अब तक दस लोगों पर गाज गिरा चुकी हैं मायावती. करप्शन और आरोपों के कारण. वे खुद को सबसे बड़ा ईमानदार दिखा रही हैं. वे देश की सबसे सख्त और सबसे जनपक्षधर मुख्यमंत्री बना रही हैं खुद को. पर उनको नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि दरअसल यूपी में मंत्रियों-अफसरों में करप्शन की सबसे बड़ी वजह खुद मुख्यमंत्री मायावती हैं. ये अलग बात है कि वे अपने स्तर पर किए गए करप्शन को मुद्दा नहीं मानतीं और दूसरों पर अगर करप्शन के चार्जेज लग जाते हैं तो उन्हें बर्खास्त कर देती हैं.
दरअसल, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को समझ में आ गया है कि करप्शन बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है और जनता इस मुद्दे पर किसी को बख्शने के मूड में नहीं है. इसी कारण भाजपा सहित सभी दल भ्रष्टाचार को लेकर सेंसेटिव होने का दिखावा कर रहे हैं. ये भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में ईमानदार नहीं हैं. इनकी कोशिश बस जनता को यह दिखाने की है कि वे भ्रष्टाचार विरोधी हैं. तभी तो भाजपा वाले निशंक को करप्शन चार्जेज के कारण सीएम के पद से हटाकर संगठन में बड़ा पद दे देते हैं और मायावती आरोप लगने पर अपने मंत्रियों को बर्खास्त कर देती हैं. आरोपों से घिरे मंत्रियों पर कार्रवाई का सिलसिला जारी रखते हुए मायावती ने बुधवार को लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में गंभीर आरोपों का सामना कर रहे राज्य के माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र और ऐसे ही आरोपों से घिरे श्रम मंत्री बादशाह सिंह को पद से हटा दिया है. मायावती ने दोनों के खिलाफ सतर्कता अधिष्ठान से जांच कराने के आदेश दिए हैं.
प्रदेश में सत्ता पर काबिज बहुजन समाज पार्टी की उत्तर प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने मुख्यमंत्री के इस निर्णय की जानकारी देते हुए बताया कि लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने मिश्र के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमा दर्ज करने और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की है. इसके अलावा श्रम मंत्री पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर इल्जाम लगाए गए हैं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री मायावती ने इन हालात के मद्देनजर दोनों मंत्रियों को तब तक पद से हटा दिया है, जब तक उन पर लगे आरोपों की सतर्कता अधिष्ठान की जांच पूरी नहीं हो जाती और वे निर्दोष साबित नहीं हो जाते. गौरतलब है कि मायावती ने इससे पहले राजेश त्रिपाठी और अवधपाल सिंह यादव को मंत्री पद से हटा दिया था.
वहीं, लोग कह रहे हैं कि मायावती पर कई बार कई तरह के आरोप लगे. सप्रीम कोर्ट तक में मायावती की फजीहत हुई. लखनऊ के सत्ता के गलियारे से जुड़े हर शख्स को पता होता है कि शीर्ष स्तर पर किस कदर भ्रष्टाचार है और किस तरह पैसे के बल पर प्रोजेक्ट, टिकट, जमीन, जंगल, जीवन सबका सौदा कर दिया जाता है. लेकिन कहने को कोई सीधा आरोप या प्रमाण नहीं है, इसलिए भले ही मायावती खुद को निष्पाप और निष्कलंक मान लें लेकिन जनता को सब पता है. दलित वोटबैंक के सहारे भले ही अगले कुछ सालों तक मायावती यूपी में फिर राज करने का मंसूबा बनाए हों लेकिन ज्यादा नहीं, पांच दस साल में दलितों का भी उसी तरह मायावती से मोहभंग होगा जिस तरह बिहार में पिछड़ों का लालू यादव से हुआ.


