मैं दिल्ली हूं, कभी मुझे दिलवालों की नगरी कहा जाता था.. आज बलात्कारियों की नगरी बन गयी हूं मैं.. मेरी धरती कल भी पावन थी औऱ आज भी पावन है.. आज दूषित मैं नहीं वो लोग हैं जो बार बार मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं.. मेरा क्या कुसूर है.. मैंने तो नहीं कहा था कि मुझे राजधानी बनाओ। कभी गर्व था कि मैं हिन्दुस्तान की राजधानी हूं। पर आज अफसोस हो रहा है कि मैं क्यूं हूं..मैं किसी राज्य का छोटा सा गांव क्यूं नहीं। क्या मेरी गलती है कि मुझे मीडिया हब बनाया गया, क्या मेरी गलती है कि संसद भवन यहां है, क्या मेरी गलती है कि हर राज्य का चोर उचक्का.. मेरी छाती पर लाल बत्ती लगी एम्बेस्डर रौंदना चाहता है। आखिर मेरा क्या कसूर.. मुझे बदनाम मत करो, मैं आपके हांथ पांव नहीं जोड़ सकती, मेरे हाथ होते तो क्या वो लोग उस लड़की के साथ बलात्कार कर पाते.. मैं देखती रही औऱ वो मेरी आंखों के सामने उसकी इज्जत तार तार करते रहे.. तब मैं भी रो रही थी.. उन्होंने मेरी ही गोद में तो फेंका था उसे।
मैं उसके खून से सने बदन को साफ भी नहीं कर सकी, एक दुपट्टा भी उसके वक्ष स्थल पर न डाल सकी.. क्या करती मेरे पास हाथ जो नहीं हैं। होते तो उन दरिंदों का वहीं संहार न कर देती, उनकी आंखें न निकला लेती जब उन्होंने उन नापाक नजरों से उसकी तरफ देखा था। अफसोस इस बात का नहीं कि आप मुझे बदनाम कर रहे हैं अफसोस इस बात का है कि आपके पास तो हाथ औऱ पांव थे तब आप क्यों विकलांग बने रहे…सोचिए औऱ समझिये आखिर मेरा क्या कुसूर है औऱ अगर आपको लगता है कि कुसूरवार मैं हूं तो..आप जी भर के दीजिए मुझे गालियां.।
लेखक हेमंत कुमार मिश्र न्यूज ट्रस्ट आफ इंडिया में सीनियर प्रोड्रयूसर हैं.


