गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी संजय जोशी पर आरएसएस और भाजपा ने इतनी लगाम कस दी है वो आज ना तो मोदी के पक्ष में और ना ही उनके खिलाफ एक भी शब्द बोलने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं जब कि भारतीय जनता पार्टी के कई नामी नेता नरेंद्र मोदी को देश का अगला प्रघानमंत्री बनाने की जुगत में लग गये हैं। संजय जोशी की चुप्पी से इस बात के कायस लगाये जा रहे हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से विवाद के बाद संजय जोशी की इतनी लगाम कस दी गई है कि वो नरेंद्र मोदी के खिलाफ तो दूर नरेंद्र मोदी के पक्ष में भी एक भी शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। भारतीय जनता पाटी के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी उत्तर प्रदेश के इटावा मुख्यालय पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला कार्यवाह दशरथ सिंह चौहान की बेटी की शादी में शामिल होने के लिये आये हुये थे।
जयपुर से जोधपुर हावड़ा एक्सप्रेस से आज तड़के इटावा रेलवे स्टेशन पर उतरे संजय जोशी का स्थानीय भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्त्ताओं ने स्वागत किया उसके बाद जोशी रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में ठहरे। गुजरात के कट्टर विरोधी संजय जोशी के इटावा पहुंचने की खबर पर मीडिया जन भी वहां आ धमके। मीडिया से बातचीत से साफ इंकार करते हुये संजय जोशी ने पत्रकारों के अनुरोध पर बेहद संक्षिप्त बातचीत में यूपीए सरकार की ओर से लाये जा रहे एफडीआई पर कहा कि यूपीए सरकार सीबीआई का खौफ दिखा करके बसपा और सपा जैसे दलों पर दबाब बना कर जोड़तोड़ का अंकगणित बना कर खुद को बचाने में लगी है। दूसरे सवाल में जैसे ही गुजरात चुनाव की चर्चा हुई वैसे ही संजय जोशी बिना कुछ बोले ही वहां पर चलते बने, लेकिन गुजरात चुनाव का सवाल सुनते ही उनके चेहरे पर नरेंद्र मोदी के खौफ को साफ पढ़ा जा सकता था, क्यों कि सवाल सुनने के बाद संजय जोशी पत्रकारों के सामने से चलते बने। दो दिन पहले ऐसी भी खबरें आई थी कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी संजय जोशी विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए जल्द ही मैदान में उतर सकते हैं लेकिन इटावा में नरेंद्र मोदी को लेकर उनकी चुप्पी ने कई तरह के सवाल खडे़ कर दिये हैं। जिनके जबाब तलाशने की कोशिश में लोग हुये हैं।
बताते चले कि संजय जोशी व मोदी एक समय में अच्छे दोस्त थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से दोनों एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हैं, इसी साल जनवरी में संजय जोशी ने पार्टी से इस्तीफा दिया था। इस बारे में यही कहा जाता है कि मुंबई में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लेने के लिए मोदी ने पार्टी से पहले संजय जोशी का इस्तीफा मांगा था। मोदी की इस जिद की संघ और भाजपा ने भी निंदा की थी और संघ के कई कार्यकर्ताओं ने भी विरोध जताया था। इसके बाद संजय जोशी के समर्थन में अहमदाबाद, मुंबई, लखनऊ, चंडीगढ़, दिल्ली सहित कई शहरों में संजय जोशी के समर्थन में पोस्टर्स युद्ध भी छिड़ा था। संजय जोशी की पहचान एक सादा जीवन जीने वाले राष्ट्रीय स्वंयसेवी संघ के कार्यकर्ता के तौर पर है। पेशे से मैकनिकल इंजीनियर, संजय जोशी पहले इंजीनियरिंग के छात्रों को पढ़ाते थे। फिर उन्होंने अपना जीवन आरएसएस को समर्पित कर दिया। संजय जोशी सबसे पहली बार सुर्खियों में आए 1988 में आए जब आरएसएस ने उन्हें गुजरात भाजपा ईकाई में काम करने के लिए भेजा। उस वक्त एक और आरएसएस कार्यकर्ता गुजरात भाजपा इकाई के अहम हिस्सा बना, वो थे नरेंद्र मोदी। मोदी को गुजरात भाजपा के महासचिव नियुक्त किया गया।

संजय जोशी को प्रभारी के तौर पर गुजरात में काम करने के लिए भेजा गया। दोनों की जिम्मेदारी राज्य में पार्टी इकाई को मजबूत करना था लेकिन इस जिम्मेदारी के दौरान खटास आई शंकर सिंह वाघेला के विद्रोह के बाद जिस कारण भाजपा एक वक्त पर दो हिस्सों में बंट गई। 1995 में सत्ता को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल और शंकर सिंह वाघेला बीच खींचतान शुरू हुई। सत्ता पलट के इरादे से शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी के कई विधायकों के साथ मध्य प्रदेश के खजुराहो एक फाइव स्टार रिसोर्ट में डेरा डाल दिया। गौरतलब है कि इस दौरान मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। बाद में वाघेला कांग्रेस में शामिल हो गए। इस पूरे घटनाक्रम के बीच केशुभाई पटेल के हाथों से मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई और सुरेश मेहता गुजरात के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि केशुभाई पटेल एक बार फिर 1998 में राज्य के मुख्यमंत्री बने। पार्टी की इस जीत का श्रेय गया संजय जोशी को। उनके संगठन कौशल की तारीफ हुई।
इसके साथ संजय जोशी और नरेंद्र मोदी के रिश्तों के बीच खटास बढ़ गई। मोदी को पार्टी मुख्यालय दिल्ली भेज दिया गया। 2001 में गुजरात प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ। भूकंप के बाद हुई तबाही के दौरान राहत कार्यों के लिए केशुभाई पटेल की नीतियों की आलोचना हुई और मौका मिला नरेंद्र मोदी को। मोदी को गुजरात का नया मुख्यमंत्री बनाया गया। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद संजय जोशी को दिल्ली भेजा गया। वहां उन्हें पार्टी संगठन के महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। संजय जोशी ने जल्द ही पार्टी के संगठन में छाप छोड़ने लगे। लेकिन इसके बाद 2005 में आया सीडी स्कैंडल जिसके बाद उन्हें पार्टी छोड़ना पड़ा। संजय जोशी 6 साल के राजनीतिक वनवास पर चल गए। मोदी बनाम जोशी की लड़ाई में दूसरा अध्याय तब आया जब पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने संजय जोशी को पार्टी में वापस लाया और उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाया और साथ ही उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मनोनीत किया। इसके विरोध में नरेंद्र मोदी पार्टी के अहम मीटिंगों से नदारद रहने लगे और यूपी चुनावों में पार्टी के लिए प्रचार भी नहीं किया। जब 2012 के मई माह पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो नरेंद्र मोदी ने आने से इनकार कर दिया। उन्होंने शर्त रखा कि जब तक संजय जोशी इस्तीफा नहीं देते तब तक वे राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं होंगे। मोदी के खौफ का हुआ व्यापक असर संजय जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस्तीफा देना पड़ा। जोशी के इस्तीफे के कुछ देर बाद ही नरेंद्र मोदी मुंबई भी पहुंचे लेकिन जोशी की इस इस्तीफे से मोदी विऱोधी खेमे में खुलकर उनकी आलोचना करने लगा। संजय जोशी के भारतीय जनता पार्टी छोड़ देने के बाद मोदी बनाम जोशी लड़ाई ने अहम मोड़ ले रखा है। भले ही इस लड़ाई में फिलहाल नरेंद्र मोदी विजेता बन कर निकले हैं। लेकिन इस घटनाक्रम को लड़ाई का अंत नहीं कहा जा सकता है।
लेखक दिनेश शाक्य इटावा में सहारा समय से जुड़े हुए हैं.


