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सत्‍ता के पहले ही द्वार पर फंस गया अभिमन्‍यु!

यह राजनीति भी बड़ी महाठगनी है, उ.प्र. के युवराज ने अपनी पारी शुरू भी नहीं की कि उन्हें रोज राजनीति के नए सबक मिल रहे हैं। महाभारत के ‘अभिमन्यु को तो सातवें द्वार पर जाकर संकट का सामना करना पड़ा था, पर इस युवराज को तो पहले ही द्वार पर मुसीबतों से दो-चार होना पड़ रहा है। एक पिता को उम्मीद थी कि उसका बेटा बड़ी आसानी से उनकी विरासत को संभाल लेगा। बेटे ने भी लायक बेटे की तरह पिता के सपने साकार करने के लिये मेहनत शुरू कर दी। पिता के काम में हाथ बंटाना ही नहीं शुरू किया, बल्कि दिन-रात मेहनत करके ऐसा माहौल बनाया कि किसी को भी ऐसे नतीजों की उम्मीद नहीं थी। पिता को लगा कि चलो अब आसानी से राजतिलक कर सकेंगे, पर शायद पिता भूल गए कि बिगड़े काम का कोई जिम्मेदार नहीं होता, पर सफलता का सेहरा सब अपने सर बांधना चाहते हैं।

यह राजनीति भी बड़ी महाठगनी है, उ.प्र. के युवराज ने अपनी पारी शुरू भी नहीं की कि उन्हें रोज राजनीति के नए सबक मिल रहे हैं। महाभारत के ‘अभिमन्यु को तो सातवें द्वार पर जाकर संकट का सामना करना पड़ा था, पर इस युवराज को तो पहले ही द्वार पर मुसीबतों से दो-चार होना पड़ रहा है। एक पिता को उम्मीद थी कि उसका बेटा बड़ी आसानी से उनकी विरासत को संभाल लेगा। बेटे ने भी लायक बेटे की तरह पिता के सपने साकार करने के लिये मेहनत शुरू कर दी। पिता के काम में हाथ बंटाना ही नहीं शुरू किया, बल्कि दिन-रात मेहनत करके ऐसा माहौल बनाया कि किसी को भी ऐसे नतीजों की उम्मीद नहीं थी। पिता को लगा कि चलो अब आसानी से राजतिलक कर सकेंगे, पर शायद पिता भूल गए कि बिगड़े काम का कोई जिम्मेदार नहीं होता, पर सफलता का सेहरा सब अपने सर बांधना चाहते हैं।

‘खान चाचा ने चर्चित नाम डीपी यादव को पार्टी में शामिल कर लिया। छवि दागदार मानी गयी तो युवराज ने तपाक से कह दिया ‘नो’,…’खान चाचा को बुरा लगा.., बोले बच्चा है,…एक और बड़े चाचा मोहन सिंह भी टीवी वालों के चक्कर में बोल गए, पर बच्चे ने सामने आकर जवाब दिया ‘बच्चा नहीं हूँ’, फैसला वही हुआ जो ‘बच्चे’ ने चाहा। कुछ लोगों को लगा कि हमारी हैसियत को चुनौती दी गयी है, वो नाराज़ भी हो गए, पर ‘बच्चा छा गया’, लोगों को दिखाई दी इस बच्चे में उम्मीद की किरण। लोगों को लगा यही है, जो बदल सकता है हालात, सुधार सकता है माहौल, और लोगों ने दे दिया बम्पर समर्थन और बच्चे को बना दिया युवराज। पिता खुश थे, बेटे ने वो कर दिखाया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। खुद पिता को भी और संगी साथियों को भी। लगा कि अब तो जनता ने भी कह दिया यही है युवराज, इसे ही दिया है हमने उम्मीद का समर्थन, अब शायद इसे गद्दी पर बैठाना आसान होगा, पर ये राजनीति है, कभी किसी की सगी नहीं होती, इसे केवल अपना दीखता है, अपनों का भी नहीं।

‘खान चाचा’ फिर भड़क गए, बच्चा है, इसे नेता कैसे मान लूँ? एक और चाचा नाराज़ हो गए, घर का टीपू हमारा ‘बॉस’ कैसे बन सकता है, पिता ने समझाया, पुराने संबंधों का वास्ता दिया, मान मनौव्वल की और बच्चे ने आदर के साथ पैर छूकर कहा-आशीर्वाद दो, आखिर राज तिलक के लिए सब को तैयार भी कर लिया। पिता को लगा शायद अब सब ठीक हो गया, नए बने युवराज ने भी कहा- देखो अब माहौल बदल दूंगा, छोटा मंत्रिमंडल बनाकर प्रदेश में अच्छा माहौल दूंगा। 14 मार्च की रात लग रहा था कि, 15 की सुबह शायद प्रदेश में नई रौशनी लाएगी। शपथ हुई और साफ़ हो गया कि राजनीति ने युवराज की भावनाओं को कुचल दिया है। युवराज के नए सपनों को पंख नहीं लग पाए। एक दागी को ‘नो’ कहकर रातोंरात जनता की उम्मीद बनने वाला युवराज तो खुद कई दागियों का बगलगीर होने को मजबूर हो गया। मीडिया ने पूछा तो मासूम सी सफाई भी दी। मुक़दमे किसने और कब लिखाये, देख लो तो पता चल जायेगा कि मामला केवल राजनीतिक है, सब जान रहे थे कि यह मजबूरी की सफाई है, खुद युवराज भी, पर आम आदमी को लग गया कि अभिमन्यु पहले ही चक्रव्यूह में फंस गया है।

शपथ के बाद हुडदंग मचाने वालों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा कर युवराज ने फिर कोशिश की है कि भरोसा रखो माहौल बदलूँगा, पर किसी ‘अनुभवी’ ने शपथ तक गलत ले ली, विभागों के बंटवारे को लेकर सर फुटव्वल चल रही है, तीन दिन हो गए अभी तक लोगों को मनाने में ही समय लग रहा है, हालात ऐसे कि कल (आज) इतनी जल्दी फिर मंत्रिमंडल विस्तार करना पड़ रहा है। एक हफ्ते में ही विस्तार और विभागों का बंटवारा न हो पाना, ऐसे में लोगों का भरोसा डगमगा रहा है कि राजनीति के घाघ क्या इस अभिमन्यु को आसानी से चक्रव्यूह पार करने देंगे..? जनता तो बस उम्मीद और ऊपर वाले के भरोसे पर ही जिन्दा रहने की आदी हो गयी है, बस दुआ ही कर सकती है कि इस युवराज की रक्षा हो, इसे किसी की नजऱ न लगे, घाघों में घिरकर यह कहीं फंस न जाये और जो उम्मीद बाँधी है, वो कहीं टूट न जाए। (रॉयल बुलेटिन)

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