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शिवमूर्ति अगर कहीं जज रहे होते तो ज़्यादा अच्छा होता

बहुत सारे कहानीकार अपनी कहानियों में खुद को ‘हीरो‘ बनाते हैं। लेकिन शिवमूर्ति अपनी कहानियों में खुद को हीरो नहीं बनाते। हाँ, उन की कहानियाँ उन्हें हीरो बनाती हैं। उन की कहानियों का कौशल, उन की कहानियों का रस एक दुर्निवार सच बन कर जब हमारे सामने आता है तो आँखें भीग जाती हैं। मन हिल-सा जाता है। उन की कहानियों के छोटे-छोटे ब्यौरे गँवई जीवन को ऐसे हेरते हैं कि कहाँ सीवन खुली रह गई है और कहाँ उधड़ गई है, जान पाना एक पहेली बन जाता है।

बहुत सारे कहानीकार अपनी कहानियों में खुद को ‘हीरो‘ बनाते हैं। लेकिन शिवमूर्ति अपनी कहानियों में खुद को हीरो नहीं बनाते। हाँ, उन की कहानियाँ उन्हें हीरो बनाती हैं। उन की कहानियों का कौशल, उन की कहानियों का रस एक दुर्निवार सच बन कर जब हमारे सामने आता है तो आँखें भीग जाती हैं। मन हिल-सा जाता है। उन की कहानियों के छोटे-छोटे ब्यौरे गँवई जीवन को ऐसे हेरते हैं कि कहाँ सीवन खुली रह गई है और कहाँ उधड़ गई है, जान पाना एक पहेली बन जाता है।

बताना दिलचस्प है कि सेल्स टैक्स विभाग में ज्वाइंट कमिश्नर के पद से अब रिटायर हो चले शिवमूर्ति ने बचपन में दर्जीगीरी भी की है। शायद इसी लिए उन की कहानियों के काज, बटन इतने दुरूस्त होते हैं कि कोई नुक्स निकाल पाना मुश्किल होता है। शिवमूर्ति ने कक्षा-11 में आते-आते अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए मजमा बाँधना भी शुरू कर दिया था। एक बार गाँव के जमींदार ने, उन के पिता से मुकदमे की रंजिश में, उन का अपहरण कर उन की हत्या भी करनी चाही। पर वह बिलकुल फिल्मी स्टाइल में भाग निकले। और संयोग देखिए कि वही जमींदार आज की तारीख में अपने नाती की नौकरी की खातिर उन से चिरौरी करता है। बचपन में ही उन के पिता साधू हो जाते हैं। पिता को मनाने गए पर असफल हो कर लौटते हुए बाँस का पुल पार करते हुए माँ-बेटे रात के अंधेरे में बह जाते हैं। भूख से बेहाल, नदी के पानी में बहते वह खुद को भी बचाते हैं और माँ को भी।

दरअसल, शिवमूर्ति का जीवन और उन का जीवनानुभव इतना ऊबड़-खाबड़, इतना पेंचोखम और इतना संघर्ष लिए हुए है कि एक बड़ी और कालजयी रचना की दरकार उनसे हो चली है। गाँव की जटिल ज़िंदगी, दबे-कुचले लोगों का संघर्ष और बेरोजगारी उन की कहानियों के मुख्य विषय हैं। बेरोजगारी की यातना और उस का दंश उन की कहानियों में रह-रह कर चुभता है। ‘केसर कस्तूरी‘ और ‘भरतनाट्यम‘ जैसी कहानियाँ इस की गवाह हैं। उन की कहानियों के पात्र अभावग्रस्त जीवन जीते हुए भी जिजीविषा और जीवन की ललक से सराबोर दिखते हैं तो वह शिवमूर्ति की जीवन के प्रति अपेक्षा ही है कुछ और नहीं। शायद यही कारण है जब वह ‘सिरी उपमा जोग‘ जैसी कहानी का पाठ करते हैं तो खुद तो रोते ही हैं श्रोताओं को भी रूला देते हैं। ‘कसाई बाड़ा‘ में जब वह भारतीय गाँव की राजनीति का खुलासा करते हैं तो भारत भर में उसके दो हजार से अधिक मंचन हो जाते हैं। फ़िल्म बन जाती है। ‘तिरिया चरित्तर‘ लिखते हैं, फिर सैकड़ों मंचन हो जाते हैं। फ़िल्म बन जाती है। और जब वह ‘तर्पण‘ लिखते हैं तो लोग उन्हें विवादों में घसीटते हैं।

पर जैसा कि ममता कालिया ने लिखा था कि शिवमूर्ति विवादप्रिय नहीं संवादप्रिय लेखक हैं, तो ममता कालिया की बात को लगभग सच साबित करते हुए वह विवाद में नहीं पड़ते और लोगों को संवाद के लिए न्यौतते हैं। लेकिन दिक्कत यह कि विवाद खड़ा करने वाले लोग उन से संवाद से कतरा जाते हैं। हंस ने ‘तिरिया चरित्तर‘ कहानी को प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत किया था तो शिवमूर्ति की निष्पक्षता देखिए। जब उनसे पूछा गया कि वह किस कहानी को पुरस्कार देते तो वह पहले, दूसरे, तीसरे- तीनों पुरस्कार के लिए अपनी कहानी को खारिज करते हुए और दूसरी कहानियों का नाम ले बैठे। यह शिवमूर्ति ही कर सकते थे। कई बार ऐसा लगता है कि शिवमूर्ति अगर कहीं जज रहे होते तो ज़्यादा अच्छा होता। क्यों कि अपनी कहानियों और उन के पात्रों के मार्फत जो निष्पक्षता वह परोसते हैं, वह विरल भी है और अद्भुत भी। ‘तर्पण‘ इसी लिए विवाद में आई। ‘तर्पण‘ दलित विमर्श की कहानी है। और शिवमूर्ति‘ तर्पण‘ के गाँव में दलित एक्ट के दुरूपयोग की दास्तान बड़ी सरलता से कह जाते हैं। और दलितों को राजनीति के लिए कैसे औजार बना लिया जाता है, इस का बड़ा बारीक ब्यौरा शिवमूर्ति तफ़सील में दे जाते हैं। पर दलित चौखटे में बैठे लोग ‘तर्पण‘ को विवादों में घसीट लेते हैं।

शिवमूर्ति दरअसल ऐसे कहानीकार है जो खुद कहते हैं कि वह कबाड़ से साइकिल कसते हैं, शो रूम से नहीं। क्योंकि शो रूम में सब कुछ सेटिल्ड होता है और कबाड़ में एक-एक चीज़ ढूँढ़नी होती है और सेट करनी होती है। जो आसान नहीं होता। ‘सिरी उपमा जोग‘ कहानी की चर्चा फिर करूँ और कहूँ कि एक बाप की चिंता अपने बेटे को प्यार देने, उसे सुविधाएँ देने की नहीं, उस से छुट्टी पा लेने की है। कहानी मुख्तसर यह है कि एक आदमी गाँव में अपनी पत्नी-बच्चों को छोड़ कर शहर आता है, अफसर हो जाता है और दूसरी शादी कर लेता है। बच्चे पैदा कर लेता है। गाँव में बैठी पत्नी दस साल के इंतजार के बाद एक चिट्ठी दे कर अपने बेटे को शहर अपने पति के पास भेजती है। दूसरी पत्नी के बच्चे उसे अपमानित करते हैं। वह फिर भी अपने बाप के लिए रूका रहता है। और बाप है कि उसे पहचानने से इनकार कर देता है। बाद में बाप की सारी चिंता इस बिंदु पर टिकी रहती है कि वह लड़का वापस गया कि नहीं। और जब जान जाता है कि वह चला गया है, तब बाप निश्चिंत हो जाता है। संवेदनहीनता की यह पराकाष्ठा है।

शिवमूर्ति इन्हीं ब्यौरों को सरलता से परोसने के लिए जाने जाते हैं और रूला जाते हैं। सच कहें तो भारतीय ग्रामीण परिवेश को, हिंदी कहानी में, रेणु से वह बहुत आगे ले जाते हैं। शायद इसी लिए उन की कहानियों का अनुवाद भारतीय भाषाओं से ले कर अंग्रेजी और उर्दू तक में उपलब्ध है। सरहद लाँघ कर पाकिस्तान तक में वह पढ़े जाते हैं।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्‍यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

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