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संपादकजी… छापकर आवरण पर… नग्न स्त्रियों की तस्वीर… ललकारते हैं रात में… (अंशु की तीन कविताएं)

1-

संपादकजी,
छापकर आवरण पर
नग्न स्त्रियों की तस्वीर
ललकारते हैं रात में
यही है तुम्हारी संस्कृति
देख लो खजुराहो

1-

संपादकजी,
छापकर आवरण पर
नग्न स्त्रियों की तस्वीर
ललकारते हैं रात में
यही है तुम्हारी संस्कृति
देख लो खजुराहो

याद आते ही मनु स्मृति
कहते हैं
जला दो,
इसमें दलित विरोधी बातें लिखी हैं
दलित अधिकार, आदिवासी अधिकार में
शामिल नहीं है
दलित महिला, आदिवासी महिला,
का अधिकार,
यह जानते हैं हम
पर मानते नहीं।

स्त्री जो घर में छुपाई गई
बाजार में उघाड़ी गई
ना छुपना स्त्री की नियत थी,
ना उघड़ना उसकी मर्जी,
उसका छुपना पुरूष की इच्छा थी
और उघड़ना पुरूष की कुंठा।

 

 

2———

 

पत्नी को बेटी को सात पर्दों में रखा
और प्रेमिका के लिए स्त्री मुक्ति आन्दोलन
तुम दोगले हो और तुम्हारा आंदोलन खोखला
होना-खोना दर्जन भर औरतों के साथ
तुम्हारा पुरूषार्थ है
इसमें तुम्हारी स्त्री मुक्ति है, तुम्हारा स्त्री विमर्श है
यदि बेटी लिखे सोना दस मर्दों के साथ
बीवी लिखे पाना-खोना दर्जन भर मर्दों का हाथ
तुम्हारे पांव तले जमीन निकल जाएगी
हर आंदोलन की शुरूआत घर से क्यों नहीं
मुक्त करो बहनों को, बीवियों को, बेटियों को
अपने नजरों के चंगुल से
जातिय दंभ की तरह पुरूष होना भी दंभी  बनाता है
श्रेष्ठता का बोध कराता है
तुम भी तो पुरूष हो, दंभ और श्रेष्ठता से भरे हुए।

पहले अपने ‘पुरूष’ होने के झूठे दंभ से बाहर आओ
वर्ना स़्त्री मुक्ति की बात उस लोमड़ी की चालाकी है
जिसने भेड़ खाने के लिए भेड़ खाने का कानून बनाया
स्त्री मुक्ति के नाम पर स्त्री शोषण की राह तलाशते तुम
हे! महान साहित्यकार तुम्हारी स्त्री मुक्ति को प्रणाम।

 

3—

 

गालियों का अपना संस्कार है
अपना मनोविज्ञान है
उसमें आता है हमेशा
मां का नाम और बहन का नाम
कैसे बच जाते हैं हर बार
आते-आते
भाई और बाप लोग

किसने गढ़ा इन गालियों को
इसमें शामिल तो नहीं
भाइ लोग और बाप लोग

अब गालियों को बदलो
क्योंकि बदल रहा है वक्त
बिना ब्याह के मां बनना गुनाह है
क्यों बच जाता है हर बार
बिना ब्याह का बाप
अखबार में घर छोड़ कर
भागती हैं लड़कियां
कहां जाते हैं लड़के
समझो इन चालाकियों को,
बदल रहा है वक्त
बदल दो गालियों को।

युवा पत्रकार आशीष कुमार अंशु के बतकही नामक ब्लाग से.

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