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रगो में पारा घरों में अंधेरा

देश की उर्जा राजधानी कहलाने का गौरव पाने वाले सिंगरौली क्षेत्र के वातावरण का अध्य्यन जब सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने किया तो पाया कि पारे का अधिकतम स्तर सिंगरौली में निवास कर रहे लोगों के स्वास्थ पर खतरनाक असर डाल रहा है। दिल्ली स्थित अनुसंधान संस्थान, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के नवीनतम अध्ययन में पता चला है कि उत्तर प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े जिले सोनभद्र के वातावरण और स्थानीय निवासियों के शरीर में पारे की अत्यधिक मात्रा मौजूद है। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने यह अध्ययन को जारी करते हुए बताया कि सोनभद्र जिले का सिंगरौली क्षेत्र संसाधनों से पूरित है- यहां वृहद कोल भंडार और अधिसंख्य विद्युत संयंत्र होने केकारण यह क्षेत्र देश का औद्योगिक विद्युत गृह है। इस हिसाब से इस क्षेत्र के लोगों को समृद्ध, संपन्न औरखुशहाल होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है- हमारा अध्ययन यहां की गरीबी, प्रदूषण, पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी, विभागीय उदासीनता और बीमारियों की कहानी बयां करता है।सीएसई की प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला ने यह अध्ययन प्रलेखित पद्धतियों के अनुसार किया, जिसे औद्योगिक विषाक्तता, जल एवं वायु प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा के अनुसंधान के लिए उपयोगी माना जाता है। 

देश की उर्जा राजधानी कहलाने का गौरव पाने वाले सिंगरौली क्षेत्र के वातावरण का अध्य्यन जब सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने किया तो पाया कि पारे का अधिकतम स्तर सिंगरौली में निवास कर रहे लोगों के स्वास्थ पर खतरनाक असर डाल रहा है। दिल्ली स्थित अनुसंधान संस्थान, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के नवीनतम अध्ययन में पता चला है कि उत्तर प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े जिले सोनभद्र के वातावरण और स्थानीय निवासियों के शरीर में पारे की अत्यधिक मात्रा मौजूद है। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने यह अध्ययन को जारी करते हुए बताया कि सोनभद्र जिले का सिंगरौली क्षेत्र संसाधनों से पूरित है- यहां वृहद कोल भंडार और अधिसंख्य विद्युत संयंत्र होने केकारण यह क्षेत्र देश का औद्योगिक विद्युत गृह है। इस हिसाब से इस क्षेत्र के लोगों को समृद्ध, संपन्न औरखुशहाल होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है- हमारा अध्ययन यहां की गरीबी, प्रदूषण, पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी, विभागीय उदासीनता और बीमारियों की कहानी बयां करता है।सीएसई की प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला ने यह अध्ययन प्रलेखित पद्धतियों के अनुसार किया, जिसे औद्योगिक विषाक्तता, जल एवं वायु प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा के अनुसंधान के लिए उपयोगी माना जाता है। 

सीएसई के उप महानिदेशक और प्रयोगशाला के प्रधान श्री चंद्र भूषण ने बताया- श्वर्ष 2011 में सोनभद्र जिले के कुछ निवासियों ने सीएसई से संपर्क कर जिले में औद्योगिक प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर अध्ययन करने का अनुरोध किया। हमने संबंधित क्षेत्र से जल, मिट्टी, अनाज, मछली के साथ ही वहां निवासरत लोगों के रक्त, नाखून और बाल के नमूने एकत्र किए। हमने वहां जो पाया वहभयावह था। क्षेत्र में मौजूद पारे की विषाक्तता जापान के मिनामाटा शहर में पारे की भयानक विषाक्तता की याद दिलाता है।

 

जांच एवं निष्कर्ष नमूना संग्रह:

प्रयोगशाला ने छह प्रकार के नमूने एकत्र किए-

1. रक्त, बाल एवं नाखून के नमूनों के लिए सोनभद्र जिले के 19 ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया जोकिसी न किसी बीमारी से पीड़ित थे।

2. जिले के विभिन्न क्षेत्रों से भूजल, सतही जल और अपशिष्ट जल के 23 नमूने एकत्र किए।

3. मृदा के 7 नमूने लिए गए।

4. क्षेत्र के विभिन्न घरों से चावल, दाल और गेहूं, जिन्हें इसी क्षेत्र में उगाया गया था, के पांच नमूने लिए गए।

5. रिहंद नदी पर बने गोविंद बल्लभ पंत सागर जलाशय से मछलियों के 3 नमूने एकत्रित किए।

 

किसमें क्या जांचा गया

रक्त, बाल और नाखून के नमूनों को पारे की मौजूदगी जानने के लिए जांचा गया, पानी और मिट्टी को उसमें मौजूद पारा और भारी धातुओं जैसे- लेड, कैडमियम, क्रोमियम और आर्सेनिक का पता लगाने के लिए जांचा गया। पानी की घुलनशीलता और कठोरता की भी जांच की गई। अनाजों की जांच उसमें निहित भारी धातुओं का पता लगाने के लिए किया गया। मछलियों की जांच मिथाइल मरकरी, जो कि पारे का सबसे विषाक्त अपरूप है की मौजूदगी जानने के लिए की गई। ;जलीय माध्यम में पारा मिथाइल मरकरी में परिणत हो जाता है।

जांच में क्या मिला

1. 84 प्रतिशत रक्त के नमूनों में पारा अत्यधिक मात्रा में पाया गया जो कि औसत सुरक्षित पारा स्तर से छह गुना ज्यादा है। पारे की सर्वाधिक मात्रा 113.48 पीपीबी पाई गई जोकि सुरक्षित स्तर से 20 गुना ज्यादा है। यूएस पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के मानक के अनुसार पारे का सुरक्षित स्तर 5.8 पीपीबी है।

2. बाल के नमूनों में से 58 प्रतिशत में पारा पाया गया जिसका औसत स्तर 7.39 पीपीएम था। हेल्थ कनाडा के अनुसार, बाल में पारे की 6 पीपीएम मौजूदगी सुरक्षित माना जाता है। वहीं, 6-30पीपीएम की मौजूदगी बढ़ते खतरे की श्रेणी को इंगित करता है। अध्ययन के दौरान बाल में पारे की सर्वाधिक मात्रा 31.3 पीपीएम पाया गया, जो कि सुरक्षित स्तर से पांच गुना ज्यादा है। अध्ययन में नाखूनों में भी पारे की मौजूदगी पाई गई।

3. पारे की मौजूदगी ने सोनभद्र के भूजल को भी विषाक्त कर दिया है। पारे की सर्वाधिक सांद्रता दिबुलगंज के हैंडपंप से लिए गए नमूने में पाई गई जो कि 0.026 पीपीएम थी। यह भारतीय मानकब्यूरो द्वारा स्थापित मानक 0.001 पीपीएम से 26 गुना ज्यादा है।

4. गोविंद बल्लभ पंत जलाशय भी पारे से विषाक्त हो चुका है। आदित्य बिरला लिमिटेड की कास्टिक सोडा उत्पादन इकाई का अपशिष्ट डोंगिया नाला में गिरता है, वहां पारे का स्तर 0.01 पीपीएम पाया गया।

5. क्षेत्र की मछलियों में मिथाइल मरकरी की विषाक्तता पाई गई। डोंगिया नाला के निकट की मछलियों में मिथाइल मरकरी का स्तर 0.447 पीपीएम पाया गया जो कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मानक से दोगुना ज्यादा है।पारे का स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव अधिक दिनों तक पारे का संपर्क तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने के साथ ही स्मृति क्षीणता, गंभीर अवसाद,उत्तेतना में वृद्धि, प्रलाप, और व्यक्तित्व परिवर्तन का कारण हो सकता है। यह किडनी को भी क्षति पहुंचा सकता है। सीएसई के अनुसंधानकर्ताओं ने सोनभद्र के निवासियों में चर्म रोग अथवा चमड़ी का रंग बदलना, बुखार, श्वसन संबंधी विकार, जोड़ों और पेट में दर्द दृष्टि क्षीणता, पैरों में जलन एवं वाणी विकार जैसी बीमारियां अत्यधिक संख्या में पाई। ये सभी पारे के संपर्क में आने के लक्षण हैं।

वर्ष 1998 में भारतीय विषाक्तता अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर), लखनउ ने सिंगरौली क्षेत्र में पर्यावरणीय महामारी का अध्ययन किया था। जिसमें 1200 से अधिक लोगों की जांच की गई। इनमें से 66 प्रतिशत लोगों के रक्त में 5 पीपीबी से अधिक मात्रा में पारा पाया गया। इस अध्ययन में क्षेत्र की सब्जियों, पेयजल और मछलियों का भी परीक्षण किया गया। 23 प्रतिशत सब्जियों में पारा का स्तर स्वीकृत मात्रा से कहीं अधिक था, जबकि 15 प्रतिशत पेयजल में पारे का स्तर स्वीकृत मात्रा 1 पीपीबी से अधिक पाया गया। मछलियों में पारे का स्तर औसत से काफी अधिक था। अध्ययन के अनुसार, यहां की महिलाएं सिरदर्द, अनियमित मासिक धर्म, बांझपन, सुन्नता, मृत प्रसव और पैरों में झुनझुनी से पीड़ित हैं। कहीं कहीं त्वचा पर अत्यधिक धब्बे, रक्ताल्पता और उच्च रक्तचाप के मामले भी पाए गए। आईआईटीआर का यह अध्ययन कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सीएसई के अध्ययन ने क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक पारे का स्तर पाया।

 

क्या किया जा सकता है

सोनभद्र प्रारंभ से ही उपेक्षित रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ औद्योगिक संस्थान भी क्षेत्र में पारे के प्रदूषण के बारे में जानते हैं, फिर भी इस ओर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। श्री चंद्र भूषण ने बताया- दो वर्ष पूर्व सोनभद्र को बेहद प्रदूषित क्षेत्र घोषित किया गया था। यह आज भी वैसा ही बना हुआ है। एक कार्ययोजना के तहत जिले में नई परियोजनाओं की स्थापना पर से स्थगन हटा लिया गया, जिसने भी पारे को समस्या के रूप में नहीं पहचाना। शुरुआती तौर पर, नई परियोजनाओं पर स्थगन फिर से लगाया जाना चाहिए। साथ ही पारे की समस्या से निजात पाने के लिए एक कार्ययोजना भी बनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा- सरकार को क्षेत्र में एक संचयी प्रभाव आकलन और क्षमता का अध्ययन करना चाहिए, ताकि पर्यावरण की सदृशीकरण क्षमता को समझा जा सके।

सीएसई विद्युत संयंत्रों, कोयला खदानों और कोल वाशरीज के पारा मानकों को विकसित करने की मांग करता है। इसके लिए आवश्यक है कि गैर अनुपालन औद्योगिक संस्थान तब तक के लिए बंद कर दिए जाएं, जब तक कि वे मानदंडों को पूरा नहीं करते। सोनभद्र में सभी लोगों को उपचारित जल की आपूर्ति प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक संस्थानों के खर्चे पर करना सुनिश्चित किया जाए। क्षेत्र का परिशोधन कंपनी के खर्चे पर किया जाना चाहिए। जैसे कि आदित्य बिरला केमिकल्स लिमिटेड का अपशिष्ट जहां से बहता है, उस क्षेत्र का परिशोधन उसी कंपनी के खर्चे पर किया जाए। सुश्री सुनीता नारायण ने कहा कि सरकार को पारा प्रदूषण की समस्या की गंभीरता को न सिर्फ पहचानना बल्कि स्वीकार भी करना चाहिए। साथ ही इसके निराकरण के लिए उचित और र्प्याप्त कदम उठाने चाहिए। चुप्पी की साजिश का अंत अवश्य होना चाहिए।

यह इस क्षेत्र के निवासियों का दुर्भाग्य ही है की ऐसी रिपोर्ट आने के बाद मीडिया में तो खूब हल्ला मचता है लेकिन यहां के लोगों के न तो जीवन में कोई बदलाव आता है न ही पर्यावरण में उसके उलट वातावरण के साथ इस प्रकार का क्रूर खेल बदस्तूर जारी ही रहता हैं। ताबड़तोड़ पावर प्लांट लग रहें है। पहले से बिजली उत्पादन कर रहे परियोजनाओं से उत्पन्न होने वाली बिजली से देश का अधिकांशतः भाग रौशन हो रहा है लेकिन यहां के रहने वाले लोगों के घरों में अंधेरा पसरा रहता है। हां परियोजनाओं द्ववारा उत्पन्न हो रहे प्रदूषण के कारण होने वाले प्रदूषित पदार्थ इन्हें मुफ्त में दिया जा रहा है। ऐसा क्यो होता है इस अहम सवाल का जवाब न कोई देने वाला है और न ही कोई सुनने वाला हां भोगने वाला है यहां के निवासी जो चुपचाप भोग रहें है और शायद भविष्य में भी भोगते ही रहेंगें ।

बेलाग लेपेट- पर्यावरण दिवस और हरियाली दिवस पर पौधे लगाने का दिखावा करके परियोजनाओं द्वावारा पर्यावरण को सुरक्षित रखने का टिटहरी प्रयास जरुर किया जाता है। इस तरह के प्रयास से किस हद तक पर्यावरण प्रदूषण मुक्त होता है जरा सोचिए।

लेखक अब्दुल रशीद सिंगरौली में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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