बुंदेलखंड में जिसे बादशाह कहा जाता है, वह दरअसल आतंक का नाम है। गब्बर सिंह की भाषा में बोलें तो बादशाह का नाम सुनते ही बुंदेलखंड में लोग सहम जाते हैं। बड़ी-बड़ी पार्टियों के हुक्मरान ही नहीं, सरकारी अफसर और इंजीनियरों की पैंट गीली हो जाती है बादशाह के नाम पर। इस सिंह ने अपनी बादशाहत का ऐसा भौकाल बनाया है कि एक इशारे पर सैकड़ों नहीं, हजारों हथियारबंद लोग एकजुट सकते हैं। पूरे बंदेलखंड में किसी की यह मजाल कि बादशाह को वह कहीं भी बुलाये और वह वक्तशुदा वक्त से पहले ही उसकी हुजूरी में न पहुंचे। यह दीगर बात है कि यह बादशाह वास्तव में तो मूलत: पैसाखोर है, लेकिन अपनी पैसा-पिपासा के चलते वह अक्सर आदमखोर बन जाता है। लेकिन बुंदेलखंड का यह बेलौस-बेअंदाज बादशाह अब गीदड़-चौर्यकर्म में पकड़ा गया है। आरोप है चार सौ बीसी समेत दर्जन भर जघन्य अपराध वाली धाराओं का। अब वह लखनऊ जेल में हैं जबकि भाजपा में अपने सूखे घाव को खुरचने का माहौल है।
शुचिता के लिए मशहूर भाजपा में भी बादशाह सिंह की तूती बजती थी जबकि मायावती मंत्रिमंडल में श्रममंत्री रहे बादशाह सिंह की दबंगई चरम पर थी। इस पूरे इलाके में रसूख ऐसा, कि उनकी मर्जी के बिना इलाके में परिंदा भी अपनी जुबान नहीं खोल सकता। एक इंजीनियर ने पांच करोड़ की घूस देने के बावजूद काम न मिलने की शिकायत करते हुए जब रिश्वत की रकम अदा करने की अरदास की तो खूंख्वार बादशाह ने अपने दर्जन भर भूखे शिकारों को शिकार इशारा कर दिया। यह हादसा महोबा में बने बादशाह के राजमहल में हुआ, जहां इंजीनियर के बदन की कई बोटियों इन कुत्तों ने चबा डालीं। ऐसी एक नहीं सैकड़ों वारदातों का खुलासा अब पुलिस कर रही है। बहरहाल, बादशाह सिंह की अब ऐसी करनी के मामलों का खुलासा होने के बाद भाजपा के उन सभी कई दिग्गजों की बोलती बंद हो गयी है। बसपा के हुक्मरान तो पहले से ही खामोश हैं जो कभी दलितों के साथ ठाकुर-राजनीति की गलबहियां के दावे-कसमें करते-खाते नहीं अघाते थे। अपनी सरकार के पतन के सात महीना पहले ही मायावती ने बादशाह का कद घुटने से दो इंच कम कर दिया था।
अपराध में बादशाह सिंह का नाम कार्यकर्ता के तौर पर नहीं, बल्कि मास्टरमाइंड के तौर पर पहचाना जाता है। पूरा का पूरा कुनबा अपराध की जद में है। पिता की हत्या के बाद से बादशाह सिंह ने अपराध को अपना पेशा बना लिया और आवरण बनाया राजनीति को। बादशाह ने राजनीति की सीढि़यों को जितना नापा, जितना अपराध का ग्राफ भी धंसा। महोबा में सन 87 में खरेला नगर पंचायत चुनाव में जीते बादशाह, लेकिन दो साल बाद ही मौदहा से विधायकी हासिल कर ली। तब तक जमीन कब्जाने, ठेके दिलाने और आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए जन-अदालत चलाने की कुख्याति मिल चुकी थी। हत्या जैसे मामले इसकी माल्कियत बन गयी। इसी बीच उमा भारती से करीबी मिली। तीन मौकों पर इसी सीट पर बादशाह सिंह विधायक बने, लेकिन बसपा की धमक सूंघ कर उन्होंने पाला बदल दिया और बसपा के आंचल-तले बरास्ते विधायकी, मंत्री बन गये। विभाग मिला भारी-भरकम श्रम विभाग।
लेकिन अचानक बसपा की वक्र-दृष्टि बादशाह पर पड़ी। बसपा में उनकी बादशाहत के खिलाफ आग सुलग तो रही थी, मौका मिला महोबा के एक सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश उपाध्याय से लोकायुक्त के सामने बादशाह सिंह की करतूतों का पुलिंदा थमाने से। पता चला कि बादशाह सिंह का असली नाम रमेंद्र सिंह है। अर्जुन बाण सागर पर मछली मारने का धंधा उन्हीं का है। जांच शुरू हुई तो जिलाधिकारी ने दीगर शिकायतों के साथ ही माना कि सरकारी जमीनों पर बादशाह काबिज हैं। लेकिन इसके पहले बसपा ने उनको बादशाह से पैदल बना डाला। भौंचक बादशाह ने इंसाफ पार्टी बनायी और बाद में अपनी पुरानी मांद यानी भाजपा में शामिल हो गये। लेकिन यहां भी हंगामा हुआ। लालकृष्ण आडवाणी का खेमा इस घर-वापसी पर सख्त खफा हुआ। आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य में ऐसी भर्ती पर ऐतराज करते हुए संपादकीय लिख डाला। प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही ने तो ऐसे कार्यक्रम का बहिष्कार ही कर दिया। लेकिन उमा भारती, मुख्तार अब्बास नकवी, विनय कटियार और कलराज मिश्र समेत दिग्गज नेता अड़े ही रहे और भाजपा ने उन्हें टिकट दे ही दिया। इसके पहले बादशाह सिंह जैसे गंदे बदबूदार नालों को र्इमानदारी और चरित्र का दम भरने वाली पार्टी भाजपा में शामिल करने के सवाल पर नकवी का तर्क था कि भाजपा एक गंगा है जिसमें आकर सारे नाले शुद्ध हो जाते हैं।
दीगर बात है कि चुनाव में हार गये बादशाह। इसके बाद से ही बादशाहत ढहाने की स्पीड तेज हो गयी। श्रममंत्री होते समय निर्माण करने वाली श्रमसमिति लैकफेड में अरबों की बंदरबांट में बादशाह को हिस्सा मिला था। प्रवीण सिंह ने पुलिस में सहकारिता की विशेष जांच ब्यूरो यानी एसआईबी को बताया कि खरैला घर में यह 5 करोड़ की रकम चार बड़े काले बैग में भरकर लाया गया था। इसे लैकफेड के पूर्व अध्यक्ष सुशील कुमार कटियार, पीआरओ प्रवीण सिंह, मुख्य अभियंता गोविंद शरण श्रीवास्तव व महाप्रबंधक प्रशासन पंकज त्रिपाठी वहां लेकर गए थे। प्रवीण सिंह ने कबूला कि विभागों से लैकफेड से काम दिलाने के नाम पर बसपा सरकार के नसीमुद्दीन सिद़दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, नंदगोपाल गुप्ता नंदी, बाबूसिंह कुशवाहा, चौधरी लक्ष्मी नारायण, सदल प्रसाद, अवध पाल यादव, रंगनाथ मिश्र और अनीस अहमद उर्फ फूलबाबू के साथ बादशाह सिंह ने पांच से आठ फीसदी कमीशन खाया था। काम न होने पर जब कमीशन वापस मांगने इंजीनियर खरेला पहुंचे तो भड़के ने उन लोगों पर अपने शिकारी कुत्तों को छोड़ दिया। लेकिन बादशाह से सहमे लोग अपने मुंह सिले रहे।
लेकिन प्रवीण सिंह के कुबूलनामा ने बादशाह सिंह की बादशाहत को मिट्टी मिला दिया। पहले तो पूछतांछ के लिए जैसे ही एसआईबी को नोटिस दी, बादशाह भागकर मध्यप्रदेश में छिप गये। मगर 7 को आखिरकार जब वे लौटे तो एसआईबी ने लम्बे सवाल-जवाब के बाद आखिरकार गिरफ्तार कर लिया। हैरत की बात है कि राजनीति में शुचिता की वकालत करने वाली भाजपा के विनय कटियार सीधे महानगर कोतवाली पहुंचे और बादशाह से गुपचुप बातें करते रहे।
बहरहाल, बादशाह सिंह अपने पर लगे आरोपों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि वे निर्दोष हैं क्योंकि बसपा सरकार में पंचम तल से सारे फैसले होते थे। कुछ आला अफसर सारा बंदरबांट करते थे। लेकिन बादशाह सिंह ने किसी का भी नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, जाहिर है कि कई पोशीदा राज अभी तक उनके दिल में छुपे ही हैं। कुछ भी हो, अरबों के इस जाल-बट्टा में इंजीनियरों और नेताओं के अलावा कई बड़े अफसर तो लपेटे में ही हैं जो तब बंटवारा करते थे। मसलन पूर्व शिक्षा सचिव जितेंद्र कुमार। जितेंद्र पर आरोप लग रहे हैं कि पूर्व शिक्षा मंत्री राकेशधर त्रिपाठी से कमीशन की रकम इंजीनियरों से वापस करायी थी। आरोप तो पूर्व मुख्य सचिव अतुल गुप्ता और पीडब्ल्यूडी के प्रमुख अभियंता रहे टी राम जैसे आला अफसरों पर भी हैं जिन्होंने इस घोटाले का तानाबाना बुना।
लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश जाने माने और बेबाक जर्नलिस्ट हैं.


