भारतीय सांसदों ने एकमत से टीम अन्ना के विरुद्ध चेतावनी प्रस्ताव में पारित किया है। हाल ही में एक सार्वजनिक सभा में टीम अन्ना ने लोकपाल बिल मामले में सांसदों के आचरण को चोर की दाढ़ी में…. कहा तो श्रोताओं ने…. तिनका का नारा दिया। हमारे सांसदों को यह नागवार गुजरा कि उसके 150 से अधिक अपराधियों को चोर कहा जाय। प्रश्न है कि चोर को चोर नहीं तो क्या कहा जाय। यह भी एक चिंतन का विषय है कि 540 संख्या वाले सदन को 150 संख्या वाले सांसद कैसे संचालित कर रहे हैं, वरना करीब 400 सांसद तो दागी नहीं हैं, वे दागियों के पक्ष में कैसे हो गए? गाय को पूँछ हिलाते हुए तो देखा है पर यहाँ तो पूँछ ही गाय को हिला रही है। संसद के विभिन्न राजनैतिक दल एक दूसरे को चोर उचक्का कहें तो क्षम्य, लोक कुछ कहे तो अवमानना, हमारा बच्चा मुन्ना, आपका बच्चा जनसंख्या, यह समझ से परे है।
ऐसे चरित्र वाले संसद से हम मजबूत लोकपाल क़ानून की अपेक्षा कैसे कर सकते है जो चार दशकों से तो तंत्र के भ्रष्टाचार को सह रही है, पर सड़क पर कही गई बात पर चार मिनट में लोक पर निंदा प्रस्ताव पारित कर देती है। अब तो दो ही रास्ते हैं -या तो संसद का चरित्र बदले या संसदीय लोकतंत्र का प्रारूप ही बदले। आजादी के बाद से वर्तमान तक का रिकार्ड तो यही कहता है कि संसद के चरित्र के बदलने की अपेक्षा करना मृगमरीचिका है। पहले इक्का-दुक्का सांसद दागी थे, फिर उनकी संख्या बढ़ी, अब तो वे ही उसके संचालक बन गए हैं, हद हो गई जब उनकी सच्चाई कहने वाले को ही दण्डित करने की योजना बन रही हो। तानाशाही में तो कोई इकाई सर्वोच्च बन सकती है, पर लोकतंत्र में इकाइयां एक-दूसरे की पूरक हुआ करती हैं। इन सांसदों को यह भी नहीं पता कि भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका एक दूसरे की पूरक हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि सांसदों ने संसद सर्वोच्च की गलतफहमी में अपनी चिंतन शक्ति खो दी है। इन्हें लोकतंत्र की पाठशाला में ककहरा सीखने की जरूरत है। इन सांसदों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की ‘हिंद स्वराज’ पढ़नी चाहिए जिसमें बापू ने संसद को गणिका एवं बाँझ कहकर संबोधित किया है। संसदीय शासन प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह होता है कि लोक का प्रतिनिधि दबाव के अभाव में उच्चशृंखल हो जाता है। और दबाव तानाशाही का हिंसा का साक्षात प्रतीक होता है। लोकतंत्र का सही ‘अर्थ “लोक का तंत्र” होता है जो दुर्भाग्य से वर्तमान में संसद सर्वोच्च नारे के कारण “लोक के लिए तंत्र” की विकृत परिभाषा में तब्दील हो गया है। आज तंत्र ईमानदारी से यह मान बैठा है कि लोक को काबू में रखना ही उसका पवित्र कर्तव्य है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि अपराधी, भ्रष्टाचारी वर्ग तंत्र में घुसपैठ बना ले और अंततोगत्वा स्वयं तंत्र बन बैठें। तानाशाही शक्ति के केन्द्रीकरण को कहते हैं और लोकतंत्र शक्ति के विकेंद्रीकरण को। 21वीं सदी का भारतीय इतना तो योग्य हो ही गया है कि अपना भला बुरा खुद समझे। क्यों हम प्रतिनिधि लोकतंत्र के माडल को अनंत काल तक ढोते रहें? क्यों न सभी संवैधानिक अधिकार मूलभूत इकाई (ग्राम सभा, मोहल्ला सभा) के पास हों? क्योंकि संसद से ऊंची तो लोक-संसद होती है।
लेखक सिद्धार्थ शर्मा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


