आज के समय एक बड़ी भ्रान्ति जो पूरे समाज में फैलाई जा रही है वह यह कि राजनेता और अधिकारी बेईमान होते हैं और इस कारण लोकपाल या ऐसी संस्थाओं में बाहर के लोग लाये जाने चाहिए. जिस तरह से सिविल सोसायटी द्वारा जन लोकपाल बिल प्रस्तुत किया गया उसमे तो जजों तक की संख्या सीमित करने की बात कही गयी. हमारा यह साफ़ मत है कि इस प्रकार की धारणा ना सिर्फ पूर्णतया गलत है वरन सिद्धांत रूप में भी सही नहीं ठहरता.
आयें हम सबसे पहले नेताओं की ही बात करें. हम सभी जानते हैं कि किसी भी नेता का मतलब तभी हम जब उसके साथ जनता है, बिना जनता के नेता मूल्यहीन और बेकार है. इस तरह पहली बात तो यही हो गयी कि नेता अपने आप नहीं बन जाता, उसे जनता का समर्थन चाहिए होता है. जनता मतलब जीवित मनुष्य. वह मनुष्य जो इस संसार की सबसे श्रेष्ठ कृति मानी जाती है. हर मनुष्य के पास अन्य चीज़ों के अलावा एक दिमाग भी होता है, अपना स्वयं का दिमाग. इसी दिमाग से वह सोचता है, अपने आस-पास के प्रति सतर्क रहता है और चीज़ों को अनुभव करता है. इसी दिमाग से वह अपना निर्णय भी लेता है. यह सही कि बहुधा व्यक्ति के निर्णय पर अन्य शक्तियों का प्रभाव पड़ता रहता है, कई ऐसे लोग भी होते हैं जो अपनी बृहद सत्ता से दूसरे लोगों के निर्णय को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाते हैं. पर यह प्रभाव किसी भी दशा में एक सीमा से बढ़ कर नहीं हो पाता. गरीब से गरीब आदमी, बिना पढ़ा-लिखा आदमी भी अपनी सुरक्षा, अपनी संरक्षा, अपने वजूद और अपने लाभ-हानि को लेकर उतना ही सजग रहता है जितना एक अरबपति या देश का प्रधानमंत्री.
ऐसे में यह भ्रान्ति पालना कि वह व्यक्ति अपना अच्छा-बुरा नहीं समझ पाता और नेताओं के झांसे में आ जाता है पूरी तरह से गलत भी है, बेबुनियाद भी. साथ ही यह एक मनुष्य के सोचने की शक्ति का अपमान भी. उसी तरह से जिस तरह से इस लेख का पाठक भले ही हमारी बातें पढ़ेगा तो, पर निर्णय वही लेगा जैसा उसे अपने लिए उचित लगता है. हम गाँव-देहात से जुड़े लोग हैं. हमारे घरों में और हमारे खेतों से गरीब लोग निरंतर संपर्क में रहे हैं. हम जानते हैं कि इन में हर व्यक्ति अपना भला-बुरा खूब समझ रहा है. वह वही करेगा जो उसे अच्छा लग रहा है.
अतः यह मान लेना कि नेता लगातार जनता को बेवकूफ बना रहे हैं और जनता लगातार बेवकूफ बन रही है, कुछ वैसा ही हुआ जैसे यह मान लेना कि एक लड़के और एक लड़की का प्रेम वर्षों तक एकतरफा चल सकता है. नेता चौबीस घंटे, सातों दिन जनता के सामने होता है, लगभग एकदम नग्न. नेता की हर बात, हर आचरण जनता लगातार देखती रहती है, अनुभव करती है. कहने का अर्थ है कि नेता हवा मे नहीं होता, उसका एक जमीन होता है जहां वह लोगों के प्रति जिम्मेदार होता है. जिस घडी, जिस पल एक व्यक्ति को लगा कि फलां नेता उसके योग्य नहीं रहा उसी पल वह उस नेता को अपने से अलग कर देता है. यह सिद्धांत की बात नहीं है, जमीनी हकीकत है.
फिर आजकल तो एक चुनाव नहीं होते. रोज कोई ना कोई चुनाव होता ही रहता है. कभी ग्राम पंचायत का चुनाव, कभी नगर पालिका का, कभी विधान सभा का, कभी लोक सभा का, फिर कभी उप-चुनाव. क्या यह मान लिया जाए कि इन सभी चुनावों में आम जनता कुछ समझती नहीं और आँख मूँद कर वोट देती है? इससे बड़ी भ्रान्ति और असत्य क्या हो सकता है. साथ ही मनुष्य का इससे बड़ा अनादर भी संभव नहीं है.
अब सरकारी अधिकारियों की बात करें. एक सरकारी सेवक एक निश्चित व्यवस्था में रहता है. उसके कुछ अधिकार होते हैं तो कुछ दायित्व भी. उसपर नियंत्रण भी होता है- निरंतर. छोटे से छोटे सरकारी कर्मी किसी ना किसी के अधीन काम करते हैं. इसी प्रकार से प्रत्येक सरकारी कर्मी के निश्चित्त कर्तव्य होते हैं. उसे ना चाहते हुए भी इनमे से कुछ काम करने ही होते हैं. ऐसा नहीं करने पर उस पर कार्यवाही हो सकती है- डांट लग सकती है, जवाब तलब हो सकता है, ट्रांसफर हो सकता है, मुअत्तल हो सकता है, जांच शुरू हो सकती है. यानि कई तरह से नुकसान की सम्भावना है. मतलब यह कि वह व्यक्ति कहीं ना कहीं से बंधा हुआ है. स्वाभाविक है एक बंधे हुए आदमी की उछलने की सीमा होगी.
इस सरकारी कर्मी के कार्यों की समीक्षा ना सिर्फ उसका अधिकारी करता है बल्कि जनता में भी उसकी चर्चा और समीक्षा होती है. अनगनित उदाहरण होंगे जब जनता के लोगों की शिकायत पर सरकारी लोगों का ट्रांसफर ही नहीं होता, उन्हें अन्य प्रकार से सेवा में नुकसान भी होता है. लोग संतुष्ट नहीं हैं, ऊपर के अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं. वहाँ नहीं सुना गया तो उसके ऊपर. फिर कोर्ट-कचहरी में. यानि कि एक व्यवस्था के अधीन नियंत्रण. हर साल उसका वार्षिक गोपनीय मंतव्य लिखा जा रहा है.
इस तरह से यह मान लेना कि यह सरकारी कर्मी पूरी तरह स्वतंत्र जीव है और मनमानी काम कर रहे होते है उतना ही निराधार है जितना यह कहना कि हमारी यह धरती अपनी मनमर्जी से गुरुत्वाकर्षण की शक्ति को तोड़ कर अपनी इच्छा से कहीं निकल जाए.
यदि हम न्यायपालिका को लें तो वहाँ भी यही स्थिति मिलेगी. अधीनस्थ न्यायालयों में काम करने वाले जज तो पूरी तरह से लोक सेवक भी हैं और उनके सम्बन्ध में वे सारी कार्यवाहियां संभव हैं जो किसी अन्य लोक सेवक के विरुद्ध हो सकती हैं. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इन सभी जजों और मैजिस्ट्रेट पर लगातार तेज निगाह लगाए रखती हैं और ये सारे लोग अपने प्रत्येक कार्य के लिए जनता के अतिरिक्त ऊपर भी जिम्मेदार होते हैं. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए सेवा नियम कुछ अलग किस्म के जरूर हैं पर उनके लिए भी तो महाभियोग की व्यवस्था है जो एक निश्चित संवैधानिक उपाय है. साथ ही इन जजों के प्रत्येक निर्णय पर सम्बंधित प्रभावित हो रहे लोगों के अलावा मीडिया के जरिये लाखों-करोड़ों लोगों की निरंतर निगाह लगी रहती है. भले ही कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट के भय से कई बार लोग खुल के कई बातें नहीं कहें पर प्रत्येक न्यायधीश के प्रति आम धरना तो बनती ही रहती है. क्या हम नहीं जानते कि भोपाल गैस कांड में कई सुप्रीम कोर्ट निर्णयों पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं जिनका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय तक में किया.
ऊपर दी गयी बातें यह साफ़ कर देती हैं कि आज के समय जो भी निश्चित व्यवस्थाएं हैं और उनसे जुड़े लोग हैं वे किसी रीती और नीति से बंधे रहते हैं. हमें याद है साथियों के गपशप में एक आईएएस अधिकारी ने हम लोगों के सामने एक बात कही थी-“ हम लोगों की स्थिति एक विधवा की तरह होती है. हमें अपने आप को उतना ही साफ़ रखना होता है जितना एक विधवा को अपने दामन को. दोनों पर लगे छींटे एक पल में दिखने लगते हैं.”
हम नहीं कह रहे कि आज प्रत्येक नेता, प्रत्येक अधिकारी और प्रत्येक न्यायिक जज अपने आप को विधवा के दामन की तरह साफ़ और पवित्र बनाए हुए है या उस तरह के प्रयास कर रहा है. कई बार तो स्थिति इसके ठीक विपरीत है. कई लोग तो अपने आप को इस तरह से शर्मसार कर रहे हैं कि उनकी जितनी भर्त्सना की जाए, उतना कम है. पर इन सब के बावजूद जो मूल बात है वह यह कि कम से कम इन सभी जगहों पर कुछ नियम तो हैं, निश्चित व्यवस्थाएं तो हैं, रीती और नीति तो हैं. और इन सब से बढ़ कर ये सभी किसी ना किसी के प्रति जिम्मेदार तो हैं जो इनके कार्यों और आचरण पर निरंतर निगाहें रखे हुए हैं.
हम सोशल एक्टिविस्ट के रूप में प्रचारित लोगों के विषय में कोई निश्चित टिप्पणी नहीं करते हुए मात्र इतना ही कहेंगे कि हर जगह की तरह यहाँ भी हर प्रकार के लोग होते हैं पर इतना अवश्य है कि यहाँ कोई निश्चित नीतिगत और संस्थागत नियंत्रण नहीं होता और ना ही किसी जनविशेष के प्रति सीधी जिम्मेदारी ही नियत होती है.
ऐसे में इन सभी लोगों के प्रति अविश्वास के भाव जगाना अथवा उन्हें एक सिरे से बेकार कह देना एक प्रकार से देशद्रोह की तरह है. यह अपने पूरे शासन तंत्र पर ही अविश्वास नहीं है, यह अपने वजूद और अपने स्वयं पर भी भरोसा नहीं होने की स्थिति है.
हम ऐसे किसी भी व्यक्ति और संस्था (जिसमे सिविल सोसायटी भी शामिल हैं) को हमारे पूरे शासन तंत्र के प्रति अविश्वास का भाव पैदा करने और जनता एवं व्यवस्था के प्रति जिम्मेदार (कम से कम सिद्धांत रूप में) नहीं होने की बात को ना सिर्फ पूरी तरह गलत मानते हैं बल्कि देश हित में हानिपरक और खतरनाक भी.
अमिताभ एवं नूतन ठाकुर का विश्लेषण


