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लेखक की सिद्धियां

लेखक बड़ा प्रतापी जीव है। वह अनेक रूप, वेश में इस पावन धरा-धाम पर मौजूद है और रहेगा। वह दुर्लभतम प्राणी है परंतु अपनी अनंत प्रज्ञा-चक्षु के साथ सर्वत्र मौजूद है। कल्पना नाम की यक्षिणी उसे सहज ही सिद्ध होती है। यथार्थ का ब्रह्मराक्षस उसकी नसों में दौड़ता रहता है। इन दो परम और महामूर्त साधनों के सहारे वह कोई भी रचना सिद्ध कर सकता है, कहीं भी पहुंच सकता है, किसी के भी  दिल में प्रवेश कर सकता है, किसी की भी  काया में अपना निवास बना सकता है। उसे स्वभाव से ही परकायाप्रवेश की अद्भूत शक्ति मिली हुई होती है। यह विद्या सिद्धों, तांत्रिकों की परंपरा से चलकर सीधे अधुनातन लेखकों के हृदय में प्रादुर्भूत हो गयी है।

लेखक बड़ा प्रतापी जीव है। वह अनेक रूप, वेश में इस पावन धरा-धाम पर मौजूद है और रहेगा। वह दुर्लभतम प्राणी है परंतु अपनी अनंत प्रज्ञा-चक्षु के साथ सर्वत्र मौजूद है। कल्पना नाम की यक्षिणी उसे सहज ही सिद्ध होती है। यथार्थ का ब्रह्मराक्षस उसकी नसों में दौड़ता रहता है। इन दो परम और महामूर्त साधनों के सहारे वह कोई भी रचना सिद्ध कर सकता है, कहीं भी पहुंच सकता है, किसी के भी  दिल में प्रवेश कर सकता है, किसी की भी  काया में अपना निवास बना सकता है। उसे स्वभाव से ही परकायाप्रवेश की अद्भूत शक्ति मिली हुई होती है। यह विद्या सिद्धों, तांत्रिकों की परंपरा से चलकर सीधे अधुनातन लेखकों के हृदय में प्रादुर्भूत हो गयी है।
किसी के दिल की छोटी से छोटी हरकत भी वह बड़ी आसानी से महसूस कर लेता है। उसकी धड़कनें गिन सकता है, जान सकता है कि वह किसके लिए धड़क रहा है। उसकी सारी इंद्रियां सोते-जागते हमेशा सीमाओं पर खड़े पहरेदारों की तरह चौकस रहती हैं। वह अपनी प्रस्तरभेदी आंखों का हर संभव इस्तेमाल करता है। हर पदार्थ, वस्तु, परिस्थिति को गहराई से देखता है। प्रकाश-अंधकार, जड़-जंगम, भूत-अभूत, मूर्त-अमूर्त, कुछ भी उसकी नजर से बचा नहीं रह सकता। अंधेरे में वह ज्यादा दूर तक और ज्यादा साफ देख सकता है। वह अपना दीप स्वयं होता है, स्वयं प्रकाशक होता है। हर चीज को प्रकाश में लाना वह अपना परम धर्म समझता है। अपनी रचनाओं को भी। छपीं तो ठीक अन्यथा सारे यत्न करके लोकसेवार्थ उन्हें प्रकाशित करता है और ग्रंथालयों तक पहुंचाता है। इस अर्थ में वह परम लोककल्याणक की भूमिका निभाता है।

लेखकों की महत्ता देख लेखक, कवि, कहानीकार बनने की आजकल होड़ मची है। तमाम अलेखकीय प्रतिभाओं ने भी इस होड़ में कदम बढ़ा लिया है। जब अपना प्रकाश नहीं है तो विकल्प सीमित हैं। या तो कुछ रोशनी उधार लो या चुरा लो या फिर अंधेरे को ही रोशनी समझो, कुछ भी अगड़म-बगड़म लिखो और उसे प्रकाशित करो। यह धंधा खूब फल-फूल रहा है। हर प्रबुद्ध और संवेदनशील लेखक सौंदर्य का पारखी होता है और आकांक्षी भी। वह सुंदर दुनिया के निर्माण के सपने देखता है, इसीलिए हर सुंदर दृश्य, वस्तु या जीव उसे प्रिय होता है। वह सौंदर्य के कारक तत्वों की तलाश में इस जड़ जगत में उपलब्ध हर सुंदरता का तन-मन से छिद्रान्वेषण करता है।

उसकी आंखों में एक ऐसी विलक्षणता होती है कि वह आर-पार देख सकता है। कोई आवरण उसे देखने से रोक नहीं सकता। वह क्षण मात्र में रोम-रोम का परीक्षण कर सकता है। उसकी घ्राण शक्ति के  तो क्या कहने। वह बंद दरवाजे के दूसरी तरफ की उपस्थिति को सूंघ सकता है। वह किसी मन के भीतर से पसरती गंध तक की पड़ताल कर सकता है। अभी पुलिस को इसकी जानकारी नहीं। उसकी श्रवणेंद्रियां ऐसी चीखें भी सुन सकती हैं, जो आम तौर पर लोगों को सुनायी नहीं पड़तीं। वह बेआवाज ध्वनियां भी पकड़ सकता है। स्पर्श से तो वह वर्तमान, भूत और भविष्य सब कुछ जान सकता है। हर नया दृश्य, हर नयी ध्वनि, हर नयी गंध और हर नया स्पर्श उसके लिए अमूल्य होता है, एक नये अनुभव की तरह, स्मृति में संजोकर रखने लायक।

वह जानता है कि लेखक होना ही नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए। बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जो कुछ ·भिन्न दिखने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते। ऐसी कोई सुनिश्चित पहचान नहीं है जो आप देखते ही जान लें कि यह लेखक है या वह लेखक नहीं है लेकिन हां, कुछ खास लक्षण इसमें मदद कर सकते हैं। नाम कुछ अद्भूत सा हो सकता है, जिसे सुनते ही आप को लगे कि मां-बाप ने बड़े परिश्रम से शब्दकोश छानकर रखा है। मसलन उत्कटाभ, अनाक्रांत, अद्भूतांत आदि। दाढ़ी हो सकती है, झोला हो सकता है, पैंट और कुर्ते के साथ स्लीपर हो सकता है। इसमें झोला बहुत महत्वपूर्ण चीज है। शाम को उपयोग में आने वाली कुछ जरूरी चीजें झोले में आ जाती हैं। जिनके पास झोला नहीं होता, उन्हें बड़ी भाग-दौड़ करनी पड़ती है।

लेखक समाज का बहुत जरूरी तत्व है। वह काल के सीने पर अपनी रचना साधना करता है। इस मामले में वह शव-साधकों से भी कई कदम आगे है। कहते हैं कि शव साधना में तांत्रिक या तो उस शव की आत्मा को अपने मंत्र-रज्जु से बांध लेता है या फिर शव में प्रवेश कर उसे मृत्यु से वापस खींच लेता है। लेखक तो काल से दो-दो हाथ करता है, कई बार वह काल का अतिक्रमण कर जाता है, कालजयी हो जाता है पर उसका अपना कल बड़ा अनिश्चित होता है। वह बड़ा स्वाभिमानी जीव होता है। उसका लिखा हुआ भले कहीं न छपे लेकिन अगर आप आग्रहपूर्वक कुछ लिखवाना चाहें, तो आप को नाज-नखरे उठाने के लिए तैयार रहना होगा। पुरस्कार, प्रतिष्ठा, सम्मान उसे आसानी से पिघला सकते हैं। इसके लिए वह किसी हद तक जा सकता है, कुछ भी कर सकता है। लेखक उस अंतर्यामी से कम नहीं है, जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग पूरा जीवन साधना में लुटा देते हैं। लेखक से जिसका पाला पड़े, वही उसके मर्म को समझ पायेगा। ऐसे परमादरणीय लेखक नामधारी प्राणी को मेरा प्रणाम।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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