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राष्‍ट्रभक्ति और समर्पण की मिसाल है ये पत्रकार, जवानों को दी अस्‍पताल की सौगात

: गणतंत्र दिवस पर विशेष : कोल्हापुर। इस देश में शायद ही कोई ऐसा होगा जो कारगिल युद्ध से अनजान होगा। पर्वतीय क्षेत्र की विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस व वीरता का परिचय देते हुए जिस तरह सेना के जवानों ने विजय पताका फहराई, उसे सोच कर हर भारतीय का माथा गर्व से ऊंचा हो जाता है। लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जिसने उस लड़ाई में न तो हिस्सा लिया और न ही सेना की वर्दी पहनता है किंतु उसका योगदान देश की सेवा में उचित अवसर पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले उस सैनिक से कम नहीं है, जो सियाचिन के बर्फानी अंधड़ों को हंसते हुए झेलता है और देश को बाहरी आक्रमणों से बचाने को तत्पर रहता है।

: गणतंत्र दिवस पर विशेष : कोल्हापुर। इस देश में शायद ही कोई ऐसा होगा जो कारगिल युद्ध से अनजान होगा। पर्वतीय क्षेत्र की विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस व वीरता का परिचय देते हुए जिस तरह सेना के जवानों ने विजय पताका फहराई, उसे सोच कर हर भारतीय का माथा गर्व से ऊंचा हो जाता है। लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जिसने उस लड़ाई में न तो हिस्सा लिया और न ही सेना की वर्दी पहनता है किंतु उसका योगदान देश की सेवा में उचित अवसर पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले उस सैनिक से कम नहीं है, जो सियाचिन के बर्फानी अंधड़ों को हंसते हुए झेलता है और देश को बाहरी आक्रमणों से बचाने को तत्पर रहता है।

वह सिपाही तो है किंतु कलम का, थपेड़े तो झेलता है लेकिन देश की राजनीति में होने वाली हलचलों के। सेवा का धर्म उससे बेहतर कौन निभा सकता है जिसने अपने समर्पण, लगन व दृढ़ता के बल पर सियाचिन में सेना के उन जवानों के लिए एक अत्याधुनिक अस्पताल बनवाने में सफलता हासिल की, जिसके न होने पर बर्फानी चोटियों पर बीमार व घायल होने वाले जवानों के प्राण बचाना मुश्‍िकल हो जाता था। कोल्हापुर, महाराष्‍ट्र के चर्चित अखबार पुढारी के मुख्य सम्पादक व चेयरमैन प्रताप सिंह गणपतराव जाधव वह शख्सियत हैं जिन्होंने पहाड़ की बर्फीली चोटियों के बीच अस्पताल बनाने के मिशन को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जाधव बताते हैं कि उन्हें आज भी वह बात नहीं भूलती जब कोल्हापुर के रहने वाले और सेना में मेजर जनरल के पद पर आसीन शिवाजी राव पाटिल का बहादुर बेटा कारगिल की लड़ाई में घायल हो गया और समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं होने के चलते वीरगति को प्राप्त हो गया। ऐसे और भी थे जो इलाज दूर होने के कारण मौत के करीब चले गए। इसके अलावा -30 डिग्री में रह कर रक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सैनिकों को फ्रास्ट बाइट जैसी बर्फ की बीमारियों के कारण तत्काल चिकित्सा सुविधा की जरूरत होती है। उन्हें हेलीकॉप्टर से चंडीगढ़ लाना पड़ता है लेकिन खराब मौसम कई बार रूकावट बन जाता है। इन बातों ने उन्हें झकझोर कर रख दिया।

फिर शुरू हुई एक ऐसी लड़ाई जो रणभूमि से परे लड़ी गई। लक्ष्य बना सियाचिन में एक अस्पताल का निर्माण जिसे बनाना टाइगर हिल पर कब्जा जमाने से कम नहीं था। रणबांकुरों के इलाके कोल्हापुर के प्रताप सिंह जाधव ने जानकारी जुटाई और जुट गए सियाचिन में एक अत्याधुनिक अस्पताल बनवाने की मुहिम में। उस समय जार्ज फर्नांडीज देश के रक्षामंत्री थे। उनसे मुलाकात कर जाधव ने कहा कि पुढारी ग्रुप और कोल्हापुर के लोग उस अस्पताल को बनवाने के लिए हर मदद करेंगे।  केंद्रीय सैन्य कल्याण निधि से विशेष अनुमति लेकर पैसा जुटाने का कार्य शुरू हुआ। इस अभियान से लगभग 2.5 करोड़ रुपये जमा हुए। जाधव ने रक्षा मंत्रालय से यह भी अपील की कि इस रुपये को सिर्फ और सिर्फ अस्पताल के निर्माण पर ही खर्च किया जाए। 1999 में यह पैसा मंत्रालय को सौंपा गया और उसके बाद 2002 में भी मेडिकल उपकरण खरीदने के लिए भी 25 लाख रुपये दिए गए।

वाकई युद्ध की ही गति से अस्पताल का बनना शुरू हुआ और महज चार साल छह महीनों में ही अस्पताल बन करके तैयार हो गया। ऐसा होना फिल्मी स्क्रिप्ट से निकला लग सकता है लेकिन ऐसा हुआ और सैनिकों को एक ऐसी सुविधा मिल गई जिसकी उतनी ही जरूरत थी जितनी सियाचिन में सेना की तैनाती जरूरी है। आज न केवल जवान बल्कि आम आदमी भी जो नुबरा घाटी के आसपास के गांवों में रहता है, उसका लाभ ले रहा है। वहां से अब तक 48,000 जवानों को इलाज के द्वारा स्वस्थ किया जा चुका है जो किसी उपलब्धि से कम नहीं है। जाधव कहते हैं कि मार्च 2012 में इस अस्पताल को दस वर्ष पूरे होने पर वे अपने हर्जे खर्चे पर वहां एक बड़ा फंक्‍शन करवाएंगे। उनका कहना है कि इससे समाज में भारतीय सेना के लिए लोगों में कुछ अलग करने का जज्बा पैदा होगा।

2003 में तत्कालीन राष्‍ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें उनकी समर्पित समाज सेवा और देशभक्त पत्रकारिता के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया। प्रताप सिंह जाधव को इसके साथ ही नचिकेता सम्मान तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने देकर सम्मानित किया। बीते साल 2011 में हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय के सैन्य अध्ययन केन्द्र द्वारा एक शोध में सियाचीन में भारतीय सेना के लिए बनवाए गए बेमिशाल अस्पताल के योगदान को देखते हुए उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि से सम्मानित किया है। प्रताप सिंह जाधव के साथ एक और विषेशता जुड़ी हुई वह है उनके स्वर्गीय पिता गणपतराव जाधव के बाद उनको मिला पद्मश्री सम्मान शायद वे भारत के कुछ ऐसे गिनेचुने लोगों में शुमार किए जाते है जिन्हें पिता और पुत्र दोनों को भारत के श्रेष्‍ठ पद्म सम्मान पाने का गौरव प्राप्त है।

पारुल सिंह की रिपोर्ट.

 

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