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येदुरप्पा हारे नहीं, न बीजेपी की जीत हुई

कर्नाटक में मुकाबला जारी है। अंतिम नतीजा आना बाकी है। यह कहना मुश्किल है कि मुकाबले में बीजेपी जीतेगी या आखिरकार बीएस येदुरप्पा परचम लहराते रहेंगे। यदुरप्पा की अबतक चल रही है। उनकी जगह लेने वाले नए विधायक दल के नेता के नाम की घोषणा अब बुधवार यानी तीन अगस्त को होना है। येदुरप्पा की रुख्सती पर बीजेपी के एक आला नेता ने सधी टिप्पणी है कहा कि जमीनी जनाधार से मिली कुर्सी को येदुरप्पा ने दिल्ली की कसौटी पर खरा उतरने के चक्कर में गंवा दिया है। येदुरप्पा को बंधे हाथ पैर से क्षेत्रीय दल के पहलवानों से लड़ने और शुरुआती हार के लिए मजबूर होना पड़ा है। मजबूरी के इस कथित चक्कर में येदुरप्पा कब तक फंसे रहते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।

कर्नाटक में मुकाबला जारी है। अंतिम नतीजा आना बाकी है। यह कहना मुश्किल है कि मुकाबले में बीजेपी जीतेगी या आखिरकार बीएस येदुरप्पा परचम लहराते रहेंगे। यदुरप्पा की अबतक चल रही है। उनकी जगह लेने वाले नए विधायक दल के नेता के नाम की घोषणा अब बुधवार यानी तीन अगस्त को होना है। येदुरप्पा की रुख्सती पर बीजेपी के एक आला नेता ने सधी टिप्पणी है कहा कि जमीनी जनाधार से मिली कुर्सी को येदुरप्पा ने दिल्ली की कसौटी पर खरा उतरने के चक्कर में गंवा दिया है। येदुरप्पा को बंधे हाथ पैर से क्षेत्रीय दल के पहलवानों से लड़ने और शुरुआती हार के लिए मजबूर होना पड़ा है। मजबूरी के इस कथित चक्कर में येदुरप्पा कब तक फंसे रहते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।

कर्नाटक के नाटक का एक सच यह भी है कि दक्षिण में बीजेपी के पैर जमाने वाले येदुरप्पा ने राष्ट्रीय नेतृत्व को हार जीत की खेल में उलझाकर अपने बाहुबल का बखूबी परिचय दिया है। दिल्ली के खुर्राट दिग्गजों को चमका कर रख दिया है और दो टूक बता दिया कि उनको समझने में भूल हुई है। वो न तो हिमाचल प्रदेश के शांता कुमार हैं, न उत्तर प्रदेश के कल्याण सिंह, न दिल्ली के मदनलाल खुराना, न मध्य प्रदेश की उमा भारती, न झारखंड के बाबूलाल मरांडी, न उतराखंड के भगत सिंह कोश्यारी या न ही भुवन चंद्र खंडूरी हैं। इन सबने विधायक दल के बहुमत के बावजूद दिल्ली के एक निर्देश पर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड दी थी।

येदुरप्पा को हांकने में बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को जिस किस्म की दिक्कत आई उससे सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि दिल्ली में बैठे कांग्रेस के नेताओं को भी क्षेत्रीय नेताओं को हैंडल करने में सबक लेनी चाहिए। ताकि क्षेत्र के कद्दावर राजनेताओं में राष्ट्रीय दलों की राजनीति का प्रलोभन बचा रहे। दिल्ली के एयर कंडीशन राष्ट्रीय दलों का दफ्तर चलाने वाले नेताओं पर इल्जाम है कि वो तिकड़म की राजनीति करते हैं। तिकडम के बूते जनता के बीच मरने खपने वाले राजनेताओं की हकीकत से नावाकिफ रहते हैं। तीस साल पुरानी बीजेपी को दिल्ली के पसंद पर नेता बनाने की परंपरा ने काफी नुकसान पहुंचाया है। फिर भी सबक नहीं ली जा रही। आदिकालिक कांग्रेस पार्टी में तो जनाधार वाले नेताओं की वाट लगाने की परंपरा पुरानी है। शरद पवार और ममता बनर्जी मिसाल हैं। कांग्रेस की भावना को लेकर राजनीति कर रहे इन दोनों नेताओं को अपनी वजूद के लिए क्षेत्रीय कांग्रेस पार्टी का गठन करना बेहतर समझा। हरियाणा में स्वर्गीय भजन लाल और उनसे पहले बंसीलाल ने भी मजबूरी में यही रास्ता पकड़ा। नए दौर की बात करें तो जगन मोहन रेड्डी मिसाल हैं। जगन मोहन रेड्डी से डील करते वक्त राष्ट्रीय कांग्रेस ठीक उसी तरह हार गई जिस तरह की हार तेलांगाना के कांग्रेस दिग्गजों के साथ होने की आशंका है।

साफ है कि राष्ट्रीय राजनीति दल वजूद वाले क्षेत्रीय नेताओं को समायोजित या समावेशित करने में लगातार विफल हो रही हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के खोखलापन ने कांग्रेस पार्टी को लंबे समय से वजूद वाले क्षेत्रीय नेताओं से महरूम कर रखा है। बीजेपी के बारे में एक पुराने नेता का कहना है कि अब न तो नैतिकता की पाठ पढ़ाने वाले नानाजी देशमुख रहे। न सुंदर सिंह भंडारी और न ही रज्जु भैय्या जैसों का साथ रहा। जिनके सामने भटके शख्स को खड़ा कर देने भर से बात बन जाती थी। उनके नैतिक बल की आड़ में पार्टी का हरेक आदेश विचारधारा की कसौटी पर कसा होता था और मजबूती से लागू होता था। भटके लोग मान जाते थे। विस्तार के साथ अवसरवादियों ने बाजी मार ली है। पार्टी पर वैचारिक लोगों का असर कमजोर पड़ता जा रहा है। अब न तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे शख्स को ये अहसास कराने वाला कोई बचा है कि वो किस मोड पर जाकर भटक रहा है और किस फैसले से ‘पार्टी विद डिफरेंट’ की छवि धूमिल हो रही है।  येदुरप्पा को डील करने में हुई मौलिक नासमझी का हवाला देते हुए पार्टी के केंद्रीय निर्णायक मंडल में शामिल इन बुजुर्ग नेता का कहना है कि येदुरप्पा का समर्थन करते वक्त नीतिन गडकरी को पिछली विवाद पर ही इस्तीफा लेकर रख लेना चाहिए था। भले ही इस्तीफा के बाद येदुरप्पा को सरकार चलाने के लिए अभयदान दे दिया जाता। उससे बीजेपी की छवि साफ सुथरी बची रहती। राजनीति के इस पाठ पर अमल किए जाने से येदुरप्पा भी नपे रहते। खैर, ये बीजेपी की मुसीबत है।

येदुरप्पा की सबसे बड़ी मुसीबत है कि जमीन पर उनको कुमारस्वामी जैसे कम अनुभवी पर ज्यादा होशियार राजनेता से मुकाबला करना है। कुमार स्वामी क्षेत्रीय या पारिवारिक पार्टी के बैनर तले राजनीति कर रहे हैं, तो येदुरप्पा का बैनर सिर्फ राष्ट्रीय नहीं बल्कि एक खास विचारधारा से बंधा है। बंधे हाथ पैर धींगामुश्ती भी मुश्किल होती है। इसलिए जमीन के जुझारु नेताओं को राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की राजनीति कैद के समान लगने लगा है। कांग्रेस या बीजेपी में जनाधार वाले क्षेत्रीय नेताओं की आज भी लंबी फेहरिस्त है जिनको लगता है कि जनता की आकांक्षा पर खरे उतरने के लिए उनको क्षेत्रीय दल का गठन कर लेना चाहिए। झारखंड में बाबूलाल मरांडी इसके मिसाल हैं। बिहार में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जिनको लगता है कि समय रहते अगर वो क्षेत्रीय दल बना गए होते तो महत्व के लिहाज से लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान या नीतीश कुमार से पीछे नहीं होते। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की क्षेत्रीय पार्टी आत्म केंद्रीत व्यक्तिगत लिप्सा से नहीं चल पाई। नहीं तो आज मायावती, मुलायम सिंह के समतुल्य बने रहते। उमा भारती को शुरुआती सफलता के बावजूद मतिभ्रम की स्थिति ने क्षेत्रीय दल के रास्ते पर चलने नहीं दिया। मदन लाल खुराना उम्र की मार से कट पीटकर रिटायरमेंट का वक्त गुजारने के लिए वापस बीजेपी में लौट आए। लेकिन जनाधार वाले बाबूलाल मरांडी को देखकर लगता है कि विचारधारा में वापसी की लिप्सा नहीं हो तो क्षेत्रीय दल बनाकर ठीक ठाक किया जा सकता है। मरांडी झारखंड में बुजुर्ग हो गए शिबू सोरेन और खत्म हो रही बीजेपी के समर्थकों के सहारे लगातार बढे़ जा रहे हैं।

राजनीति में करप्शन के बहुतेरे काट हैं। इसलिए यह कहना अनुचित है कि करप्शन की वजह से येदुरप्पा की खाट खडी हो रही है। येदुरप्पा प्रकरण से एक बात और साफ हुई है कि येदुरप्पा यदि राष्ट्रीय पार्टी की डोर से बंधे नहीं होते तो उनसे नैतिकता के मापदंड खरा उतरने के लिए दबाव नहीं होता। वो बच जाते। यदि बात बहुत बढ़ जाती। भ्रष्टाचार की वजह से गिरफ्तारी की नौबत आती तो वो लालू यादव सरीखा तुरुप चलते और राबडी देवी जैसे किसी डमी शख्स को मुख्यमंत्री के तौर पर सामने कर देते। कर्नाटक में ही येदुरप्पा से ज्यादा इल्जाम पूर्व मुख्यमंत्री एच डी देवगौडा या उनके पुत्र एच डी कुमारस्वामी पर लगता रहा लेकिन उनके भ्रष्टाचार को लेकर दिल्ली उस कदर परेशान नहीं रही, जितना की येदुरप्पा के करप्शन को लेकर बबाल मचता रहा। येदुरप्पा के सत्ताच्युत को कुमार स्वामी की जीत की तौर पर देखा जा रहा है। समझौते के तहत 2007 में बीजेपी को सत्ता सौपने से मुकर गए कुमार स्वामी बीते चार साल से निरंतर येदुरप्पा को राजनीति का सबक सिखाने में लगे रहे। कुमार स्वामी के आसरे ही केंद्रीय राजनीति में लौटने की चाहत पाले बुजुर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज रह रहकर येदुरप्पा सरकार को बर्खास्त करते रहे। कुल मिलाकर 36 महीनों के शासन में मुख्यमंत्री के तौर पर येदुरप्पा को शायद ही एक रात भी चैन से सोने का मौका मिला हो।  

अक्सर लगता है कि यदि कर्नाटक के लिंगायत जाति से सबसे बडे़ नेता के तौर पर उभरे येदुरप्पा ने लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, चन्द्रबाबू नायडू, एचडी देवगौड़ा, नवीन पटनायक, जयललिता या करुणानिधि की तरह क्षेत्रीय ओहरे के तहत काम किया होता तो फजीहत की गुंजाइश कम रहती। दिल्ली दरबार को कम खटकते। कहते हैं समाज जितना भ्रष्टाचार कबूल करेगा, राजनीति उतनी ही भ्रष्ट होगी। उसी अनुपात में अपराधियों के चंगुल में फंसती चली जाएगी। अन्ना हजारे जैसे लोग समाज को इसी हीन भावना से उबारने में लगे हैं। भ्रष्टाचार मिटाने का मजबूत जरिया है समाज को जगा देना। इसके बिना येदुरप्पा या भ्रष्ट राजनीति का पर्याय बने राजनेताओं से जनता का मोहभंग होना नामुमकिन है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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