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लालब्रत जिंदा तो भवानीपुर कांड में कौन मारा गया था?

नक्सलवाद यकीनन देश के लिए बड़ी समस्या है लेकिन नक्सलवाद को खत्म करने के लिए चलाए जा रहे अभियान में किसी को भी मारकर उसे नक्सली का नाम दे देना क्या उचित है? नक्सली जो समाज के मुख्यधारा से दूर हैं, उन्हें समाज के करीब लाने के लिए कोशिश किया जाना तो ठीक है, लेकिन कोशिश ऐसी होनी चाहिए जिससे नक्सलवाद के पनपने पर तो रोक लगे साथ ही उन्हें समाज के मुख्यधारा से भी जोड़ा जा सके, न कि किसी को आऊट आफ प्रमोशन की खातिर मौत के घाट उतार कर नक्सली बनाकर पेश कर दिया जाए। यूं तो उत्तर प्रदेश पुलिस के कारनामों की चर्चा खबरों में आती ही रहती हैं, लेकिन हाल ही में नक्सल प्रभावित जिला सोनभद्र में जब पुलिस अधीक्षक सुभाष चन्द्र दुबे ने मृत घोषित कुख्यात नक्सली लालब्रत कोल को एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया तब लोग चौंक गए, क्योंकि ग्यारह साल पहले मिर्जापुर जिले के भवानीपुर गांव में चलाए गए नक्सलियों के विरुद्ध एक अभियान में तत्कालीन पुलिस ने हार्डकोर नक्सली लालब्रत कोल को मृत घोषित किया था, जिसके कारण अभियान में शामिल पुलिस वालों को आऊट आफ टर्म प्रमोशन भी मिला था।

नक्सलवाद यकीनन देश के लिए बड़ी समस्या है लेकिन नक्सलवाद को खत्म करने के लिए चलाए जा रहे अभियान में किसी को भी मारकर उसे नक्सली का नाम दे देना क्या उचित है? नक्सली जो समाज के मुख्यधारा से दूर हैं, उन्हें समाज के करीब लाने के लिए कोशिश किया जाना तो ठीक है, लेकिन कोशिश ऐसी होनी चाहिए जिससे नक्सलवाद के पनपने पर तो रोक लगे साथ ही उन्हें समाज के मुख्यधारा से भी जोड़ा जा सके, न कि किसी को आऊट आफ प्रमोशन की खातिर मौत के घाट उतार कर नक्सली बनाकर पेश कर दिया जाए। यूं तो उत्तर प्रदेश पुलिस के कारनामों की चर्चा खबरों में आती ही रहती हैं, लेकिन हाल ही में नक्सल प्रभावित जिला सोनभद्र में जब पुलिस अधीक्षक सुभाष चन्द्र दुबे ने मृत घोषित कुख्यात नक्सली लालब्रत कोल को एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया तब लोग चौंक गए, क्योंकि ग्यारह साल पहले मिर्जापुर जिले के भवानीपुर गांव में चलाए गए नक्सलियों के विरुद्ध एक अभियान में तत्कालीन पुलिस ने हार्डकोर नक्सली लालब्रत कोल को मृत घोषित किया था, जिसके कारण अभियान में शामिल पुलिस वालों को आऊट आफ टर्म प्रमोशन भी मिला था।

09 मार्च 2001 में सोनभद्र पुलिस और मिर्जापुर पुलिस ने संयुक्त रुप से नक्सलियों के विरुद्ध मिर्जापुर जिले के मड़िहान थाना क्षेत्र के अन्तर्गत भवानीपुर गांव में एक अभियान चलाया था। जिसमें कई लोग मारे गए थे. मारे गए लोगों में निर्दोष लोग के भी मारे जाने की चर्चा के कारण यह मुठभेड़ विवादास्पद रहा। जनचर्चा की मानें तो जिस दिन यह अभियान चलाया गया उस दिन उस गांव में रहने वाले लोगों के अलावा और भी कई लोग गांव में मौजूद थे, जो मेहमानी करने आए थे, लेकिन वे लोग पुलिस कि गोली के शिकार हो गए। खबरों पर यदि यकीन करें तो नक्सलियों के विरुद्ध इस अभियान में राजकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल, खैरपुर में कक्षा आठ में पढने वाला छात्र को भी पुलिस ने अपने गोली का शिकार बना लिया था। तो क्या नक्सलियों के नाम पर निर्दोष लोगों की जान लेने वाली पुलिस ने अपनी नौकरी और आऊट आफ प्रमोशन के लिए मृत निर्दोष लोगों को भी हार्डकोर नक्सलियों घोषित कर अपना हित साध लिया था?

अब जबकि लालब्रत कोल को सोनभद्र पुलिस ने मंगलवार 29 जून 2012 में एक मुठभेड के बाद जिंदा गिरफ्तार कर लिया है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब लालब्रत कोल जिंदा है तो ग्यारह साल पहले मरने वाला कौन था? और सबसे अहम सवाल क्या भवानीपुर में नक्सलियों के विरुद्ध जो संयुक्त रुप से हुई कार्रवाई की निष्पक्ष जांच होगी?

लेखक अब्‍दुल रशीद सिंगरौली में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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