Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिजनेस

‘लालाजी, अगर हम चैनल पर ब्लू फिल्म भी चला दें तो खूब नोट कूट सकते हैं’

मीडिया, जिसे कभी आम आदमी की आवाज माना जाता था, जिस पर निर्भीक एवँ निष्पक्ष रूप से सच को सामने लाने की जिम्मेदारी थी, आज अपने मूल उद्देश्य से भटका हुआ नजर आता है। कभी मिशन एवँ चुनौती के रूप में की जाने वाले पत्रकारिता अब चाटुकारिता के रूप में ढलती जा रही है और अब ये पूर्णरूप से एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है। कारण साफ़ है, मीडिया में पूँजीपतियों का बढ़ता दखल। वर्तमान की बात की जाये तो चाहें खबरिया चैनल हों या फिर अखबार, जनता के सामने केवल प्रायोजित ख़बरों को ही रखते हैं। उद्देश्य होता है सनसनी पैदा करना और फिर जुगाड़ करने में लग जाना। जी के संपादकों का कृत्य इसका हालिया समय का एक अच्छा उदाहरण है।

मीडिया, जिसे कभी आम आदमी की आवाज माना जाता था, जिस पर निर्भीक एवँ निष्पक्ष रूप से सच को सामने लाने की जिम्मेदारी थी, आज अपने मूल उद्देश्य से भटका हुआ नजर आता है। कभी मिशन एवँ चुनौती के रूप में की जाने वाले पत्रकारिता अब चाटुकारिता के रूप में ढलती जा रही है और अब ये पूर्णरूप से एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है। कारण साफ़ है, मीडिया में पूँजीपतियों का बढ़ता दखल। वर्तमान की बात की जाये तो चाहें खबरिया चैनल हों या फिर अखबार, जनता के सामने केवल प्रायोजित ख़बरों को ही रखते हैं। उद्देश्य होता है सनसनी पैदा करना और फिर जुगाड़ करने में लग जाना। जी के संपादकों का कृत्य इसका हालिया समय का एक अच्छा उदाहरण है।

वर्तमान में हालात ये है कि जिसके पास कहीं से भी कुछ करोड़ रुपए आ जाते हैं वो एक खबरिया चैनल अथवा अखबार खोल कर बैठ जाता है, इस उद्देश्य के साथ कि कम से कम शासन/प्रशासन पर मीडिया के नाम का दवाब बनाकर अपने हित के काम तो करवा ही लेगा। और ऐसे लोग पत्रकारों को खबर एकत्र करने वाले खबरनवीसों के बजाय एक नए प्रकार से प्रयोग करते है और वह प्रकार है मालिक/कम्पनी के लिए पैसा जमा करके लाने वाली मशीन का, फिर चाहें उसके लिए कोई भी हथकंडा क्यूँ न अपनाना पड़े। जनसरोकार की ख़बरों से इनका दूर दूर तक कोई नाता नहीं होता, कभी कोई स्वर्ग की सीढियां ढूंढ रहा होता है, तो कोई कुछ ज्योतिषियों को बैठाकर लोगों का भविष्य बता रहा होता है। कोई अभिनेत्रियों का मोटापा दिखा रहा होता है तो कोई किसी के घर के छज्जे पर बैठी “सुन्दर बिल्लोरानी” की तस्वीरें दिखा रहा होता है। न्यूज क्वालिटी और न्यूज कंटेंट से कोई सरोकार नहीं होता इन्हें। विज्ञापन चाहें किसी भी प्रकार के हों छापे/दिखाए जाते हैं, कारण होता है टीआरपी को बढ़ाना-चाहें जैसे भी! कल नेट पर कुछ सर्च करते समय नजर एक कार्टून पर पड़ी जो कि आज के समय के मीडिया की हालत को बयान करने के लिए काफी है। वो कार्टून यहाँ नीचे दिया हुआ है:-
“थोड़ा लिखे को बहुत समझियेगा”।

लेखक शिवम भारद्वाज पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...