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यमन में क्रान्ति की नेता है बत्तीस साल की उम्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाली पत्रकार

इस साल का जगजीवन राम स्मारक व्याख्यान यमन में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई के आन्दोलन की नेता तवक्कुल कारमान देंगी. कारमान हमारे समय की बहुत बड़ी क्रान्तिकारी नेता हैं.  २०११ में कारमान को ३२ साल की उम्र में नोबेल शान्ति पुरस्कार दे दिया गया था. पिछले साल जब उन्हें नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला तो उनके मुल्क यमन के लोग आश्चर्य चकित रह गए थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यमन जैसे छोटे मुल्क के इंसान को यह पुरस्कार मिल सकता था. लेकिन पुरस्कार मिल चुका था और नोबेल शान्ति पुरस्कार कमेटी ने अपना मंसूबा सारी दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिया था. यमन में तीस साल से चली आ रही तानाशाही को ख़त्म करने के लिए शुरू हुए आन्दोलन की नेता तवक्कुल कारमान के अपने देश के लोग उन्हें क्रान्ति की माँ कहते हैं और यमन के तानाशाह अली अब्दुल्ला सालेह उनका नाम सुनकर कांप उठते हैं.

इस साल का जगजीवन राम स्मारक व्याख्यान यमन में सत्ता परिवर्तन की लड़ाई के आन्दोलन की नेता तवक्कुल कारमान देंगी. कारमान हमारे समय की बहुत बड़ी क्रान्तिकारी नेता हैं.  २०११ में कारमान को ३२ साल की उम्र में नोबेल शान्ति पुरस्कार दे दिया गया था. पिछले साल जब उन्हें नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला तो उनके मुल्क यमन के लोग आश्चर्य चकित रह गए थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यमन जैसे छोटे मुल्क के इंसान को यह पुरस्कार मिल सकता था. लेकिन पुरस्कार मिल चुका था और नोबेल शान्ति पुरस्कार कमेटी ने अपना मंसूबा सारी दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिया था. यमन में तीस साल से चली आ रही तानाशाही को ख़त्म करने के लिए शुरू हुए आन्दोलन की नेता तवक्कुल कारमान के अपने देश के लोग उन्हें क्रान्ति की माँ कहते हैं और यमन के तानाशाह अली अब्दुल्ला सालेह उनका नाम सुनकर कांप उठते हैं.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भारतीय परिषद् के निमंत्रण पर आजकल अरब की नई क्रान्ति के अगले दस्ते की सबसे अहम नेता तवक्कुल कारमान दिल्ली में हैं. आगरा हो आई हैं. पेशे से पत्रकार तवक्कुल कारमान को अरब देशों में एक क्रांतिकारी हिम्मतमाई के रूप में भी जानते हैं. सही बात है कि वह मदर करेज हैं.  यमन की राजधानी सना में लगातार चल रहे दमन चक्र के खिलाफ जो भी विरोध की हवा चल रही है उसमें तवक्कुल का योगदान बहुत ज्यादा है. इस शान्ति पुरस्कार के कारण यमन दुनिया के नक्शे में एक बार फिर अहम मुकाम पर आ गया है. यमन की सरकारी तानाशाही और बाकी दुनिया में उनके साथी तवक्कुल की अगुवाई में चल रहे आन्दोलन को आतंकवादी संघर्ष का नाम देते रहे हों लेकिन जब उसी आन्दोलन की नेता को शान्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार मिल गया है तो निहित स्वार्थों का अभियान ज़मींदोज़ हो गया है.

तवक्कुल कारमान अपने आपको यमन के उन नौजवानों का नेता बताती हैं जो तानाशाही के कारण समाज से अलग थलग पड़ गए हैं. हालांकि वे खुद इस्लाह पार्टी की सदस्य हैं. यह पार्टी मूलतः इस्लामी पार्टी है लेकिन तवक्कुल ने उस पार्टी में भी कुछ उदारवादी रुझान शामिल किया है. उनकी पार्टी के लोग उनके प्रभाव के कारण उनसे डरते हैं लेकिन वे कारमान के उदार रवैये एक विरोध करते हैं. यमन में छोटी छोटी बच्चियों की शादी कर दी जाती है लेकिन जब तवक्कुल ने एक कानून बनवाने की कोशिश की जिसके बाद १७ साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पर पाबंदी लग जाती तो उनकी पार्टी वालों ने ही उसका विरोध किया. तवक्क्कुल कारमान ने खुद कहा है कि अतिवादी मर्द उनका विरोध करते हैं. वे उन्हें इस्लाम विरोधी मानते हैं और उन पर आरोप लगाते हैं कि तवक्कुल की चले तो वे उनके घरों से औरतों को बाहर कर दें. तवक्कुल इसे अपने शेष नारायण सिंह काम की सफलता का पैमाना मानती हैं. यमन जैसे देश में लड़कियों की कहीं भी आवाज़ नहीं सुनायी देती और बहुत ही सख्त पर्दा प्रथा है, उस यमन में तवक्कुल कारमान के कारण आज हज़ारों लडकियां सरकार के खिलाफ निकाले जा रहे जुलूसों में बढ़ चढ़ कर शामिल हो रही हैं.

 

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनके लिखे अन्य लेख यहां क्लिक करके पाए-पढ़े जा सकते हैं…

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