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‘सपने जैसा कुछ’ निर्मित कर पाया है भाषा का एक सांस्‍कृतिक स्‍वरूप

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के साहित्‍य विद्यापीठ में आयोजित ‘कहानी पाठ’ कार्यक्रम में पांच कहानी संग्रह, दो नाटक, एक यात्रावृत रचने वाले वरिष्‍ठ कथाकार महेश कटारे ने अपनी कहानी ‘सपने जैसा कुछ’ का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ साहित्‍यकार व विवि के आवासीय लेखक से.रा.यात्री ने की। इस दौरान साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो.सूरज पालीवाल, प्रो.के.के.सिंह मंचस्‍थ थे। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में साहित्‍यकार से.रा.यात्री ने महेश कटारे के कहानी एवं उपन्‍यास दोनों के कथ्‍य, शिल्‍प और भाषा की शक्ति को लेकर अपने विचार प्रकट किए। उन्‍होंने उपन्‍यास की चर्चा करते हुए कहा कि उपन्‍यास की जानदार परिवेश ने एक चमत्‍कारपूर्ण वातावरण की सृष्टि की है। कथा के प्राचीन वृतांत के संबंध में उन्‍होंने कहा कि यह अपनी संस्‍कृति भूमि के अनुरूप ही भाषा का एक सांस्‍कृतिक स्‍वरूप निर्मित कर पाया है।

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के साहित्‍य विद्यापीठ में आयोजित ‘कहानी पाठ’ कार्यक्रम में पांच कहानी संग्रह, दो नाटक, एक यात्रावृत रचने वाले वरिष्‍ठ कथाकार महेश कटारे ने अपनी कहानी ‘सपने जैसा कुछ’ का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ साहित्‍यकार व विवि के आवासीय लेखक से.रा.यात्री ने की। इस दौरान साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो.सूरज पालीवाल, प्रो.के.के.सिंह मंचस्‍थ थे। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में साहित्‍यकार से.रा.यात्री ने महेश कटारे के कहानी एवं उपन्‍यास दोनों के कथ्‍य, शिल्‍प और भाषा की शक्ति को लेकर अपने विचार प्रकट किए। उन्‍होंने उपन्‍यास की चर्चा करते हुए कहा कि उपन्‍यास की जानदार परिवेश ने एक चमत्‍कारपूर्ण वातावरण की सृष्टि की है। कथा के प्राचीन वृतांत के संबंध में उन्‍होंने कहा कि यह अपनी संस्‍कृति भूमि के अनुरूप ही भाषा का एक सांस्‍कृतिक स्‍वरूप निर्मित कर पाया है।

उन्‍होंने कहानी के संबंध में कहा कि एक अत्‍यन्‍त उपेक्षित विषय को महेश कटारे ने अपने विवरणों से जो संगति दी है वह हमारे युग में कम ही देखने को मिलती है। कहानी का अंतरकथ्‍य यद्यपि बहुत दम घुटने वाला प्रतीत होता है किंतु लेखक ने इसके अंत में एक बहुत ही सकारात्‍मक संकेत छोड़ा है कि हम उन सारी चुनौतियों को झेल ले जाएं जो आने वाली पीढ़ी के मार्ग में अवरोध उपस्थित करती हैं। लेखक की भाषा सहज और विषय के अनुरूप है तथा यह प्रमाणित करती है कि कथ्‍य एवं शिल्‍प दोनों का संतुलन गहरी पठनीयता को रेखांकित करने में समर्थ है। विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. सूरज पालीवाल ने महेश कटारे को जमीन से जुड़े हुए ग्रामीण जीवन के विविधताओं के कथाकार बताते हुए कहा कि उन्‍होंने अपने लेखन में बाजार केंद्रित आज की महानगरीय प्रदूषणयुक्‍त दुष्‍प्रवृतियों को पूर्णत: नकार कर शोषित वंचित भारतीय कृषक और श्रमिक वर्ग का, उसकी खूबियों व खामियों का बड़ा सशक्‍त वर्णन किया है।

प्रो. के.के.सिंह ने कहा कि महेश कटारे की यह कहानी समाज के शहरी निम्‍न वर्ग के जीवन यथार्थ का मार्मिक चित्रण करती है। आज जबकि हिंदी कहानी में इस वर्ग के चित्रण की ओर किसी का ध्‍यान नहीं है उसमें कटारे जी ने उस परिवेश का गहराई से निरीक्षण कर प्रस्‍तुत करने का प्रामाणिक और सफल प्रयास किया है। विवि के महात्‍मा गांधी दूरस्‍थ शिक्षा के सहायक प्रोफेसर अमरेन्‍द्र शर्मा ने कहा कि महेश कटारे की कहानियां अपने गहरे अनुभव से निकलकर हमारे समाज के यथार्थ के साथ हमारे साझेपन का रिश्‍ता कायम करती है और हमें प्रचलित कहानी की धारा से एक अलग आस्‍वाद देती है। साहित्‍य विद्यापीठ के असिस्‍टेंट प्रोफेसर अरूणेश नीरन ने कटारे की कहानी के कथ्‍य की विशेषता की ओर ध्‍यान दिलाते हुए कहा कि यह कहानी अपने अंत में एक सकारात्‍मक संकेत छोड़ती है। इस अवसर पर डॉ. रामानुज अस्‍थाना, डॉ. अशोकनाथ त्रिपाठी, मनोज पांडेय, राकेश मिश्र सहित बड़ी संख्‍या में शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में मौजूद थे।

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