Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

लघु मध्‍यम अखबारों के मालिक/प्रकाशक फर्जी तरीके से सरकार का उड़ा रहे हैं लाखों रुपये

लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों के नाम पर कतिपय अखबार मालिकों/प्रकाशकों द्वारा शासन-प्रशासन को धोखे में रखकर प्रेस कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, मानकों को ताक पर रखकर दबंगई के बल पर प्रतिवर्ष लगभग लाखों का माल उड़ाया जा रहा है। इस बात की खबर प्रशासन को भी है लेकिन वह बेबस बने हुए है। यहां तो ऐसे भी अखबार हैं जिनका प्रकाशन लगभग 4-5 वर्षों से बन्द पड़ा है लेकिन वह आज भी गोरखपुर मण्डल के जिलों से विभिन्न विभागों के विज्ञापन रूपी पोस्टर को छापकर लाखों लाख कमा रहे हैं। कुछ अखबार तो ऐसे भी छपते हैं जिनका प्रेस ही अस्तित्व में नहीं है उसके बावजूद बिना प्रेस के लाखों प्रतियों का मुद्रण हो रहा है। सर्कुलेशन के लिए कागजों का पेट भरकर अधिकारियों को गुमराह किया जाता आ रहा है,  लेकिन अफसर आंख मूंदे इन अखबार के प्रकाशकों के झांसे में आ रहे हैं और उनकी वाली करते हैं। जिसके कारण जनता की गाढ़ी कमाई से ये अखबार के मालिक मालामाल हो रहे हैं।

लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों के नाम पर कतिपय अखबार मालिकों/प्रकाशकों द्वारा शासन-प्रशासन को धोखे में रखकर प्रेस कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, मानकों को ताक पर रखकर दबंगई के बल पर प्रतिवर्ष लगभग लाखों का माल उड़ाया जा रहा है। इस बात की खबर प्रशासन को भी है लेकिन वह बेबस बने हुए है। यहां तो ऐसे भी अखबार हैं जिनका प्रकाशन लगभग 4-5 वर्षों से बन्द पड़ा है लेकिन वह आज भी गोरखपुर मण्डल के जिलों से विभिन्न विभागों के विज्ञापन रूपी पोस्टर को छापकर लाखों लाख कमा रहे हैं। कुछ अखबार तो ऐसे भी छपते हैं जिनका प्रेस ही अस्तित्व में नहीं है उसके बावजूद बिना प्रेस के लाखों प्रतियों का मुद्रण हो रहा है। सर्कुलेशन के लिए कागजों का पेट भरकर अधिकारियों को गुमराह किया जाता आ रहा है,  लेकिन अफसर आंख मूंदे इन अखबार के प्रकाशकों के झांसे में आ रहे हैं और उनकी वाली करते हैं। जिसके कारण जनता की गाढ़ी कमाई से ये अखबार के मालिक मालामाल हो रहे हैं।

डीएवीपी के पैनल में शामिल छोटे-बड़े कुल 60 अखबार तथा आरएनआई की सूची में शामिल लगभग 508 तथा जिला सूचना कार्यालय गोरखपुर के यहां सूचीबद्ध लगभग सैकड़ों अखबारों के बारे में विधिवत भौतिक एवं व्यवहारिक जांच करायी जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। शासन प्रशासन व जनता के सामने यह सच्चाई पूरी तरह से आ जायेगी कि ये जो अखबार हैं सिर्फ और सिर्फ कागजों में ही चलते हैं। जनता इनके नामों को जानती भी नहीं फिर इन अखबारों को सरकारी विभागो में कैसे मान्यता मिली है यह सोचने की बात है। यहां कहने में संकोच नहीं कि ये सारा खेल पैसे का है। जहां अखबार के मालिक सालभर में लाखों लाख लूट रहे हैं,  वहीं संबंधित विभागों के अफसरों को भी इनके द्वारा चढ़ावा पहुंचाया जा रहा है,  इसलिए ये अफसर चाहे वह आरएनआई के हों, चाहे जिला सूचना कार्यालय के अधिकारी हों, चाहे डीएवीपी के अफसरान हों सभी आंखों के अंधे व कानों के बहरे बने हुए हैं।

गोरखपुर व बस्ती मण्डल अन्तर्गत गोरखपुर जनपद, महराजगंज जनपद तथा निकटवर्ती जनपद सिद्धार्थनगर से कतिपय ऐसे ही समाचार पत्रों का प्रकाशन कागजों में हो रहा है। गोरखपुर से नव अमृत प्रभात दैनिक, यूनिवर्स रिपोर्टर दैनिक, निष्‍पक्ष टुडे दैनिक, निष्‍पक्ष न्यायाधीश दैनिक, गोरखपुर मेल दैनिक व महराजगंज से गोरखपुर मेल साप्ताहिक, राप्ती दर्पण साप्ताहिक, सिद्धार्थनगर से दैनिक गोरखपुर मेल नामक ऐसे ही समाचार पत्र हैं,  जो लम्बे कमीशन के बल पर विभागों से लाखों लाख का विज्ञापन छापते हैं और भुगतान लेते चले आ रहे हैं। इन अखबारों की सच्चाई का का पता लगाने के लिए आरटीआई रूपी हथियार का इस्तेमाल किया तो पता चला कि इनमें से कई समाचार पत्रों का प्रकाशन पिछले पांच वर्षों से बन्द है,  बावजूद इसके नव अमृत प्रभात दैनिक व निष्‍पक्ष न्यायाधीश के मालिकों द्वारा गोरखपुर जनपद व देवरिया जनपद के सभी विभागों से लगभग इन पांच सालों में 20-25 लाख रुपये का विज्ञापन भुगतान लिया जा चुका है। यहां प्रश्‍न यह है कि जब इन अखबारों का प्रकाशन बन्द है तो इनके मालिकों द्वारा किस व्यवस्था के तहत विज्ञापनों का भुगतान लिया गया है?

यूनिवर्स रिपोर्टर दैनिक, गोरखपुर मेल दैनिक, निष्‍पक्ष टुडे दैनिक, राप्ती दर्पण साप्ताहिक के बारे में जो सच्चाई सामने आयी है वह चौंकाने वाली है। जिलाधिकारी गोरखपुर के कार्यालय से इन अखबारों के प्रेसों के बारे में जो जांच करायी गयी उसमें यह पाया गया कि उक्त प्रिन्टिंग प्रेस हैं ही नहीं तो फिर प्रश्‍न यह है कि उक्त अखबार कैसे और कहां छपते हैं? बावजूद इसके सहायक सूचना निदेशक गोरखपुर ने इनके मुद्रणालयों की छपाई क्षमता के बारे में जो सूचना उपलब्ध करायी है वह भी रहस्यमय है। सहायक सूचना निदेशक गोरखपुर ने अपने पत्र के जरिए दावा किया है कि ये सभी अखबार जिस प्रेस में छपते हैं,  उनकी छपाई क्षमता क्रमश:  8000 व 3000 प्रतिघंटा है। यहां मामला यह है कि दैनिक गोरखपुर मेल,  गोरखपुर जिसकी कागजों में प्रसार संख्या लगभग 55000 है,  जो कि आठ पेज में छपता है यानि कुल एक लाख दस हजार इम्प्रेशन तो फिर 12 घंटे में ही इतनी छपाई कैसे हो रही है,  जबकि उक्त एसपी प्रिन्टर्स खरैया पोखरा बशारतपुर, गोरखपुर में बिजली का कनेक्‍शन भी नहीं है। या फिर घरेलू कनेक्‍शन से ही इस उद्योग का संचालन एसपी प्रिन्टर्स के मालिक द्वारा बिजली चोरी करके किया जा रहा है, जो अपराध है। अन्य अखबारों की छपाई विवरण पर गौर करें तो पता चलता है कि नव अमृत प्रभात दैनिक, निष्‍पक्ष न्यायाधीश दैनिक जो क्रमश: 30-40 हजार प्रतियों में छपना बताया गया है,  तो इसकी भी छपाई प्रतिदिन लगभग 80 हजार इम्प्रेशन के हिसाब से एक लाख साठ हजार प्रति होती है,  यानी गोरखपुर मेल का कागज लगभग 1 लाख दस हजार और इन दोनों अखबारों का कागज लगभग 1 लाख साठ हजार प्रति होगी।

इसके अलावा यूनिवर्स रिपोर्टर व निष्‍पक्ष टुडे की भी प्रसार संख्या 20 से 30 हजार प्रतिदिन है। इनका भी अनुमान सहज लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर ये सभी समाचार पत्र मात्र कागजों में ही 20 से 25 कापी छापे जाते हैं और मासिक नियमितता रिपोर्ट भेजने वाले अधिकारी द्वारा इन अखबार मालिकों से प्रतिमाह 40 से 50 हजार रुपये की वसूली की जाती है। इतना ही नहीं सहायक सूचना निदेशक गोरखपुर ने एक और बात अपने पत्र के माध्यम से बताई है कि उक्त प्रेसों में कार्यरत स्टाफ प्रतिदिन किसी चौराहे से लाये जाते हैं,  क्योंकि उक्त प्रेसों में कार्यरत कर्मचारियों का कोई भी विवरण प्रेस मालिक व संबंधित विभाग के पास नहीं है। साथ ही इन अखबारों में कोई भी पत्रकार, कम्प्यूटर आपरेटर, न्यूज एडीटर, फिल्ड में रिपोर्टर, सम्पादकीय स्टाफ आदि की नियुक्ति नहीं है यानी कि स्वयंभू मालिकों द्वारा ही दैनिक अखबार से सम्बन्धित सभी कार्य स्वयं ही किये जाते हैं,  जो जांच का विषय है। जबकि सच्चाई यह है कि उक्त प्रेस संचलन में है ही नहीं और ये अखबार प्रशासन की शह पर मानकों, नियमों को ताक पर रखकर मात्र विज्ञापनों के लिए कहीं किसी प्रेस में छपते हैं और लाखों लाख का भुगतान इनके मालिकों द्वारा लेकर हड़प लिया जा रहा है, जो कि चिन्ता एवं जांच का विषय है और इनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई देश हित में आवश्‍यक है।

ये अखबार मात्र कागजों में छपते हैं और इनके मालिकों/प्रकाशकों द्वारा लगभग सभी अखबारों से विज्ञापनों के रूप में मोटी रकम वसूली जा रही है। इस बात की खबर जिला प्रशासन को भी है,  लेकिन किसी ने भी इनके सम्बन्ध में आयी शिकायतों पर गौर नहीं किया अपितु उस शिकायत को उन्हीं अफसरों को जांच के लिए भेज दिया जो इसके संरक्षक हैं? सिद्धार्थनगर से प्रकाशित दैनिक गोरखपुर मेल व महराजगंज से प्रकाशित राप्ती दर्पण साप्ताहिक का तो इससे भी बुरा हाल है। ये समाचार पत्र भी शासन की सूची में विज्ञापनों के लिए मात्र कागजी खानापूर्ति करके सूचीबद्ध हैं। गोरखपुर मेल का प्रकाशन स्थल बिना प्रेस के है और हजारों प्रतियां इसकी बिना प्रेस के छप रही हैं। राप्ती दर्पण रूबी प्रिन्टर्स से छपना दिखाया गया है जबकि इसका मुद्रणालय रूबी प्रिन्टर्स कहीं पर न था और न वर्तमान में है। कुछ अखबार मालिक तो ऐसे भी है जिनका एक ही बिल्डिंग में एक ही प्रेस कई नामों से चलता है और उन प्रेसों से लगभग दर्जनों अखबार छपते हैं। यहां प्रश्‍न यह है कि 24 घंटे लगातार कौन सी मशीन चलाकर प्रतिदिन लाखों प्रतियों का मुद्रण किया जाता है,  ये सभी जांच का विषय है,  लेकिन कसमकश यह है कि इसकी जांच कब और कौन करेगा। क्या सच्चाई कभी सामने आ पायेगी या फिर जांच की औपचारिकता पूरी कर इसके भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जायेगा।

इसी तरह की जांच लगभग सूचीबद्ध सभी अखबारों के विषय में की जानी जरूरी है। कतिपय अखबारों को छोड़ दिया जाए तो शेश सभी की स्थिति यही है कि कागजों में कुछ और है वास्तविकता में कुछ और। सभी भ्रष्‍टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। सभी कमीशन का खेल खेलने में व्यस्त हैं।

गोरखपुर से जितेन्‍द्र कुमार की रिपोर्ट.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...