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विजय कुमार ने दिखाया ‘हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं’

यमुनानगर। शिक्षा और मीडिया के विकास के तमाम दावों के बावजूद मौजूदा दौर की बिडंबना ही कही जाएगी कि नई पीढ़ी समकालीन राजनीतिक घटनाक्रमों से खास बावस्ता नहीं रखती। इसके बावजूद हरिशंकर परसाई का व्यंग्य – हम बिहार में चुनाव लडऩे जा रहे हैं – अगर नई पीढ़ी के दर्शकों को डेढ़ घंटे तक बांधे रख सका तो निश्चित रूप से इसका श्रेय विजय कुमार को जाता है। विजय कुमार ने अपनी इस सोलो प्रस्तुति में हरिशंकर परसाई के लेखन से भी आगे जाकर मौजूदा राजनीतिक विद्रूपताओं को बखूबी उजागर किया है। परसाई की यह रचना दरअसल बिहार में अचानक चुनाव लड़ने पहुंचे भगवान श्रीकृष्ण के सामने आती चुनौतियों पर करारा व्यंग्य है। इस व्यंग्य को रंगमंच पर उकेरना और उतारना आसान नहीं। सिर्फ एकल अभिनय के लिए तो यह चुनौती और भी बढ़ जाती है। लेकिन विजय कुमार इसके नाट्य रूप से साथ न्याय करते हुए इस व्यंग्य को दर्शकों तक बखूबी पहुंचा पाने में कामयाब हैं।

यमुनानगर। शिक्षा और मीडिया के विकास के तमाम दावों के बावजूद मौजूदा दौर की बिडंबना ही कही जाएगी कि नई पीढ़ी समकालीन राजनीतिक घटनाक्रमों से खास बावस्ता नहीं रखती। इसके बावजूद हरिशंकर परसाई का व्यंग्य – हम बिहार में चुनाव लडऩे जा रहे हैं – अगर नई पीढ़ी के दर्शकों को डेढ़ घंटे तक बांधे रख सका तो निश्चित रूप से इसका श्रेय विजय कुमार को जाता है। विजय कुमार ने अपनी इस सोलो प्रस्तुति में हरिशंकर परसाई के लेखन से भी आगे जाकर मौजूदा राजनीतिक विद्रूपताओं को बखूबी उजागर किया है। परसाई की यह रचना दरअसल बिहार में अचानक चुनाव लड़ने पहुंचे भगवान श्रीकृष्ण के सामने आती चुनौतियों पर करारा व्यंग्य है। इस व्यंग्य को रंगमंच पर उकेरना और उतारना आसान नहीं। सिर्फ एकल अभिनय के लिए तो यह चुनौती और भी बढ़ जाती है। लेकिन विजय कुमार इसके नाट्य रूप से साथ न्याय करते हुए इस व्यंग्य को दर्शकों तक बखूबी पहुंचा पाने में कामयाब हैं।
उनकी कामयाबी को इसी से देखा-परखा जा सकता है कि डीएवी कॉलेज फॉर गल्र्स, यमुनानगर के मंच पर विजय कुमार ने जैसे ही इस नाटक को खत्म किया, दर्शकों का रेला उन्हें बधाई देने पहुंच गया। इनमें से ज्यादातर दर्शक दरभंगा के राजा कामाख्या प्रसाद नारायण सिंह, श्रीकृष्ण सिन्हा या ऐसे ही दूसरे नामों को नहीं जानते, पर उनके राजनीतिक चरित्र को वे एक हद तक समझ पाए। जातिवाद की राजनीति के लिए बिहार कुछ ज्यादा ही बदनाम है। हालांकि आज के दौर की लगभग समूची भारतीय राजनीति इस बुराई की चपेट में है। ऐसे में हरिशंकर परसाई का व्यंग्य मौजूदा राजनीतिक तंत्र पर एक रूपक की तरह व्यंग्य करता है। चूंकि विजय कुमार खुद पटना के रहने वाले हैं, उन्हें भोजपुरी और बिहारी लोक नाट्य शैलियों और लोकरंग की जानकारी है, लिहाजा उनकी इस एकल प्रस्तुति में लोकरंग के ये नजारे बार-बार सामने आते हैं।

खासतौर पर कृष्ण को लेकर गीतों की प्रस्तुति में भोजपुरी लोकरंग के बार-बार दर्शन होते हैं। एक हद तक लोकनाट्य रंग इस एकल प्रस्तुति की जरूरत भी बन गए हैं। इनके जरिए दर्शकों से विजय सीधा संवाद बनाए रखते हैं। इस तरह हरिशंकर परसाई का व्यंग्य, जो नाट्य रूप में आते-बढ़ते विजय कुमार का नाट्य रंग बन गया है, को दर्शकों तक सही संदर्भों में पहुंच पाता है। नाटक के आखिर में दर्शकों पता चल ही जाता है कि आखिर बिहार का राजनीतिक यथार्थ क्या है, जिसमें आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवी तक उस राजनीतिक व्यवस्था के सड़ांध का हिस्सा बन गया है। विजय कुमार कहते हैं कि इस नाटक में मौजूदा सवालों से भटकाकर जो राजनीति की जा रही है, उसे दिखाने का प्रयास किया गया है। विजय कुमार का कहना है कि हमने जो दिखाया, वह किसी के लिए नया नहीं है। लेकिन यह लोगों के प्रतिरोध का स्वर है, जिसे उन्होंने रंगकर्म के माध्यम से व्यक्त किया है।

एनएसडी से ग्रेजुएट विजय कुमार की ये एकल प्रस्तुति इतनी विख्यात है कि इसके अब तक चार सौ से ज्यादा शो हो चुके हैं। विजय कुमार ने लंदन से भी रंगकर्म की ट्रेनिंग ली है। उन्होंने श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास रागदरबारी पर आधारित इसी नाम के नाटक के साथ ही तफ्तीश आदि में भी काम किया है। बेगम बरवे और रागदरबारी समेत कई नाटकों का उन्होंने प्रदर्शन किया है। उनकी संस्था मंच करीब बीस सालों से देशभर में नाटकों का मंचन कर रही है। उन्होंने काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर आधारित चंद्रप्रकाश द्विवेदी की मोहल्ला अस्सी नाम की फिल्म में भी अभिनय किया है। कालेज प्रिंसिपल ने कहा कि इस प्रकार के नाटकों से विद्यार्थियों में जागरूकता आती है। उन्होंने विजय कुमार को पुष्प गुच्छ देकर सम्मानित किया। प्रेस रिलीज

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