नई दिल्ली : जुलाई २०१० में रेलवे बोर्ड ने नई कैटरिंग पालिसी की घोषणा की थी और २००५ की नीति को पलट दिया था. २००५ की नीति में ट्रेनों में खान पान की व्यवस्था का सारा ज़िम्मा सरकारी कंपनी आईआरटीसी के हवाले कर दिया था. लेकिन रेल विभाग ने २०१० में दावा किया कि आईआरटीसी ने ट्रेनों में खाने पीने की सही व्यवस्था नहीं की और हालात बहुत बिगड़ गए. नई कैटरिंग पालिसी में रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष ने दावा किया था कि अब यह इंतज़ाम रेल विभाग खुद करेगा और सब ठीक हो जाएगा. लेकिन रेलवे का काम काज देखने के लिए बनायी गयी संसद की स्टैंडिंग कमेटी की ताज़ा रिपोर्ट से पता चलता है कि करीब दो साल पहले बहुत ही ताम झाम के साथ नई नीति की घोषणा करने के बाद भी रेलवे बोर्ड ने अपना काम सही तरीके से नहीं किया है और ट्रेनों में खान पान का इंतज़ाम उसी गैर ज़िम्मेदार आईआरटीसी और उसके ठेकेदारों के रहमो करम पर चल रहा है.
संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में लिखा है कि कमेटी को इस बात की बहुत तकलीफ है कि नई कैटरिंग पालिसी जुलाई २०१० में जारी की गयी थी लेकिन उसको लागू करने का काम बहुत ही ढीला है. बजट सत्र के अंतिम दिन की पूर्व संध्या पर संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी गयी रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि रेलवे बोर्ड को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए और अपनी ही घोषित नीति को लागू करने के लिए ईमानदारी से कोशिश करनी चाहिए. कैटरिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए जब कमेटी के सदस्यों ने मई २०११ में अहमदाबाद, बंगलोर, मैसूर और गोवा का दौरा किया तो उन्हें बताया गया कि नई नीति को लागू करने में बहुत दिक्क़तें हैं. आईआरसीटीसी से खान पान की सेवाओं को पूरी तरह से लेने में २२ समस्याएं हैं. जिसमें स्टाफ की कमी, ठेकेदारों की मुक़दमे बाज़ी की आशंका और रेलवे के मौजूदा स्टाफ में कुशल खान पान कारीगरों की कमी जैसे मुद्दे शामिल हैं.
कमेटी ने सुझाव दिया कि यह ऐसी समस्याएं नहीं हैं जिनका कोई हल न हो. कमेटी ने यह भी कहा है कि रेलवे को चाहिए आईएसओ सर्टिफिकेट वाले किचेन की स्थापना ख़ास रेलवे स्टेशनों के परिसर में ही करे. जहां भोजन की क्वालिटी पर नज़र रखने वाला स्टाफ भी हो. इसका लाभ यह होगा कि खाना सही वक़्त पर सप्लाई किया जा सकेगा. कमेटी ने सुझाव दिया है कि १६ घंटे से ज्यादा समय तक चलने वाली लम्बी दूरी की सभी ट्रेनों में पैंट्री
कार की व्यवस्था की जानी चाहिए. जुलाई २०१० से नई कैटरिंग पालिसी लागू है लेकिन अभी ज़मीन पर तो कहीं कुछ नहीं दिख रहा है. रेलवे के ज़िम्मेदार लोगों को उम्मीद है कि स्थायी समिति की रिपोर्ट के बाद शायद बड़े अधिकारियों को प्रेरणा मिले और ट्रेनों में ठेकेदारों और आईआरटीसी वालों की मनमानी का शिकार हो रहे यात्रियों को कुछ राहत मिले.
लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार तथा स्तम्भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्स समेत कई संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.


