दरअसल हमारी सोच इतनी बाजारवादी हो गई है कि इसमें संवेदना के लिए शायद ही कुछ बचा हो। लोग विषम से विषम परिस्थितियों में भी उपभोक्तावादी संस्कृति के मोहपाश से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। लोग इन संस्कृतियों पर इतने आश्रित हो चुके हैं कि उन्हें अपने समाज की किसी भी दर्जे की समस्याओं को उजागर करने के लिए एक माध्यम का सहारा लेना पड़ रहा है। हाल फिलहाल यह मामला तब और देखने को मिला। जब बहुचर्चित रियल्टी शो सत्यमेव जयते और आमिर खान समाज के रहनुमा बनकर सामने आयें। इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्यमेव जयते कार्यक्रम के माध्यम से आमिर खान ने एक गंभीर मुद्दे को उठाया है और लोगों को कन्या भ्रूण हत्या और दहेज के खिलाफ दोबारा जागरुक कर रहे हैं।
यहां ‘दोबारा’ कहने का तात्पर्य यह है कि इस शो में जितने भी मुद्दे उठाये गए हैं वो भारत की उन गंभीर और ज्वलंत समस्याओं में शुमार है जिसके दंश को देश हर रोज महसूस करता है। कन्या भ्रूण हत्या सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रमों की उपज नहीं है जिसने अपने आपको शुरुआती दिनों से ही पब्लिसिटी और टीआरपी पर अभिकेन्द्रित किया है और पिछले दिनों यह बात खुलकर सामने भी आ गई है कि सत्यमेव जयते ने केबीसी का रिकॉर्ड तोड़ दिया। बात सिर्फ यहीं आकर नहीं रूकती, क्योंकि यहां होस्ट के तौर पर काम करने वाले आमिर खान के प्रति एपिसोड मेहनताने की भी है। आमिर इस शो में काम करने के लिए प्रति एपिसोड तीन करोड़ रुपये लेते हैं और दो एपिसोड और विज्ञापन को मिलाकर वे अब तक बीस करोड़ रुपये ले चुके हैं। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाए कि यह शो अपने माध्यम से सिर्फ और सिर्फ सत्य की बात करता है।
बहरहाल इसमें दोष किसी कार्यक्रम या चैनल का नहीं है कि हम इन कार्यक्रमों को देखकर जागरुक होने का दंभ भरते हैं। दरअसल इस प्रकरण में दो परिपाटी कार्य करती है। पहली, ये कि हमारे समाज में समस्यायें अब ग्लैमर और बाजारवादी संस्कृति की मोहताज हो गई हैं। भ्रष्टाचार, महंगाई, कालाध्न, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रणाली आदि ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिनका इतिहास भी उतना ही पुराना है, जितना कि देश और समाज का। और लोग इन बातों से न सिर्फ वाकिफ हैं बल्कि इसके आगोश में जकड़े हुए हैं। लेकिन यह मानव सोच का संकट ही है कि एक ऐसा कार्यक्रम टीवी पर दिखाया जाता है और लोग रातो रात जागरुक हो जाते हैं और टीवी के सामने आंसू पोछते हुए सोचने लगते हैं कि देश वाकई संकट में है। दूसरी ये कि वर्तमान मीडिया ने इन गंभीर समस्याओं को गौरवान्वित किया है और लोगों के सामने इन समस्याओं को मनोरंजक सामग्री बनाकर पेश किया है।
गौरतलब है कि हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार आदि जैसे असामाजिक कृत्य पहले भी होते थे लेकिन कभी इस मामले को लेकर लोगों को कैंडिल मार्च करते हुए या सार्वजनिक जगहों पर धरना देते हुए नहीं देखा गया था लेकिन यह मीडिया ही है जिसने लोगों को कथित रूप से जागरुक कर दिया। अन्ना हजारे के अनशन में हमने लाखों की भीड़ देखी जिन्होंने एक स्वर में भ्रष्टाचार और नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन क्या कोई इस बात की गारंटी दे सकता है कि उसमें सभी लोग अन्ना हजारे जैसे ईमानदार और जीवन में कभी भ्रष्टाचार का साथ नहीं देने वाले लोग ही शामिल रहे हैं। क्योंकि ये वही भीड़ थी जो नेताओं को सुनने के लिए ट्रेनों और बसों में भरकर कोसों दूर जाती है। हो सकता है कि लोग इस बात का प्रतिवाद करें कि कैंडिल मार्च या फिर धरना प्रदर्शन पब्लिसिटी के लिए नहीं की जाती तो उन्हें सामने आकर इस बात को प्रमाणित करना होगा कि उन्होंने इस कार्य को बिना ग्लैमर से प्रभावित हुए बिना ऐसा किया है। कितने लोगों को दिल्ली से लेकर उन क्षेत्रों तक में यमुना के लिए कैंडिल मार्च करते हुए या धरना देते हुए देखा गया है, गंगा को बचाने के लिए धरना और भूख हड़ताल करने वाले स्वामी निगमानंद की मौत हो जाती है और स्वामी ज्ञानस्वरूप गंगा मौत की दहलीज तक पहुंच जाते हैं लेकिन वो मीडिया में जगह तक नहीं बना पाते। कुल मिलाकर देश में जितनी भी समस्यायें हैं वो किसी ग्लैमर की उपज नहीं हो सकती क्योंकि उसका भी अपना एक कारण है जिसके लिए एक सार्थक कदम की जरूरत है न कि उसके महिमामंडन की।
लेख़क अजय पांडेय अमर भारती समाचार पत्र में उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं.


