जहानाबाद जिले के टेहटा के मेला रोड स्थित एक ऐसे निम्नस्तरीय झोपड़ीनुमा होटल की जिसे विधानसभा सचिवालय ने राज्य का एक उच्चस्तरीय और काफी अनुभवी मानते हुए इस होटल के मालिक को पटना के उस विधायक क्लब कैंटीन चलाने का ठेका दिया है जहां सांसद, विधायक और उनके अतिथि खाना खाते हैं। विधानसभा से कुछ दिन पूर्व वीरचंद पटेल पथ स्थित विधायक क्लब कैंटीन के आवंटन के लिए निविदा प्रकाशित की थी, जिसके आलोक में वर्तमान में कैंटीन चला रहे बेगूसराय के प्रतिष्ठित होटल ब्लू डायमंड के मालिक अमरेश कुमार सहित छह लोगों ने टेंडर डाला था। टेंडर डालने वालों में टेहटा का यह झोपड़ीनुमा होटल का मालिक गौरव कुमार भी शामिल था। टेंडर डालने वालों की लिए यह शर्त थी कि उन्हें किसी प्रतिष्ठित होटल व रेस्टूरेंट चलाने का लंबा अनुभव हो तथा वैट, इनकम इनकम टैक्स, सेल टैक्स एवं लेबर लाइसेंस धारक हों।
जब यह टेंडर डाला गया तभी से गौतम कुमार गौरव जिसने अपने टेहटा स्थित झोपड़ीनुमा होटल ‘होटल अन्नपूर्णा’ के नाम से टेंडर डाला था को कैंटीन का ठेका देने की साजिश शुरू हो गई थी। इसके पूर्व भी यह ठेका उसे ही देने की साजिश थी पर वर्तमान में कैंटीन चला रहे अमरेश कुमार ने हाइकोर्ट की शरण लेकर ठेका पाया था। गौरव को कैंटीन का ठेका देने की साजिश उसी वक्त प्रमाणित हो गई जब निविदा खोलते वक्त किसी निविदादाता को नहीं बुलाया गया जबकि निविदा नियमों के अनुसार सभी निविदादाताओं के सामने ही निविदा खोले जाने का सरकारी प्रावधान है। विधानसभा सचिवालय गौतम कुमार गौरव पर इसलिए मेहरबान है कि गौरव के पिता संजय प्रसाद से विधानसभाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के गहरे तालुक्कात हैं। अपने क्षेत्र या पटना से गया जाने के क्रम में विधानसभाध्यक्ष अक्सर टेहटा में संजय प्रसाद के पास रुकते हैं।
सूत्र बताते हैं कि दोस्ती और तालुक्कात को निभाने के लिए ही विधानसभाध्यक्ष के इशारे पर विधानसभा सचिवालय ने निविदा के उन सारे नियमों और प्रावधानों को ताक पर रख दिया जिन प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की नीतीश और उनकी सरकार दुहाई देती रही है। यह भी चर्चा है कि विधानसभाध्यक्ष ने अपने कार्यकाल में क्लब कैंटीन का ठेका अगड़ी जाति के किसी व्यक्ति को न देने की भी ठान रखी है चाहे इसलिए लिए नियमों या प्रावधानों की धज्जी कयों न उड़े। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कैंटीन के नए आवंटन और पुराने आवंटी को कैंटीन खाली करने संबधी पत्र 4 अक्टूबर 2012 को जारी किया गया जो पूर्व आवंटी को एक दिन बाद मिला, जिसमें उन्हें कैंटीन खाली करने के लिए मात्र एक सप्ताह की ही मोहलत दी गई। ऐसा इसलिए ताकि कोई दूसरा निविदादाता पूर्व की तरह इस फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट की शरण न ले सके इस मामले में सबसे बड़ी बात तो यह है कि कैंटीन आवंटन के लिए जो शर्ते थी गौरव कुमार गौतम कोई शर्त पूरी नहीं कर पाया फिर भी तमाम अनुभवी और सभी पात्रता पूरी करने वाले निविदादाताओं को दरकिनार कर गौरव के नाम कैंटीन का नया ठेका एलाट कर दिया गया। अब सुशासन की सरकार और उसके मुखिया बताएं कि कहां गई निविदा मामले में पारदर्शिता बरतने के उनके दावे और वादे। इस मामले ने ‘खाता न बही जो विधानसभाध्यक्ष चाहे वही सही’ की कहावत को भी चरितार्थ किया है। जय हो
लेखक विनायक विजेता वरिष्ठ पत्रकार हैं.


