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‘विजेता धोखा नहीं देते’ : नैतिकता की राह के जरिए कामयाबी का पाठ पढ़ाती एक किताब

हिंदी प्रकाशन का मतलब हाल के कुछ दिनों पहले तक सिर्फ साहित्य और उसमें भी कहानी-उपन्यास और कविता की पुस्तकों का प्रकाशन होता था। लेकिन अब हिंदी प्रकाशन की दुनिया बदल रही है। हिंदी का नया पाठक वर्ग विकसित भी हुआ है। उदारीकरण के बाद हिंदी पाठकों की भी दिलचस्पी नई आर्थिकी, नए दौर के व्यवसाय और नए जीवन मूल्यों की तरफ बढ़ी है। यही वजह है कि अब व्यवहार, व्यापार से लेकर नए मूल्यों और उन मूल्यों से सामंजस्य बढ़ाने की दिशा में सोच-विचार बढ़ाने वाली पुस्तकों की भी मांग बढ़ी है।  शायद यह मांग ही है कि अब प्रकाशक भी इसे पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। हालांकि ऐसी किताबें अब भी महंगी हैं। उन्हें कुछ सस्ती दरों पर पेश किया जाना चाहिए, ताकि हिंदीभाषी वे पाठक जो कस्बों-गांवों में रहते हैं, लेकिन नई आर्थिकी और नई दुनिया से तालमेल बढ़ाते हु्ए आगे बढ़ने की ख्वाहिश रखते हैं, वे इन पुस्तकों को खरीदें और पढ़कर फायदा उठा सकें।

हिंदी प्रकाशन का मतलब हाल के कुछ दिनों पहले तक सिर्फ साहित्य और उसमें भी कहानी-उपन्यास और कविता की पुस्तकों का प्रकाशन होता था। लेकिन अब हिंदी प्रकाशन की दुनिया बदल रही है। हिंदी का नया पाठक वर्ग विकसित भी हुआ है। उदारीकरण के बाद हिंदी पाठकों की भी दिलचस्पी नई आर्थिकी, नए दौर के व्यवसाय और नए जीवन मूल्यों की तरफ बढ़ी है। यही वजह है कि अब व्यवहार, व्यापार से लेकर नए मूल्यों और उन मूल्यों से सामंजस्य बढ़ाने की दिशा में सोच-विचार बढ़ाने वाली पुस्तकों की भी मांग बढ़ी है।  शायद यह मांग ही है कि अब प्रकाशक भी इसे पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। हालांकि ऐसी किताबें अब भी महंगी हैं। उन्हें कुछ सस्ती दरों पर पेश किया जाना चाहिए, ताकि हिंदीभाषी वे पाठक जो कस्बों-गांवों में रहते हैं, लेकिन नई आर्थिकी और नई दुनिया से तालमेल बढ़ाते हु्ए आगे बढ़ने की ख्वाहिश रखते हैं, वे इन पुस्तकों को खरीदें और पढ़कर फायदा उठा सकें।

 

बहरहाल ऐसी ही एक पुस्तक है – विजेता धोखा नहीं देते। यह पुस्तक दुनिया के जानी-मानी  कंपनी हंट्समैन कारपोरेशन के संस्थापक जॉन एम हंट्समैन के अनुभवों का संकलन है। 1970 में अपने भाई के साथ हंट्समैन ने ये कंपनी शुरू की थी और 2000 तक आते-आते 600 अरब डॉलर की कंपनी बन गई। इस कंपनी के बनने और उसके आगे बढ़ने की कहानी को उन्होंने अपने अनुभवों के तौर पर पेश किया है। दिलचस्प बात ये है कि इस पुस्तक में बिजनेस के वे पारंपरिक मानक और चलनों से इतन अनुभव हैं। आमतौर पर माना जाता है कि बिजनेस में हेराफेरी किए और झूठ बोले बिना काम नहीं चलता। लेकिन हंट्समैन के विचार इसके ठीक विपरीत हैं। कुछ –कुछ भारतीय उद्योगपति इंन्फोसिस के संस्थापक एन आर नारायणमूर्ति की तरह ही हंट्समैन के भी विचार हैं। जहां ईमानदारी का कोई विकल्प नजर नहीं आता। हंट्समैन के अनुभव बताते हैं कि इसके बावजूद सौ फीसदी सफलता हासिल की जा सकती है। पूरी दुनिया में जब नई आर्थिकी फेल होती नजर आ रही है, वित्तीय संकटों से दुनिया जूझ रही है, बेईमानी और लूट-खसोट का बोलबाला है। ऐसी हालत में ये पुस्तक सफलता की नई राह दिखाती है। नैतिकता और अंतर्मन की आवाज को कोई धोखा दिए बिना यह सफलता की नई राह सूझाती है। यह पुस्तक अंतर्मन की आवाज को जगाती है, कठिन हालात में जूझने की शक्ति को बढ़ाती है और नैतिक मूल्यों की तरफ रूझान को और मजबूत बनाती है।
पुस्तक – विजेता धोखा नहीं देते
लेखक – जॉन एम हंट्समैन
प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन
नई दिल्ली -110002

उमेश चतुर्वेदी लिखित यह समीक्षा कादंबिनी जून 2012 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है.

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