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वनग्रामों के विकास के नाम पर दर्जन भर से ज्यादा राज्यों में दुर्दांत लूट

देश में मौजूद आदिवासी बहुल वनग्रामों के विकास के लिए केंद्र ने जो धनराशि अब तक भेजी है, उसके खर्च की सही जानकारी केंद्र को पता चल जाए, तो एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हो सकता है। केंद्र सरकार हर साल वनग्रामों के विकास के लिए धन देती जा रही है, लेकिन वे पैसे आज तक उन आदिवासियों तक नहीं पहुंचे हैं। वनग्रामों के आदिवासी आज भी नंग-धड़ंग अवस्था में भोजन पानी के लिए तरस रहे हैं। देश के 12 राज्यों में स्थित आदिवासी बहुल 2474 वनग्राम आज भी विकास के लिए तरस रहे हैं। कहने के लिए हमें आजादी मिले हुए 64 साल हो गए, लेकिन देश के इन वनग्रामों में आजादी की बयार आज तक नहीं पहुंची है। न रहने को घर, न खाने को भरपूर अनाज। वनोपज और थोड़ी खेती पर जीने वाले वनग्राम के आदिवासियों से आपकी मुलाकात हो जाए, तो लोकतंत्र का ककहरा आप भूल जाएंगे।

देश में मौजूद आदिवासी बहुल वनग्रामों के विकास के लिए केंद्र ने जो धनराशि अब तक भेजी है, उसके खर्च की सही जानकारी केंद्र को पता चल जाए, तो एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हो सकता है। केंद्र सरकार हर साल वनग्रामों के विकास के लिए धन देती जा रही है, लेकिन वे पैसे आज तक उन आदिवासियों तक नहीं पहुंचे हैं। वनग्रामों के आदिवासी आज भी नंग-धड़ंग अवस्था में भोजन पानी के लिए तरस रहे हैं। देश के 12 राज्यों में स्थित आदिवासी बहुल 2474 वनग्राम आज भी विकास के लिए तरस रहे हैं। कहने के लिए हमें आजादी मिले हुए 64 साल हो गए, लेकिन देश के इन वनग्रामों में आजादी की बयार आज तक नहीं पहुंची है। न रहने को घर, न खाने को भरपूर अनाज। वनोपज और थोड़ी खेती पर जीने वाले वनग्राम के आदिवासियों से आपकी मुलाकात हो जाए, तो लोकतंत्र का ककहरा आप भूल जाएंगे।

मध्य प्रदेश में 893 वनग्राम हैं। देश में सबसे ज्यादा वनग्राम इसी प्रदेश में है। इन वनग्रामों के विकास के लिए पिछले चार सालों में 25993 लाख रुपये दिए गए, लेकिन प्रदेश के किसी भी वनग्राम में आज तक सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं। प्रदेश के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम कहते हैं कि आदिवासियों को लूटकर ही बाकी लोग धनी दिख रहे हैं। ज्ञातव्य है कि आजादी से पूर्व वानिकी के विभिन्न कामों के लिए और सुरक्षित श्रमशक्ति उपलब्ध कराने के लिए वन इलाकों में आवास स्थापित किए गए थे। आबादी बढ़ने के साथ ही ये आवास गांवों में बदल गए। ये वनग्राम जिलों के राजस्व प्रशासन से बाहर हैं, इसलिए इन गांवों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। आप कह सकते हैं कि इन गांवों से राजस्व नहीं वसूला जाता, इसलिए ये वनग्राम विकास से कोसों दूर हैं। अभी 12 राज्यों में 2,474 ऐसे वनग्राम हैं, जिनका प्रबंधन वन विभाग कर रहा है। इन 2474 वनग्रामों की आबादी कोई लाख के आसपास है। इन ग्रामों के विकास के लिए वैसे सरकार हर साल पैसे देती रही है, लेकिन 10 वी पंचवर्षीय योजना में इन ग्रामों पर खास ध्यान दिया गया और इसके लिए अलग से राशि भी निर्धारित की गई।

10वीं पंचवर्षीय योजना में प्रत्येक वनग्राम के लिए औसतन 15 लाख रुपये निर्धरित किए गए और कुल मिलाकर 450 करोड़ की धनराशि आवंटित की गई। सन 2005 से 2010-11 तक के लिए क्रमश: 230 करोड़, 220 करोड़, 150 करोड़, 150 करोड़, 100 करोड़ और 60 करोड़ रुपये दिए गए। इसके अलावा 31 दिसंबर 2010 तक इन ग्रामों के लिए अलग से 267 करोड़ की राशि दी गई है। इस राशि को जोडें, तो पता चलता है कि मात्र ढाई लाख की आबादी को विकसित करने के लिए लगभग एक हजार करोड़ की राशि आवंटित हो चुकी है, लेकिन वनग्रामों की दशा नहीं सुधर पाई है। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा कहते हैं कि आप वनग्रामों की बात क्यों कर रहे हैं? जब प्रदेश के आम गांवों के हालात ठीक नहीं हैं, तो आदिवासियों की बात कौन करे? प्रदेश में अभी 425 वनग्राम हैं और वहां पहुंचना मुश्किल है। जब आप वहां पहुंच ही नहीं सकते, तो वहां का हाल चाल कैसे लेंगे? चूंकि यह इलाका नक्सलवाद से पीड़ित है, इसलिए नक्सलवाद और खतरनाक इलाका के नाम पर योजना की सारी राशि अफसरों की जेब में जा रही है। जिन वनग्रामों की जिम्मेदारी फॉरेस्ट विभाग पर है, उस विभाग को भी अपने इलाके के गांवों के बारे में पता नहीं है। आप ही बताएं कि फिर वहां पहुंच कौन रहा है और राशि कहां जा रही है?

वनग्रामों के विकास के नाम पर लूट की ऐसी ही कहानी अन्य 12 राज्यों की भी है। झारखंड में भी 24 वनग्राम हैं। पश्चिम सिंहभूमि के सारंडा डिवीजन में 10 वनग्राम हैं। नक्सलवाद से पीड़ित यह इलाका अपनी बदहाली पर तो रो ही रहा है, नक्सलवाद के नाम पर जिस तरह से इन इलाकों की योजनाओं को लूटा जा रहा है, उसकी फरियाद कहीं नहीं है। सारंडा डिवीजन के ये वनग्राम हैं -दीघा, तिरीपोसी, बिटकीलसोया, नवगांव, नवगांव 1, थोलकाबाद, करमपदा, कुम्डी और भोगांव। इसी तरह कोल्हान डिवीजन में चार वनग्राम हैं। हुसीपी, तुमबहाका, राजबासा और रंगामारी। पलामू जिले के डाल्टेनगंज में पंडारा, घुंटुआ, विजयपुर, हेनार, गोपखनार, रमाडांग, कुजुरूम, लसतु और मेरल गांव वनग्रामों की सूची में दर्ज हैं, लेकिन आज तक किसी नेता या अधिकारी ने यहां पहुंचने की जहमत नहीं उठाई।

झामुमो नेता साइमन मरांडी कहते हैं कि कहने के लिए आदिवासी इलाके की सारी सरकारें खूब काम कर रही हैं, लेकिन आदिवासी वहीं के वहीं हैं। आज भी उनकी लंगोटी समाप्त नहीं हुई है। अगर विकास हो रहा है, तो लोगों के हालात क्यों नहीं बदल रहे हैं? जहां तक वनग्रामों की बात है, वहां कौन जा रहा है? देश में सबसे ज्यादा वनग्रामों की संख्या असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल में हैं। असम में वनग्रामों की संख्या 499 है। इस राज्य में भी लगातार वनग्रामों के लिए धन जा रहा है, लेकिन दिखता कुछ नहीं है। जनजातीय मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि केंद्र का काम योजना के लिए पैसे भेजना है। वहां काम करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और वहां काम नहीं हो रहा है, तो हम इसकी जानकारी लेने में लगे हैं।’

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक हमवतन से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख हमवतन से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

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