अतीत की डोर से बंधकर ही भविष्य के सपने तैयार होते हैं। अतीत सुनहरा हो तो भविष्य के लिए उम्मीदें बढ़ जाती हैं, और यदि अतीत बदरंग हो, तो भी उससे सबक लेकर बेहतर भविष्य की कल्पना साकार की जा सकती है। बीते दिनों सेनाध्यक्ष वीके सिंह और रक्षा मंत्रालय के बीच हुआ विवाद हम सबने देखा और खुद की सुरक्षा को लेकर आशंकित भी हुए। खैर! अब ये बीती बात हो चुकी है और हम हिन्दुस्तानी भूल जाने में बेहद माहिर हैं। हम गुजरात दंगे भूल गए, बावरी कांड भूल गए, ताबूत घोटाला भूल गए और बोफोर्स को तो खैर सरकार ने खुद ही बिसरा दिया। और अब देश की सुरक्षा से जुड़े अति महत्वपूर्ण टाट्रा मामले को भी हमने भुला दिया। फेहरिस्त लंबी है और हम अब भी भूलने की इस बीमारी से बाज नहीं आ रहे हैं। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह जाते-जाते स्वच्छ छवि के रक्षामंत्री एंटनी को भी लपेटते ले गए। उन्होंने रक्षा मंत्रालय पर जो आरोप लगाए हैं, वे सही हैं या नहीं, ये तो जांच का विषय है, लेकिन अब जब वे रिटायर्ड हो गए हैं, तो इस ओर कोई कार्रवाई की उम्मीद बेमानी ही है। अब वक्त नए सेनाध्यक्ष विक्रम सिंह का है।
विक्रम सिंह ने ऐसे वक्त सेना की कमान संभाली है, जब सेना मे बैठे उच्च अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़ने शुरु हो चुके हैं। ऐसे में विक्रम से कोई उम्मीद रखना फिलहाल ज्यादती ही होगी, लेकिन पद ग्रहण करते ही उन्होंने जो बयान दिया उससे तो लगता नहीं कि वे पहले से चली आ रही बंधी-बंधाई लीक से आगे कुछ सोचने का साहस कर पाएंगे। पद संभालते ही उन्होंने पूर्व सेनाध्यक्ष द्वारा हाल ही में उठाए गए मुद्दों और विवादों के विषय को तवज्जो देने से इंकार करते हुए मीडिया के सामने कहा कि सेना की गाड़ी विंडस्क्रीन देखकर चलाई जाएगी, न कि रियर व्यू मिरर देखकर। उनके बयान से स्पष्ट है कि वे भी ‘भूल जाने’ की (कु)मानसिकता के पोषक भर हैं, जो यह सोचते हैं कि अपनी नौकरी बजाओ, दुनिया जाए भाड़ में। अब जरा एक नजर विक्रम सिंह के अतीत पर डाल लें। सेनाध्यक्ष बनने से पूर्व वे कोलकाता स्थित उस पूर्वी सैन्य कमान के प्रमुख थे, जिसके मातहत तीसरी कोर के प्रमुख लेफ्टिनेंट डीएस सुहाग पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर तीन व्यक्तियों को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने के गंभीर आरोप हैं। विक्रम सिंह के विंडस्क्रीन से शायद ही उन मृतकों की लाशें दिखाई दें, क्योंकि उनके मातहत होने के कारण उनकी भी इस मामले में पूरी जवाबदेही बनती है। इसलिए विक्रम सिंह को समझना होगा कि विंडस्क्रन से आगे की ओर देखना अच्छा है, लेकिन रियर व्यू मिरर भी तो ऐसे ही नहीं बनाया जाता। अतीत से सबक लेकर ही आगे का सफर तय होता है श्रीमान्।
लेखक मनु मनस्वी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


