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ये नामजदगी है या राज्‍यसभा का मजाक?

राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति किसे नामजद करते हैं, इसमें आम जनता की कोई खास रूचि नहीं है लेकिन जब लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर जैसे लोगों का नाम आता है तो आम लोग खुश होते हैं। इन आम लोगों को यह पता नहीं होता कि ये नामजद लोग राज्यसभा में बैठकर करते क्या हैं? यदि उन्हें सच्चाई का पता चल जाए तो वे अपना माथा कूट लेंगे। 1952 से अब तक लगभग सवा सौ लोग नामजद हुए हैं। इन सवा सौ लोगों में से कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने सदन में आकर कभी अपना मौन-व्रत ही भंग नहीं किया। कुछ लोग सत्रों में उपस्थित होना ही अपने समय की बर्बादी मानते हैं। यदि इन सवा सौ लोगों के सारे भाषणों का कोई संग्रह अलग से छापा जाए तो आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। नेहरू-काल में नामजद हुए श्रेष्ठ बौद्घिकों की बात जाने दें तो शेष सरकारों के नामजद लोगों का राज्यसभा में योगदान क्या रहा है? कानून बनाने में और नीति-निर्माण में उनकी भूमिका क्या रही है? नगण्य!

राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति किसे नामजद करते हैं, इसमें आम जनता की कोई खास रूचि नहीं है लेकिन जब लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर जैसे लोगों का नाम आता है तो आम लोग खुश होते हैं। इन आम लोगों को यह पता नहीं होता कि ये नामजद लोग राज्यसभा में बैठकर करते क्या हैं? यदि उन्हें सच्चाई का पता चल जाए तो वे अपना माथा कूट लेंगे। 1952 से अब तक लगभग सवा सौ लोग नामजद हुए हैं। इन सवा सौ लोगों में से कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने सदन में आकर कभी अपना मौन-व्रत ही भंग नहीं किया। कुछ लोग सत्रों में उपस्थित होना ही अपने समय की बर्बादी मानते हैं। यदि इन सवा सौ लोगों के सारे भाषणों का कोई संग्रह अलग से छापा जाए तो आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। नेहरू-काल में नामजद हुए श्रेष्ठ बौद्घिकों की बात जाने दें तो शेष सरकारों के नामजद लोगों का राज्यसभा में योगदान क्या रहा है? कानून बनाने में और नीति-निर्माण में उनकी भूमिका क्या रही है? नगण्य!

धारा 80 (3) का उल्लंघन करके सरकारों ने कई घिसे-पिटे नेताओं को भी राज्यसभा पर थोपा है लेकिन आज तक इस नामजदगी के दुरुपयोग पर देश में कोई सार्वजनिक बहस क्यों नहीं छिड़ी है? हमारी अदालतें और संसद चुप क्यों हैं? संविधान सभा ने नामजदगी की व्यवस्था इसलिए की थी कि जो लोग राजनीति के पचड़े में नहीं पड़ना चाहते लेकिन जिनका ज्ञान और अनुभव विलक्षण हो, उनका लाभ संसद को मिले। ऐसे लोगों को राज्यसभा में लाने की बजाय सरकारें मक्खी पर मक्खी बिठाती हैं। वे प्रसिद्घ कलाकारों, खिलाडि़यों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को नामजद कर देती हैं। इन लोगों ने अपने अपने विषय और देश की सेवा तो की है लेकिन नीति-निर्माण से उनका क्या लेना-देना है? वे राज्य सभा में बैठकर न गाना गा सकते हैं, न सितार बजा सकते हैं, न क्रिकेट खेल सकते हैं। उन्हें राज्यसभा में नामजद करके आप उनकी प्रतिष्ठा भी घटाते हैं और राज्यसभा की भी! राज्यसभा की सीटें कुछ प्रसिद्घ लोगों को बांटकर सरकारें अपने लिए सस्ती लोकप्रियता का जुगाड़ जरूर बैठा लेती हैं, लेकिन क्या यह हमारे संविधान-निर्माताओं की भावनाओं का उल्लंघन नहीं है? जरूरी हो तो धारा 80 (3) में ऐसा संशोधन किया जाए, जिसके रहते हमारी सरकारें राज्यसभा की नामजदगी को मज़ाक का विषय न बना सकें!

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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