Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

सपने छीनने वाले कामयाब भले हो जाएं पर उसे संभाल नहीं सकते

सपनों के बिना कोई नयी शुरुआत नहीं हो सकती। सपने छीने नहीं जाते, सपने देखे जाते हैं, गढ़े जाते हैं। जो सपने छीनने की घात में रहते हैं, जो मौका पाते ही किसी दूसरे की आँखों के सपने ललचायी मुट्ठी में बंद करने की कोशिश करते हैं, वे कामयाब हो भी जायें तो भी उसे संभाल नहीं सकते क्योंकि उनकी आंखों में उन सपनों की उड़ान होती ही नहीं। ऐसे लालची और क्रूर लोग सपनों के पंख नोच सकते हैं, जमीन पर एक हकीकत की तरह उनके उतरने के पहले ही उन्हें घायल कर सकते हैं, उनसे खेल सकते हैं, उन्हें तोड़ सकते है लेकिन सच यही है कि खूबसूरत जिंदगी के पक्ष में देखे गये सपनों का मजाक उड़ाने वालों को समय कभी माफ नहीं करता, उन्हें अपने कुत्सित लोभ का खामियाजा भुगतना ही पड़ता है।

सपनों के बिना कोई नयी शुरुआत नहीं हो सकती। सपने छीने नहीं जाते, सपने देखे जाते हैं, गढ़े जाते हैं। जो सपने छीनने की घात में रहते हैं, जो मौका पाते ही किसी दूसरे की आँखों के सपने ललचायी मुट्ठी में बंद करने की कोशिश करते हैं, वे कामयाब हो भी जायें तो भी उसे संभाल नहीं सकते क्योंकि उनकी आंखों में उन सपनों की उड़ान होती ही नहीं। ऐसे लालची और क्रूर लोग सपनों के पंख नोच सकते हैं, जमीन पर एक हकीकत की तरह उनके उतरने के पहले ही उन्हें घायल कर सकते हैं, उनसे खेल सकते हैं, उन्हें तोड़ सकते है लेकिन सच यही है कि खूबसूरत जिंदगी के पक्ष में देखे गये सपनों का मजाक उड़ाने वालों को समय कभी माफ नहीं करता, उन्हें अपने कुत्सित लोभ का खामियाजा भुगतना ही पड़ता है।

जिनका सरोकार केवल कुछ धेले जमा करने तक है, धोखे से कुर्सी तक पहुंच जाने भर तक है, अपमान, तिरस्कार और दुख रास्ते में उनका इंतजार करते खड़े रहते हैं। उन्हें प्रकृति के न्याय की समझ नहीं होती। वे जानते ही नहीं कि प्रकृति स्वयं हर नये सपने के साथ खड़ी रहती है, उसे जमीन देने की कोशिश करती रहती है। उसके सीने में अपरिमित सदाशयता भरी रहती है, वह महाकरुणा से ओत-प्रोत रहती है। वही हर बीज के खोल में बंद सपने को बाहर आने का मौका देती है, उसे अंकुरने में मदद करती है, उसके लिए बरसती है, बहती है, उसके सिर पर धूप बनकर चमकती है। हर पेड़, हर फूल, हर फल प्रकृति की आंखों में उतरे हुए सपनों का हिस्सा है। नदियां, झीलें, निर्झर, पहाड़ और रेगिस्तान भी उसके देखे हुए सपने हैं। ये सभी जीवन के पक्ष में हैं। जीवन के विरुद्ध कोई सपना होता ही नहीं।

रेगिस्तान में उगे नागफनी के फूल किसी के भी दिल को मोह लेते हैं और वही नागफनी रेत के सीने को पीकर अपनी आंतों में पानी जमा करता है। यह बात आदमियों को पता हो न हो लेकिन रेत पर फिसलते हुए जीने और रेत के भीतर धंसकर रहने वाले जानवरों को जरूर पता होती है। पहाड़ ऊपर से जितना भी सख्त और मारक दिखता हो, हमारी छोटी-छोटी चुनौतियों से चाहे जितना ऊंचा हो लेकिन किसी न किसी मोड़ पर वह भी पसीजता, झरता दिखायी पड़ जाता है। जंगल चाहे जितना भयानक हो, जितना भी सघन हो, जीवन से वंचित नहीं रहता। हो सकता है सूरज उसे भेदकर जमीन तक न पहुंच पाये, हो सकता है, जंगल के भीतर गहरे अंधकार के अलावा किसी और चीज की कल्पना संभव न हो लेकिन,  जो भी उसकी मर्यादा से परिचित होगा, जो भी उसके साथ रहने की कला जानता होगा, उसे जंगल पूरा प्यार देता है, जीवन देता है।

ये प्रकृति के सपने हैं। वह सजीव सपने रचती है, वह स्पंदन रचती है, वह गति रचती है और आगे बढ़ती रहती है, वह बाँसुरी रचती है और उसमें स्वयं ही बज उठती है, बजती रहती है। जो प्रकृति को इस रूप में जानते हैं, वे कभी निराश नहीं होते, कभी हताश नहीं होते, कभी टूटते नहीं, कभी तोड़ते नहीं। प्रकृति में कुछ भी जीवन के विरुद्ध नहीं। अगर ऐसा कुछ दिखता भी है तो हमारी नासमझी केकारण। जंगल का न्याय भी जीवन के विरुद्ध नहीं होता। यह ठीक है कि एक जानवर को मारकर खाते हुए दूसरा ताकतवर जानवर खूबसूरत नहीं लगता, भय और सिहरन पैदा करता है लेकिन यह वीभत्सनाट्य भी जीवन के पक्ष में ही है। कोई भी जीव स्वतंत्र सत्ता के रूप में बना नहीं रह सकता। सवके बीच जीवन एक अन्योन्याश्रय संबंध रचता है।
प्रकृति को एक संतुलन भी बनाये रखना होता है, और यही एक-दूसरे पर निर्भरता का सिद्धांत उस संतुलन को जन्म देता है। इसी संतुलन पर नये सपने टिकते हैं, उगते हैं, फलते-फूलते हैं।
मनुष्य जंगल से दूर रहता है। वह डरता है, वह जीना चाहता है और सबसे बड़ी बात वह सोचता है। इसीलिए उसका जीवन जंगल के न्याय से संचालित नहीं होता। जंगल का शेर अगर दया, करुणा से भर उठे तो आप समझ सकते हैं उसके जीवन का क्या होगा, अगर वह सोचना शुरू कर दे तो उसका भविष्य कितना लंबा होगा? इसी तरह अगर मनुष्य सोचना बंद कर दे, अपने भीतर से भाव-संवेदना को बाहर निकाल फेंके तो उसके जंगली हो जाने में कितनी देर लगेगी? वह दूसरे मनुष्यों को भले मारकर न खाये मगर उनके जीवन को, उनके सपनों को, उनके भविष्य को जरूर मार सकता है। कभी-कभी लगता है कि आज का समय कुछ ऐसा ही होता जा रहा है। जैसे-जैसे मनुष्य जंगल काटकर अपनी बस्तियाँ बसा रहा है, वैसे-वैसे जंगल उसके भीतर उतरता जा रहा है। ज्यादातर लोग केवल अपने स्वाद, अपने हित और अपने अर्थ का चिंतन करने लगे हैं। केवल जरूरत भर का नहीं, ज्यादा से ज्यादा जितना हो सके, जैसे हो सके। दूसरों को मिटाकर भी, दूसरों को मार कर भी, दूसरों के भविष्य रौंदकर भी। निर्ममता, क्रूरता और बर्बरता के साथ।

ऐसे लोग सपनों और सरोकार की बात क्या करेंगे, कैसे करेंगे? यह दुनिया आलीशान मकानों में रहने वाले भेडिय़ों से पट जाये, इससे पहले ही कुछ करना होगा। वक्त बार-बार मौका नहीं देता है। वह किसी की परवाह किये बगैर निरंतर आगे बढ़ता रहता है। जो उसकी धड़कन नहीं पहचानते, पीछे छूट जाते हैं। बड़े सपनों को बचाने के लिए समय की पहचान, उसके प्रवाह की दिशा जाननी पड़ती है। जो आँखें खुली रखते हैं, जो आदमी और जानवर में फर्क करना जानते हैं, वही वक्त की दस्तक को भी पहचान सकते हैं। निस्संदेह वे जहाँ भी हैं, वहाँ से जानवर होते आदमी की चेतना पर छाते हुए जंगल के खिलाफ आवाज लगा रहे हैं, विचार करने वालों को सावधान कर रहे हैं, एकजुट कर रहे हैं। पर खतरा बड़ा है इसलिए प्रतिकार भी बड़ी ताकत से ही संभव है।  इस खतरे से लडऩे के लिए उन सभी लोगों को मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना होगा, जो अभी भी अपनी दुनिया से बाहर वृहत्तर समाज के पक्ष में सोचते हैं, जो मनुष्यों की दुनिया में दिन-ब-दिन बढ़ती जंगल-न्याय या मत्स्य-न्याय की प्रवृत्ति के विरुद्ध हैं। ऐसे ही लोग न्यायपूर्ण और बराबरी के सिद्धांत पर नयी समाजरचना के सपने गढ़ सकते हैं। ऐसे ही लोग बड़े सपनों को बचा सकते हैं, उन्हें सजा दे सकते हैं जो बेहतर समाज के सपनों की चमक को कैद करके अपने गंदे चेहरे चमकाना चाहते हैं।

लेखक सुभाष राय वरिष्‍ठ पत्रकार एवं साहित्‍यकार हैं. वे अमर उजाला, डीएलए, जनसंदेश टाइम्‍स जैसे अखबारों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों वे लखनऊ-इलाहाबाद से प्रकाशित डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लेख डीएनए में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...