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सजा देने को आतुर मतदाता ही हिमाचल में निभाएंगे निर्णायक भूमिका

प्रजातंत्र में जागरूक जनता के मन में जब किसी विषय को लेकर नाराजगी या आक्रोश की भावना घर कर जाती है तो उसका असर चुनावों के नतीजों को अवश्य ही प्रभावित करता है. परन्तु न जाने क्यूँ राजनेता और दल सत्ता में रहते हुए पूर्व के अनुभवों को विस्मृत करते हुए जनता की नब्ज पहचानने की भूल कर जाते हैं. आगामी ४ नवम्बर को हिमाचल विधानसभा के होने वाले चुनावों में जनता की चुप्पी कुछ वैसा ही आभास दे रही है जैसा कि १९७७ के लोकसभा के चुनावों के दौरान नजर आता था. दूसरी बड़ी बात इन चुनावों में देखने में यह आ रही है कि सरकार चला रही भाजपा को अन्य अनेक कठिनाइयों के साथ ही विभिन्न कारणों से प्रदेश भर के अपने रुष्ट और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं व समर्थकों की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है जो वर्तमान सरकार और भाजपा संगठन को सजा देने का मन बना चुके है. आश्चर्यजनक बात यह है कि ऐसा भाजपा के साथ पहले कभी नहीं हुआ था.    

प्रजातंत्र में जागरूक जनता के मन में जब किसी विषय को लेकर नाराजगी या आक्रोश की भावना घर कर जाती है तो उसका असर चुनावों के नतीजों को अवश्य ही प्रभावित करता है. परन्तु न जाने क्यूँ राजनेता और दल सत्ता में रहते हुए पूर्व के अनुभवों को विस्मृत करते हुए जनता की नब्ज पहचानने की भूल कर जाते हैं. आगामी ४ नवम्बर को हिमाचल विधानसभा के होने वाले चुनावों में जनता की चुप्पी कुछ वैसा ही आभास दे रही है जैसा कि १९७७ के लोकसभा के चुनावों के दौरान नजर आता था. दूसरी बड़ी बात इन चुनावों में देखने में यह आ रही है कि सरकार चला रही भाजपा को अन्य अनेक कठिनाइयों के साथ ही विभिन्न कारणों से प्रदेश भर के अपने रुष्ट और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं व समर्थकों की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है जो वर्तमान सरकार और भाजपा संगठन को सजा देने का मन बना चुके है. आश्चर्यजनक बात यह है कि ऐसा भाजपा के साथ पहले कभी नहीं हुआ था.    

हिमाचल प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपने पहले चार वर्षों तक के शासन के दौरान जहाँ जनहित के अनेक महत्वपूर्ण फैसलों के साथ-साथ कोई एक भी ऐसा कदम उठाने से परहेज किया जिससे चुनावों में उसे जनसाधारण का आक्रोश झेलना पड़ता. परन्तु शासन के अंतिम वर्ष में वह तमाम विवादों के घेरे में आ गई. मुख्यविरोधी दल कांग्रेस में चल रही तत्कालीन अंतर्कलह के चलते व राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में विकास के पुरस्कार पाने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री धूमल और भाजपा संगठन इतना अति आत्मविश्वासी हो गया कि उसने अपने ही वरिष्ठ नेताओं की अनसुनी और कार्यकर्ताओं की अनदेखी करते हुए बरसाती नेताओं और सलाहकारों को सत्ता व संगठन का घेरा बनाने की अनुमति देने का अनुचित कार्य किया. इतना ही नहीं चुनावों में भी अनेक पुराने और कर्मठ विधायकों के बिना किसी जायज कारण से टिकट काटे गए, जिसके फलस्वरूप न केवल अपने ही दल के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोले ले ली बल्कि चुनावों में पार्टी को समर्थन देने वाले जनसाधारण के मन में भी संशय पैदा करने का कार्य किया. चुनावों तक यदि कांग्रेस में कौन बनेगा मुख्यमंत्री की प्रतिस्पर्धा चलते यदि अंतर्कलह चलती रहती तब तो संभव था कि सत्तारूढ़ भाजपा सत्ता पर काबिज रहने की जंग सरलता से जीत जाती, परन्तु चुनावों से पूर्व कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते ५ बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह को कमान सौंपने का जो बुद्दिमातापूर्ण कार्य किया है उससे एक ओर जहाँ कांग्रेसजनों में नया जोश पैदा हुआ वहीँ भाजपा की मुश्किलें बड़ा दी हैं.

 

वैसे भी यह जग जाहिर है कि कांग्रेस में वीरभद्र सिंह के अतिरिक्त कोई भी अन्य ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जिसका प्रदेश की सभी ६८ विधानसभा क्षेत्रों पर प्रभाव हो. चुनावी बेला में वीरभद्र सिंह जैसे कद्दावर नेता को चुनावों में अलग-थलग रखना कांग्रेस को चुनावों में पराजय के साथ-साथ दल में विघटन जैसी आत्मघाती परिस्थिति का भी सामना करना पड़ सकता था. हिमाचल प्रदेश में वर्ष १९९० से २००७ तक के चुनावी नतीजों के इतिहास पर यदि नजर दौडाएं तो १९९३ को छोड़ २००७ तक के चुनावों में विपरीत परिस्थियों में भी जहाँ भाजपा या कांग्रेस ने कम से कम ३६ प्रतिशत मत प्राप्त किये वहीँ कम से कम ४ से ६ प्रतिशत मतों की बढ़त लेकर सत्ता के संघर्ष में विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है. इसका अर्थ यह हुआ कि प्रदेश के कुल मतों के ७२ प्रतिशत भाग पर इन दो बड़े दलों का स्पष्ट कब्ज़ा है. शेष रह गए लगभग २८ प्रतिशत मत, तो इसके बड़े भाग को रिझाने में जो भी दल कामयाब हो जाता है वही सत्ता का सुख प्राप्त करता है. स्थानीय मुद्दों को छोड़ इस बार के चुनावों में कोई भी मुद्दा नहीं है. देशव्यापी महंगाई, भ्रष्टाचार, नेताओं द्वारा किये गए बड़े पैमाने के घोटालों के आरोपों का असर इन चुनावों में कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा है. जनता खामोश है और यह खामोशी तूफान से पहले होने वाली खामोशी का आभास अधिक दे रही है. ऐसे में ऊंट किस करवट बैठेगा कहा नहीं जा सकता.

 

दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा रिपीट और डिफीट को अवश्य ही मुद्दा बनाने के अथक प्रयास स्पष्ट दिखाई दे रहे है. चुनावी प्रचार के दौरान ही चर्चा में आये गडकरी या वीरभद्र सिंह पर अनियमितताओं के आरोपों का भी कहीं असर दिखाई नहीं दे रहा है. ऐसे में चुनावों के नतीजों पर कुछ पूर्वानुमान लगाना कठिन कार्य साबित हो रहा है. इस बार चुनावों में दोनों दलों के कुछ बागियों द्वारा निर्दलीय प्रत्याशियों के रूप में खड़े होने के साथ-साथ पूर्व भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष महेश्वर सिंह की हिलोपा व वाम दलों को मिला कर बनाये गए तथाकथित तीसरे मोर्चे, ममता बनर्जी की टीएमसी, मायावती की बसपा व शरद पंवार की एनसीपी आदि कुछ प्रसिद्ध दलों के भी उतरने से कुछ क्षेत्रों में जहाँ एक ओर चुनाव बहुत ही रोचक हो गया है, वहीँ भाजपा से नाराज समर्थकों द्वारा अपनी ही सरकार को सबक सिखाने के लिए विरोद्ध स्वरूप किए जाने वाले मतदान की आशंका से मतों का बिखराव बड़े पैमाने पर होने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता. कुछ बागियों व निर्दलियों को उनके क्षेत्रों में मिलनेवाले व्यापक जनसमर्थन ने भी दलों के अधिकारिक उम्मीदवारों में घबराहट पैदा कर दी है. मतों के बड़े पैमाने के संभावित बिखराव के चलते बनते-बिगड़ते समीकरण से अधिकतर सीटों पर जय-पराजय का निर्णय बहुत ही कम मतों से होगा और अनिश्चितता से भरे इस वातावरण में दो की टक्कर में कोई तीसरा बाजी जीत जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

 

लोकसभा के ४ क्षेत्रों वाले हिमाचल प्रदेश में परम्परागत भाजपा का समर्थक रहनेवाले लोकसभा क्षेत्र कांगड़ा और किसी हद तक संतुलन बनाने वाले मंडी में पड़नेवाली सभी ३४ विधानसभा की सीटों से सूत्रों के हवाले से मिलने वाले संकेतों की माने तो इसे भाजपा के लिए सुखद नहीं कहा जा सकता. हमीरपुर जो कि वर्तमान कुख्यमंत्री धूमल और उनके पुत्र अनुराग ठाकुर का गृह क्षेत्र है, उसके अंतर्गत पड़ने वाले जिला हमीरपुर, ऊना व बिलासपुर के १७ विधानसभा क्षेत्रों ऊना और बिलासपुर में अभी तक तो बराबर की टक्कर चल रही है भाजपा और कांग्रेस में. जहाँ तक शिमला लोकसभा (आरक्षित) क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाली शिमला, सोलन, नाहन व किन्नौर जिले की १७ सीटों का प्रश्न है तो यहाँ कांग्रेस अवश्य ही बढ़त लेकर पुराना इतिहास कायम रखेगी. तमाम चुनावी हलचलों के मध्य एक पुरानी कहावत ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है कि “क़यामत की तो अंतिम दो रातें होंगी, जो उन दो रातों में बढ़त बना गया वही कामयाब होगा.” इन सब के बीच यदि मतदान पिछले चुनावों से अधिक हुआ तो नतीजों का अंदाजा मतगणना से पूर्व ही सरलता से लगाया जा सकता है.

 

लेखक विनायक शर्मा विप्र वार्ता के संपादक हैं.

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