘पाखी’ का मई, 2012 का अंक देखा। अभी जितना पढ़ा, उस पर प्रतिक्रिया दे रहा हूं। दुख की भारतीय दर्शन में पड़ताल करते हुए आज की सामाजिक विडंबनाओं से जोड़ता संपादकीय विचारोत्तेजक है। अपूर्व जोशी की कितनी भी व्यस्तताएं हों, मगर उन्हें अपने चर्चित स्तंभ ‘मेरी बात’ के लिए समय निकालना चाहिए। काशी के अंतरंग को स्पष्ट करता साक्षात्कार अच्छा है। उनका कहना ठीक है कि लेखक को दुकानदार नहीं होना चाहिए, जो जेनुइन लेखक कभी हो भी नहीं सकता। लेकिन बहुत-सी विधाओं में लिखने की जहां तक बात है वह लेखक तभी लिखता है जब उसमें वैसा करने की क्षमता या प्रतिभा हो। प्रमुख विधा तो हर लेखक की एक ही होती है। जैसे कि काशी के ही महाकवि प्रसाद। राजेंद्र दानी की कहानी और अशोक कुमार पांडेय की कविताएं अच्छी लगीं। भारद्वाज के स्तंभ में भी कुछ नई जानकारियां हैं। मैं आमतौर से पत्र लिखने में आलस्य कर जाता हूं। इसे लिखने के मूल में दो विरोधी चीज़ें हैं। पहले अच्छी बात।

इसी अंक में आपने साहित्य, समाज और पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष श्री नंदकिशोर नौटियाल का विद्वत्तापूर्ण अद्भुत आलेख मेरे गत वर्ष प्रकाशित और नामवर जी-नित्यानंद जी द्वारा लोकार्पित प्रबंधकाव्य ‘राधामाधव’ पर दिया है। उनके गहन आत्मीय विश्लेषण ने मुझे भीतर तक छू लिया। ‘राधामाधव’ पर लगातार चर्चाएं आ रही हैं, मगर यह पहला विस्तृत विश्लेषण है जिसमें नौटियाल जी ने काव्य में सर्वत्र व्याप्त राधा महाभाव को पकड़ने की सार्थक कोशिश की है। एक जगह उन्होंने यह सवाल उठाया है कि राधा का यह संशय स्वीकार्य नहीं लग रहा कि ‘‘मात्र 27 दिन के ही कृष्ण’’ ने कंस के भेजे राक्षस का लात मारकर प्राणांत कर दिया और ‘‘3 दिन के थे’’ तब दूध पिलाती किसी राक्षसी की छाती को अपने बाल-मसूढ़ों से भींचकर उसे मार डाला–ऐसा वीभत्स निर्मम भाव राधा के मन में कैसे उपज सकता था जबकि राधा ने भी तो बालिकापने की देहरी नहीं लांघी होगी! दरअसल, यह राधा के बालपने का संशय नहीं है। काव्य में सर्वत्र राधा का चिंतन व्याप्त है। चिंतन बाल्यावस्था में नहीं होता। वह परवर्ती अवस्थाओं में भूतकाल की स्थितियों, घटनाओं और स्मृतियों–बहुत सी स्वानुभूत और बहुत-सी मां-बाप, भाई-बंधु, सखी-सहेलियों से–सुनी-सुनाई बातों के आधार पर होता है। इसमें कल्पना का भी समुचित योगदान होगा। काव्य में यह स्पष्ट उल्लेख आया है कि बालपने में ही राधा ने अपनी मां से बालकृष्ण से संबंधित ऐसी बातें सुनी थीं जो उनके अवचेतन में स्थाई रूप से बस गईं। राधा का यह महाभाव कृष्ण के समग्र जीवन से निर्मित हो रहा है, इसलिए उनके चिंतन में बालपने में उन सुनी-सुनाई बातों का बिंब उभरना स्वाभाविक है। राधा जैसे महाभाव को इस उत्तर आधुनिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों से लबालब युग में पकड़ना एक तरह से असंभव ही है, इसे काव्य में ही प्रकाशित अपनी टिप्पणी में ‘श्रीराधा’ जैसे महान काव्य के रचयिता उड़िया के मूर्धन्य कवि श्री रमाकांत रथ स्पष्ट कर चुके हैं। यह रचनाकार भी तो इसी युग का है! इसीलिए पूतना के बांझ आदिवासी नारी होने की ‘पिपासित/अतृप्त ममता’ के कारण उसकी छाती से दूध के स्वयमेव बहने और कृष्ण को गोदी में उठाने के उपक्रम को देखते ही बालकृष्ण के रक्षार्थ आसपास तैनात नंदबाबा के किसी लठैत द्वारा उसके प्राणांत का ज़्यादा तार्किक बिंब राधा के चिंतन में आ सका। राधा का चिंतन कृष्ण को–भले ही वह तीन दिन के हों–एक आदिवासी स्त्री का हत्यारा नहीं दिखा सकता। तृणावर्त, अघासुर, बकासुर, केशी जैसे तथाकथित राक्षसों या प्राकतिक आपदाओं से निबटना और किशोरावस्था में ही सांड़ (वृषभासुर) को मारने पर कृष्ण से प्रायश्चित कराकर ‘राधाकुंड’ जैसे स्थान की कल्पना! मेरा ख़याल है कि नौटियाल जी कवि के संकट को अब समझ गये होंगे। उसे एक नहीं अनेक परस्पर विरोधी दिशाओं में सामंजस्य स्थापित करना था–कुछ इस तरह कि राधाभाव सर्वत्र नृत्य करता दिखे। अस्तु, इस महत्त्वपूर्ण आलेख के लिए नौटियाल जी के प्रति हार्दिक आभार।

अब पत्र लिखने के दूसरे और ख़राब कारण की ओर आता हूं जिसके मूल में वह शीलरहित ‘शातिरदास’ हैं जिन्हें अपनी ऐसी हरक़तों के कारण अर्श से फ़र्श पर धकेले जाने के बाद राजधानीवासी बने रहने का सुख प्रदान करने के लिए ही आपने ‘बुद्धत्व’ का भ्रम देते इस मासिक नियोजन की बैसाखी तो ज़रूर थमा दी, मगर उनके इस ‘शातिर’ मुखौटे को दूसरी ही क़िस्त में असली ‘पहचान’ वाला आईना नहीं दिखाना था कि नामवर की या मेरी ‘साहित्यिक समझ’ की जासूसी के चक्कर में तथाकथित साहित्यिक राजनीति की क्षुद्रताओं से अनजान पाठक की नज़र की पकड़ में भी वे आ जायें! आपका विशेष धन्यवाद कि, नौटियाल जी के उक्त विद्वत्तापूर्ण आलेख के साथ ‘पहचान’ करने-कराने को लालायित ‘शातिर’-डायरी के पन्ने को छाप देने वाली, आपकी यह विलक्षण कला ‘पाखी’ के आम पाठक को भी ‘शातिरदास’ के गुर्क़े के भीतर छुपे ‘मूर्खदास’ की झलक देने में समर्थ हो गई है। यह संबंधित टिप्पणी किसी नाटक में उपस्थित हुए किसी विदूषक के अनायास विरूपित मुखमंडल से निःसृत चुटकुले जैसी लगी जिसने मुझे खूब हंसाया। भले ही नामवर जी ने एकाधिक बार कहा हो, मगर मुझे सचमुच नहीं पता कि मैं जिस तरह लिख रहा हूं वह ‘वैसी ही प्रतिभा का विस्फोट है जैसा रवीन्द्रनाथ में हुआ था’। कहां साहित्य का नोबल पुरस्कार पाने वाले राजाभोग और कहां साहित्य का सबसे रद्दी पुरस्कार भी न पाने वाला गंगू तेली! याकि मेरे ‘भीतर आग है’! मैं स्वयं उसे मज़ाक समझ कर ही आनंदित होता रहा हूं, मगर याद रखिये कि ऋषि-मुनियों के मज़ाक में भी तत्व छुपा होता है, जिसे ज्ञानीजन ही समझ पाते हैं–मेरे जैसा अबोध नहीं!

इस तथ्य को तो सभी जानते हैं कि सोलह वर्ष पूर्व, दिल्ली आने से पहले साहित्य की विविध विधाओं में मेरी चालीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित थीं और यहां आने के बाद 25-30 नई-पुरानी किताबें और छपी हैं, जिनके दर्जन भर लोकार्पण समारोहों का 450 पृष्ठों का लेखा-जोखा ‘आलोचना का वाचिक’ के नाम से और मेरी किताबों में आईं 45 छोटी-बड़ी भूमिकाओं की 500 पृष्ठीय किताब ‘सृजन की भूमि’ नामवर जी ने अभी दो मास पूर्व उसी ‘आग’ का संकेत करते हुए लोकार्पित कीं, जिसकी आंच ‘शातिरदास’-नाम्नी कठपुतली के उस निर्देशक तक भी पहुंची जिसके सर्टिफिकेट की जगह किसी कूड़ेदान में ही हो सकती है। अगर सचमुच कोई रचनाकार है तो ‘आग’ तो उसमें होगी ही–थोड़ी-बहुत ‘शातिरदास’ में भी–भले ही उधार की हो। उसी का सहारा लेकर उन्हें समझ में आना चाहिए कि मेरी इस विकट रचनात्मक सक्रियता के कारण पुरस्कारों/सम्मानों की घृणित राजनीति में उलझे तथाकथित माफ़ियाओं की चिर्र होने लगी है और वे अपने क्षत-विक्षत लहूलुहान अंग छुपाते हुए राजधानी के बदबूदार जंगल में यहां से वहां, हैरान-परेशान भागते फिर रहे हैं। दुष्टों के साथ ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’ वाली शास्त्रीय उक्ति का स्मरण निराला, उग्र, फ़िराक, सनेही, हितैषी, नागार्जुन, भुवनेश्वर मुझे कराते रहे हैं। कबीर तो आदि गुरू हैं ही। और अगर प्रसाद, निराला या टैगोर की तरह मुझे भी–कविता को सर्वोपरि रखते हुए–सभी विधाएं आकर्षित करती हैं और विद्वानों की निग़ाह में मैं उनमें भी ठीक-ठाक लिख पाता हूं, तो ईष्र्या-द्वेष में धधक रहे ऐसे निकम्मे और ‘पैसिव’ महानुभावों के ‘कष्ट’ के निवारणार्थ मैं लिखना तो बंद नहीं कर सकता!

‘शातिरदास’ की सूचना के अनुसार शीघ्र ही मेरी कोई किताब ‘बीड़ी उद्योग’–जहां के वे ‘डेलीवेज’ वर्कर हैं–द्वारा सम्मानित की जाने वाली है। मैं गौरवान्वित हुआ, क्योंकि भूतकाल में इसी उद्योग ने अपने भीतर की आग से बीड़ी जलाने के कारण मुक्तिबोध को भी सम्मानित करने की कोशिश की थी, जिसके फलस्वरूप साहित्य की भारतीय या राज्यीय अकादमियों की योजनाबद्ध उपेक्षाओं के बावजूद, बाद में साहित्य के कालरूपी नैयायिक ने अपने माथे को तनिक झुकाते हुए उन्हें साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान प्रदान किया।

इन अकादमियों का दृश्य बड़ा शोचनीय है। आजकल इनके पुरस्कार या तो जोड़-तोड़, संपर्क, रसूख़ इत्यादि के बल पर मिलते हैं या गोरखपुर के महंत की कृपा-कोर से, क्योंकि उन्हें देने वाले विद्वानों का ध्यान उत्कृष्ट की ओर नहीं, अपने कवि से संपादक से लेक्चरर से प्रोफेसर से विभागाध्यक्ष से होते हुए, अकादेमी के संयोजक से उपाध्यक्ष से अध्यक्ष तक की कुर्सी के लिए, राजधानी के सभी माफ़ियाओं से लेकर पूरब से पश्चिम से उत्तर से दक्खिन तक, समर्थन जुटाने की कवायद में ही लगा रहता है। इसलिए मैं ऐसी जगहों से सम्मानित होने की कोई झूठी खुशफ़हमी नहीं पालता। इसीलिए बिना किसी जोड़-तोड़ के जो एकाध पुरस्कार मुझे मिले हैं उन्हें मैं अकादेमीयन पुरस्कारों से बेहतर क्यों न समझूं? मेरी किताबें सोची-समझी साज़िश के तहत हमेशा पीछे धकेली जाती रही हैं तो इसका मुझे कोई मलाल क्यों हो? वर्ष 1960 में पहली कविता छपी थी। 11-12 वर्ष की उम्र थी उस समय। तब से साहित्य की साधना में आधी सदी से अधिक वक़्त गुज़रा है। अब इन चीज़ों का मेरे ऊपर क्या असर होगा! ऐसे सम्मान, दो-तीन किताबों के बल पर ही मेरे बाद वाली पीढ़ी के जिन सर्जकों को ‘महाकवि’ की पदवी से विभूषित करा दिया गया हो, उन्हें ही शोभा देते हैं। मेरे काम का समुचित मूल्यांकन कभी न कभी होगा अवश्य, इसे भवभूति मुझे बता चुके हैं और मैं आश्वस्त हूं। धन्यवाद!

लेखक उद्भ्रांत से संपर्क 09818854678 के जरिए किया जा सकता है.

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