लखनऊ। लस्त-पस्त। अस्त-व्यस्त। टुकड़ों में विभाजित। जमीनी स्तर से गायब। मुद्दाविहीन। अविश्वसनीय छवि। यूपी की प्रयोगशाला में फेल। सामूहिक नेतृत्व हवा-हवाई। दिग्गजों के बीच वर्चस्व की जंग। सबक सीखने में शर्माती। नेताओं के आपसी दांव-पेचों की कलह में फंसी। दिन-प्रतिदिन खोती जा रही अस्मिता। भ्रमित। भौंचक। भंवर में फंसी। आत्मघाती फैसलों से हो रहे नुकसान से बेखबर। कुल मिलाकर उप्र में भारतीय जनता पार्टी का यही चित्राकंन राजनीति के पटल पर बन गया है। धराशायी होने, जनता के बीच विश्वास खो चुके दिग्गज नेता ही अपने-अपने गुट बना कर पार्टी की लुटियां डुबो रहे हैं। उमा भारती, विनय कटियार, सूर्य प्रताप शाही, ओम प्रकाश सिंह, संतोष गंगवार, प्रेमलता कटियार का एक गुट पार्टी में पिछड़ों अतिपिछड़ों का गुट बनाए हुए है। राजनाथ सिंह, सत्यदेव सिंह ठाकुर लाबी को बगल में दबाए हैं तो मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, केसरीनाथ त्रिपाठी, लालजी टंडन अगड़ों-पंडितों को लेकर अलग खिचड़ी पका रहे हैं। प्रदेश के इन बड़े नेताओं के गुट गांव स्तर तक फैले हुए हैं। अनुशासन तार-तार। नीतियां ताक पर। भय, भूख मिटाने का नारा देने वाली पार्टी में नेता ही एक दूसरे को भयभीत कर रहे हैं। वर्चस्व की भूख बढ़ाते जा रहे हैं। रही-सही कसर पूरी कर देते है केन्द्र में बैठे आडवाणी, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, मुख्तार अब्बास नकवी, अरूण जेटली, सुषमा स्वराज जैसे नेता। इनके भी इस प्रदेश में अलग गुट हैं।
उत्तर प्रदेश में बीमार चल रही भारतीय जनता पार्टी का इलाज करने वाले उसे उठा कर खड़ा करने वाले नेताओं के बीच आपस में जिस कदर गुटबाजी और एक दूसरे के रास्तों में कांटे बिछा देने की प्रवृत्ति कम होने के बजाय और बढ़ गयी है, उससे पूरी पार्टी गुटों में बटी हुई है रोज एक नया गुट अस्तित्व में आ रहा है। बडे़ स्तर पर चल रही इस महाभारत की वजह से वोटर तो दूर हुआ ही संगठन की दूसरी तीसरी पंक्ति के नेता संगठन से दूरियां बनाने लगे हैं। भाजपा की इस बीमारी का इलाज न तो आरएसएस ढूंढ पा रहा है और न ही सहयोगी संगठन जान फूंक पा रहे हैं। विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पस्त होने के बाद यह रार और गहरी हो गयी है। पार्टी अगड़ों और पिछड़ों के बीच दो भागों में बंटी हुई है। फिलहाल तो पार्टी के अंदर पिछड़ों की झूम रही है और अगड़े इनसे आगे निकलने के लिए बड़ी रेखा खींचने के बजाय पिछड़ों को पीछे धकेलने में में लगे हुए है। केन्द्रीय नेतृत्व असहाय होकर इस राज्य में कभी व्यापक जनाधार वाली पार्टी को मिट्टी में मिलने के बाद अब गड्ढे में दफन होते टुकुर-टुकुर देख रहे हैं। खास बात यह है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी इस दुर्दशा के लिए स्पष्ट जिम्मेदार दिख रहे हैं। अब तो यहां एक गडकरी गुट भी तैयार हो गया है। ऊपर से दम्भ यह भी है कि निकाय चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी आगे निकलने का ख्याली पुलाव भी पका रही है।
उ.प्र भाजपा की जान रहा है। पार्टी को सबसे ज्यादा यहीं से आक्सीजन मिली। राम मंदिर मुद्दे ने तो इस पार्टी को खड़ा ही कर दिया था। आनुषांगिक संगठन आरएसएस, विहिप, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी आदि ने यहीं के अयोध्या से ऊर्जा पाई। काशी, मथुरा के नारों ने यहीं जन्म लिया। जनता ने केन्द्र में भी मौका दिया और राज्य में भी सरकारें बनवाई। आखिर कार उम्मीदें टूटी। किसी भी वादे पर पार्टी खरी नहीं उतर पाई। अटल बिहारी बाजपेई को भी यहीं से जिताया गया। पार्टी के सारे प्रयोग सफल बनाये गये मगर जुडे़ लोगों को निराशा हाथ लगी। विधानसभा चुनाव 2012 में तो पार्टी रसातल में चली गयी। चुनाव के पहले संसदीय बोर्ड, प्रदेश कमेटी के साथ खुद नितिन गडकरी ने टिकट बांटने से लेकर चुनाव लड़ाने तक ताकत झोंकी। इसी बीच राजनाथ सिंह व कलराज मिश्र ने पूरे प्रदेश में दौरे किये कुछ माहौल बना लेकिन विनय कटियार, गडकरी और शाही की तिकड़ी ने बसपा के दागियों को पार्टी में लेकर चौपट कर दिया। यहां ये भी उल्लेखनीय रहेगा कि राम मंदिर के हीरो रहे कल्याण सिंह ने सबसे पहले पार्टी में सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला देकर अगड़ों के मुकाबले पिछड़ों की राजनीति को परवान चढ़ाया। कलह यहीं से शुरू हुयी थी। बाकी इतिहास सबकों पता है। 2012 में इसी तिकड़ी ने फिर पिछड़ों को आगे करने का फार्मूला लागू किया। 125 टिकट दिये गये। उमा भारती को इस तरह स्टार बनाया गया जैसे वह आसमान से उतारी गयी हो। अन्ततोगत्वा कुछ नहीं कर पायीं। पार्टी 2007 का प्रदर्शन भी नहीं दोहरा पाई। पिछडे़ दिग्गज ओमप्रकाश सिंह, शाही, प्रेमलता कटियार और उनके तमाम सिपहसालार बुरी तरह पराजित हुए।
राजनाथ सिंह : स्कूल मास्टर से आरएसएस के रास्ते पार्टी में आने वाले राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री रहे। इसी दौरान प्रदेश में ठाकुरवाद जोरों से पनपा। कल्याण सिंह और पिछड़ों की नहीं चली तो गुट बनाकर पार्टी को हरवाया गया। राजनाथ सिंह केन्द्र में चले गये। राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो उन्होंने खुद को गैर प्रदेशों में सक्रिय कर दिया। नमूने के तौर पर अर्जुन मुंडा को अपना चेला बना लिया। अब राजनाथ सिंह का खर्चा-पानी बस अर्जुन मुंडा के ही जिम्मे है। उन्होंने अपने क्षेत्र पूर्वांचल के बजाय दिल्ली से सटे गाजियाबाद से सांसद बनना ज्यादा मुफीद समझा और प्रदेश के बजाय दिल्ली में रहकर राजनीति में कायम हो गये। वह एक बार और राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते थे लेकिन नितिन गडकरी को नहीं रोक पाये। यूपी में अपने गुट को नितिन गडकरी के खिलाफ मोर्चे पर अब भी लगाए हुए हैं। हालांकि बतौर मुख्यमंत्री, सांसद, राष्ट्रीय अध्यक्ष, वरिष्ठ नेता उनके ऊपर कोई भी आर्थिक आरोप नहीं है। दामन पाक-साफ है। सज्जनता के प्रतीक माने जाते हैं लेकिन प्रादेशिक नेताओं के बीच कभी इस गुट पर वरदहस्त रख देते हैं तो कभी उस गुट को आर्शीवाद दे देते हैं। बिल्लियों की लड़ाई में ………..की भूमिका निभा रहे हैं।
मुरली मनोहर जोशी : अटल, आडवाणी की तिकड़ी में गिने जाने वाले जोशी जी सांस्कृतिक स्वभाव के नेता है। उत्तर प्रदेश ही उनकी कर्मभूमि है। यहां के प्रत्येक जनपद में उनके चाहने वाले अनुयायियों की लम्बी फेहरिस्त है। उन्हें भी यह दर्द सालता है कि प्रदेश में उनकी बहुत नहीं चलती। सामने तो नहीं लेकिन वह ब्राह्मण लाबी को प्रोटेक्ट करते रहते हैं उन्हें ऊर्जा देते हैं। वह ओखली के अंदर और चोट के बाहर रहने जैसी राजनीति करते हैं। चौपट होते देखते रहते हैं। एक टिप्पणी करके चुप हो जाते हैं प्रदेश की राजनीति से यही इनका सरोकार रहता है। हाईकमान में गिने जाते हैं लेकिन कहीं पर टांग नहीं फंसाते हैं जो की पार्टी के लिए घातक होता है।
नितिन गडकरी : 2012 में यूपी में पार्टी को पाताल में पहुंचाने के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार अगर इन महाशय को माना जाए तो अतिशयोक्ति कतई नहीं है बल्कि कड़वी सच्चाई है। महाराष्ट्र से संघ की मेहरबानी की बदौलत नेतृत्व संभालने वाले इस नेता ने अपनी जबानी बक-बक से पार्टी का सभ्य, सुंस्कृत, आचरण, व्यवहार सबसे पहले नष्ट किया। फिर जेटली, सुषमा, आडवाणी यहां तक कि नरेन्द्र मोदी से भी खुद को बड़ा दिखाने और बहुत बड़ा संगठक खुद को साबित करने के चक्कर में मनमानी शुरू कर दी। न जाने कौन सा सर्वे कराकर टिकट वितरण कराये। मोदी को भाव बताने के लिए उनके धुर, नापसंद संजय जोशी को कमान सौंप दी। खुद अश्लील सीडी विवादों में रहे जोशी भी गडकरी की ही तरह यूपी में प्रादेशिक नेताओं को ठेगें में रखे रहे। गडकरी ने विनय कटियार, शाही के कहने पर सांठगांठ करके बाबू सिंह कुशवाहा जैसे घोर दागी को पार्टी में लाकर तानाशाही दिखा दी। इन्होंने ने ही उमा भारती पर दांव लगाया साथ ही पिछड़ा कार्ड पर पूरा फोकस रखा। मुख्तार अब्बास नकवी को ऐन चुनाव के वक्त प्रदेश में लाकर बैठा दिया। इस कदर डिक्टेटर बन गये कि जो मन में आया वही किया। गडकरी जितना अपना गुट और पिछड़ों के गाडफादर बने अगड़ें उतने ही खफा होकर या तो शांत बैठ गये या फिर जड़ें खोदते रहे।
कलराज, केसरीनाथ, टंडन : कलराज मिश्र को आखिर राज्यसभा में नहीं लिया गया उनके न चाहने के बावजूद उन्हें विधानसभा का चुनाव लड़ाया गया। खैर वह जीत गये वर्ना तो गडकरी एंड कंपनी ने उन्हें कहीं का नहीं रखा था। कलराज मिश्र ऐसे नेता हैं जिनका 40 वर्ष से ज्यादा संघ और भाजपा में सक्रिय योगदान है। प्रदेश में ब्लाक स्तर तक जमीनी पकड़ है। अगड़ों के बीच एकलौते नेता माने जाते हैं। 2012 में भी उन्होंने पूरे प्रदेश में यात्रा करके माहौल बनाया था। जनता के बीच काफी विश्वास भाजपा के प्रति पैदा किया था लेकिन पिछड़ा लाबी ने बीच चुनाव में उन्हें शांत बैठने को मजबूर किया। कई वरिष्ठ भाजपाइयों का अब भी यह मानना है कि अगर केन्द्रीय नेतृत्व कलराज मिश्र को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके यूपी में चुनाव लड़वाता तो बहुत फायदा होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ अब कलराज मिश्र विधायक हैं और बड़े मजे से खुश रहने का कृत्रिम चोला ओढ़े हैं। केसरी नाथ त्रिपाठी भी ब्राह्मण नेताओं में शिष्ट और चिंतक के रूप में पार्टी जनों के बीच सम्मानित हैं आम आदमी भी इन्हें बेहतर मानता है। इन्हें पिछड़ा लाबी ने चुनाव हराकर और कुंठित कर दिया है। अमूमन त्रिपाठी जी टिप्पणी कम करते हैं लेकिन इस बार आहत होकर सलाह दे रहे हैं कि पार्टी आत्मावलोकन करे। इससे काफी हलचल पैदा हुई है। लालजी टंडन अटल जी की सीट पर सांसद है। इस बार वह अपने पुत्र की ही विधायक नहीं चुनवा पाए। इस झटके के लिए मन ही मन पार्टी के भीतरघातियों को जिम्मेदार मान रहे हैं। फिलहाल निष्क्रिय हैं।
विनय कटियार : राम मंदिर की उपज यह फायर ब्रांड नेता कभी कट्टर हिन्दुत्व को लेकर पार्टी के लिए लाभदायक थे। इसके बाद धीरे-धीरे इन्हें भी सर्वेसर्वा होने का इतना घमंड हो गया कि फिर तो मनमानी पर ही उतारू हो गये। जमीनी जनाधार की बात करें तो एक भाजपाई ने बताया कि विनय कटियार के मूल गांव कानपुर जनपद के बिल्हौर तहसील के दधिका गांव में गत चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को मात्र पांच वोट मिले हैं। सबसे बड़ा उदाहरण है अयोध्या की सीट पर 20 साल बाद भाजपा के लल्लू सिंह का हार जाना। विनय कटियार की जबान कब, कहां, किस विषय पर कहां आग उगल दे इसकी कोई गारंटी नहीं। पिछड़ा लाबी के अगुवा और उनके संरक्षक हैं। उमा भारती तक को ठेंगें में रखे हैं। मैनेजर इतने बड़े हैं कि सबको धता बताकर राज्य सभा में चले गये हैं। अगड़े नेताओं के साथ इनका पंगा कभी खत्म ही नहीं होता। चूंकि पार्टी कहीं न कहीं राम मंदिर मुद्दे को टेट में दबाए रखती है इसलिए उसकी मजबूरी है कि विनय कटियार जरूरी है। वर्ना तो पार्टी का मूल जनाधार चौपट करने और लोगों के मन में भाजपा के प्रति मोह भंग करने में इनका जितना हाथ है किसी का नहीं। खुद पीछे न रह जाए इसलिए चाहे वह योगी आदित्यनाथ हो अथवा वरूण गांधी इन दोनों ने जब भी हिन्दुत्व की बात की तो विनय कटियार ने राजनीतिक कुशलता के साथ इनको कुंठित कर दिया।
अब उमा भारती खलने लगी : साध्वी उमा भारती को पार्टी मे लाने का हल्का सा विरोध करने वाले विनय कटियार और उनकी पिछड़ा लाबी को उमा भारती का बढ़ता वर्चस्व अब खलने लगा है निश्चित तौर पर उमा भारती के प्रयासों से पार्टी को लोध वोटों का काफी प्रतिशत फायदा हुआ है। अब विनय कटियार और उनके गुट को खतरा महसूस हो रहा है। एक भाजपा नेता ने बताया कि विनय कटियार गुट की कोशिश है कि वर्ष 2013 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में मदद करने के लिए फिर मध्य प्रदेश धकेल दिया जाए। यह समझाया जा रहा है कि टीकमगढ़ की मूल निवासी उमा भारती छतरपुर की मल्हारा सीट से लेकर पन्ना सीधी तक करीब 40 सीटों पर बहुत प्रभावी होंगी। वहां के पिछड़ा वर्ग में उनका जबर्दस्त प्रभाव है। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी जानते हैं कि उमा भारती लाबी उन्हें तभी नुकसान नहीं पहुंचाएगी जब साध्वी खुद यहां चुनाव कमान संभालेगी। साध्वी को यही सब समझा रहे हैं कि आप तो अखिल भारतीय नेता हैं इसलिए मप्र मे नैय्या पार लगानी है। कोई बड़ी बात नहीं है कि साध्वी यूपी की इस किचकिच से निजात पाना चाहे और मप्र रवाना हो जाएं।
सब ठीक का दावा : पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष व प्रवक्ता हृदय नारायण दीक्षित पार्टी की इस गुटबाजी ओर टुकड़ों में बंट जाने, चौपट होने, भविष्य में क्या होगा इस संबंध में टिप्पणी देने से लगभग बचते हुए सभी बातों का खंडन करते हैं। उनका कहना है कि चुनाव में हार जीत स्वाभाविक प्रक्रिया है हम अगर यूपी में हारे हैं तो गोवा, पंजाब में जीते भी हैं। उत्तराखंड में भी जीता ही माना जाए। आपसी कलह कहां नहीं होती। आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में पार्टी फिर एकजुट होकर चुनाव लड़ती दिखाई देगी। हार की जिम्मेदारी सभी की है। इस विषय पर नागपुर में प्रतिनिधि सभा की बैठक में काफी कुछ विचार-विमर्श हो चुका है।
लेखक पीयूष त्रिपाठी लखनऊ में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


