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शिमला नगर निगम में कांग्रेस का राज खतम, भाजपा अधर में, माकपा ने रचा इतिहास

शिमला : आज संपन्न हुई मतगणना में कांग्रेस और भाजपा के लिए नाक का सवाल बन चुके हिमाचल की राजधानी शिमला के नगर निगम के सभी २५ वार्डों के चुनावों के नतीजों की घोषणा कर दी गई है. २५ पार्षदों वाले राजधानी के इस प्रतिष्ठित नगर निगम पर विगत २५ वर्षों से कांग्रेस का कब्ज़ा हटाते हुए इस बार भाजपा सेंध लगाने में कामयाब रही. २५ सीटों वाले इस नगर निगम के २७ मई को हुए चुनावों की आज हुई मतगणना में जहाँ भाजपा ने कांग्रेस को पीछे धकेलते हुए पहली बार १२ सीटों पर अपना कब्ज़ा जमाया है. वहीँ कांग्रेस इस दौड़ में भाजपा से पिछड़ते हुए १० सीटें लेकर दूसरे स्थान पर और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ३ सीटें लेकर तीसरे स्थान पर रही. शिमला नगर निगम के चुनावों में इस बार महापौर और उपमहापौर के पद के चुनाव सीधे तौर से जनता द्वारा ही किया गया. यानि कि इस बार मेयर और उप मेयर का चुनाव निर्वाचित पार्षदों द्वारा नहीं बल्कि मतदाताओं द्वारा सीधे किया गया.

शिमला : आज संपन्न हुई मतगणना में कांग्रेस और भाजपा के लिए नाक का सवाल बन चुके हिमाचल की राजधानी शिमला के नगर निगम के सभी २५ वार्डों के चुनावों के नतीजों की घोषणा कर दी गई है. २५ पार्षदों वाले राजधानी के इस प्रतिष्ठित नगर निगम पर विगत २५ वर्षों से कांग्रेस का कब्ज़ा हटाते हुए इस बार भाजपा सेंध लगाने में कामयाब रही. २५ सीटों वाले इस नगर निगम के २७ मई को हुए चुनावों की आज हुई मतगणना में जहाँ भाजपा ने कांग्रेस को पीछे धकेलते हुए पहली बार १२ सीटों पर अपना कब्ज़ा जमाया है. वहीँ कांग्रेस इस दौड़ में भाजपा से पिछड़ते हुए १० सीटें लेकर दूसरे स्थान पर और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ३ सीटें लेकर तीसरे स्थान पर रही. शिमला नगर निगम के चुनावों में इस बार महापौर और उपमहापौर के पद के चुनाव सीधे तौर से जनता द्वारा ही किया गया. यानि कि इस बार मेयर और उप मेयर का चुनाव निर्वाचित पार्षदों द्वारा नहीं बल्कि मतदाताओं द्वारा सीधे किया गया.

महापौर और उपमहापौर के लिए संपन्न हुए इस सीधे चुनाव में दोनों पदों के लिए माकपा ने अपने उम्मीदवारों को जितवाकर दतिहास रचते हुए प्रदेश के राजनैतिक प्रवेक्षकों को हैरत में डाल दिया है. महापौर पद के कल हुए सीधे मतदान की मतगणना में माकपा के संजय चौहान ने अपने निकटतम उम्मीदवार कांग्रेस की निवर्तमान महापौर मधु सूद से लगभग ७२०० के एक बड़े अंतर से इस पद पर अपनी विजय सुनिश्चित की है, वहीँ उपमहापौर पद के लिए माकपा के उम्मीदवार टिकेन्द्र पंवार ने भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों को शिकस्‍त देते हुए लगभग ४५०० मतों से अपनी जीत की. वैसे तो कांग्रेस के परंपरागत बहुमत वाले इस स्थानीय निकाय के चुनावों में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही होता रहा है, परन्तु इस बार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूरे दमखम से चुनाव में उतरने के कारण, गत २५ वर्षों से कब्ज़ा जमाये कांग्रेस के लिए ही मुश्किलें पैदा की हैं. इस बार नगर निगम के २५ वार्डों में से लगभग २० वार्डों के चुनावों के लिए हुए तिकोने संघर्ष में माकपा की दमदार उपस्थिति और देश में बढ़ती महंगाई के लिए कांग्रेस की केंद्र में चल रही सरकार के प्रति रोष की भावना और बड़ी संख्या में मतों के बंटवारे से ही कांग्रेस को यह हानि झेलनी पडी है.

शिमला स्थानीय निकाय के चुनावों में दोनों प्रमुख दलों की जहाँ प्रतिष्ठा दावं पर लगी हुई थी वहीँ कुछ लोग इसे इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के नतीजों का प्रतिबिम्‍ब भी बता रहे हैं. ज्ञात हो कि राजधानी शिमला के इस नगर निगम, जिस पर विगत २५ वर्षों से कांग्रेस का ही कब्ज़ा रहा है, में इस बार सेंध लगाने के लिए भाजपा और उसकी सरकार ने दिन-रात एक किया हुआ था. शिमला प्रदेश की राजधानी होने व सरकार के विभिन्न विभागों के मुख्यालय यहाँ होने के कारण शिमला में प्रदेश के हर जिले व क्षेत्र के कर्मचारी और व्यवसायी लोग निवास करते हैं. विश्वविद्यालय होने के कारण यहाँ बड़ी संख्या में विद्यार्थी भी रहते हैं, जिनमें अधिकतर माकपा के विद्यार्थी संगठन के समर्थक हैं. इसी लिए विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनावों में एस ऍफ़ आई का बोलबाला रहता है. यदि निष्पक्ष रूप से शिमला नगर निगम के मतदाताओं का दलों के समर्थकों के रूप वर्गीकृत किया जाये तो यहाँ सबसे अधिक कांग्रेस और फिर भाजपा और तीसरे स्थान पर माकपा के समर्थक ही मिलेंगे. विभिन्न राजनीतिक समीकरणों और वार्डों के बंटवारे के कारण ही मतों में होनेवाले बंटवारे लाभ लेते हुए कांग्रेस ने विगत २५ वर्षों से शिमला के स्थानीय निकाय पर अपना कब्ज़ा जमा रखा था, जिसमें माकपा समर्थक मतदाताओं का भी बड़ा हाथ माना जाता है. जैसा कि हमने पहले भी बताया था कि इन चुनावों में अधिकतर वार्डों में माकपा के उम्मीदवार अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहेंगे, वहाँ वह निर्णायक भूमिका निभाते हुए कांग्रेस की पराजय का कारण भी बनेंगे. हमारा यह आंकलन शत प्रतिशत सही निकला और नतीजे आप के सामने हैं. जो भी हो, इतना तो स्पष्ट है कि इस चुनाव में माकपा ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाकर एक ओर कांग्रेस की पराजय सुनिश्चित की है. वहीं दूसरी ओर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए भी नई मुश्किलें पैदा करने की क्षमता रखने का सन्देश भी दे दिया है.

नगर निगम के चुनावों में यूँ तो स्थानीय नगरीय समस्याएं व विकास कार्य ही मुख्य मुद्दा रहता है, परन्तु आनेवाले विधान सभा के चुनावों के मद्देनजर जहाँ एक ओर प्रदेश के मुख्मंत्री प्रो० प्रेम कुमार धूमल और प्रदेश के पांच मंत्रियों सहित पूरे भाजपा संगठन ने प्रचार की कमान सम्भाल रखी थी, वहीँ कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह और केंद्रीय मंत्री आंनंद शर्मा के साथ-साथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कौल सिंह अपने सिपहसालारों सहित कांग्रेस के प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार और मतदान की अपील कर रहे थे. शिमला शहर का विकास करवाने और न करवाने के आरोप-प्रत्यारोपों के मध्य सभी प्रत्याशियों द्वारा विकास के बड़े-बड़े वायदे कर स्थानीय नागरिकों को अपने-अपने पक्ष में मतदान करने के लिए लुभाने में कोई भी दल या प्रत्याशी पीछे नहीं रहा. जैसा कि कहा जाता है कि वार्डों तक के दायरे में सीमित छोटे चुनावों में पार्टी से अधिक उम्मीदवारों का मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क, व्यवहार और निकटता अधिक काम करता है और इन नतीजों ने यह साबित भी कर दिया है. माकपा के उम्मीदवारों की विजय का श्रेय दल से अधिक उसके उम्मीदवारों को अधिक जाता है. माकपा के दिल्ली से आये राष्ट्रीय नेता सीताराम येचुरी ने भी कई जनसभाओं को संबोधित करते हुए जहाँ अपने दल के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी, वहीँ कांग्रेस और भाजपा पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कांग्रेस को गलतियों का जनक बताया और भाजपा को उन गलतियों का पोषक बताने से भी गुरेज नहीं किया था.

बड़े नेताओं के शिमला नगर निगम के चुनाव प्रचार में उतरने से एक ओर जहाँ दलों के प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊँचा हुआ था, वहीं आम जनता में यह सन्देश गया है कि शिमला के स्थानीय चुनाव तीनों राष्ट्रीय दलों के लिए कितना महत्व रखते हैं. स्वयं को प्रदेश का विकास पुरूष स्थापित करने में लगे हुए नेताओं की शिमला के जागरूक मतदाताओं पर कितनी पकड़ है, यह इन नतीजों से स्पष्ट हो जाता है. कांग्रेस को जहाँ शिमला नगर निगम पर विगत २५ वर्षों से चले आ रहे बहुमत को गंवाते हुए मात्र १० सीटों पर संतोष करना पड़ा, वहीँ प्रदेश में प्रो० धूमल के नेतृत्व में चल रही भाजपा सरकार के लिए यह नतीजे कोई शुभ सन्देश नहीं दे रहे है. २५ सदस्यों वाले शिमला नगरनिगम के इन चुनावों में जहाँ भाजपा के १२ उम्मीदवार ही अपनी जीत सुनिश्चित करने में सफल रहे हैं, वहीँ माकपा के ३ उम्मीदवारों ने अपनी जीत दर्ज करवाई है. पहाड़ों की रानी के नाम से विख्यात हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला सैलानियों की भी पहली पसंद होने के कारण पर्यटन मौसम में बहुत सी नगरीय समस्याओं से ग्रस्त रहता है, जिसका प्रभाव वहाँ के निवासियों पर भी पड़ता है. अधर में लटकी इस नगर निगम में राजनीति के चलते अब शहर के विकास के निर्णय किस प्रकार पारित किये जायेंगे यह बड़ा प्रश्न वहाँ के निवासियों के सामने मुहँ बाये खड़ा है. भाजपा खेमे में भी यह आशंका जताई जा रही है कि यदि सदन में कांग्रेस और माकपा के सदस्य मिल जाएँ तो वह १३ यानि कि बहुमत में हो जाते हैं. ऐसे में भाजपा के लिए यह दोनों ही समस्या खड़ी कर सकते हैं. फ्लोर मैनेजमेंट में अपना सानी नहीं रखनेवाली कांग्रेस माकपा के साथ मिल कर, आनेवाले दिनों में भाजपा को अलग-थलग रखने में कितनी कामयाब रहती है यह आनेवाले दिनों में नगर निगम की पहली बैठक में ही स्पष्ट हो जायेगा.

लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के संपादक हैं.

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