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समय से मुठभेड़ करती कविताएं

: प्रो. रमेश दीक्षित के एकल काव्यपाठ से आरम्भ का पुनरारम्भ : प्रख्यात कवि नरेश सक्सेना का आरम्भ प्रभावशाली रहा। आरम्भ की गोष्ठी या गोष्ठी का आरंभ, चाहे जो कह लें। कह सकते हैं आरम्भ का पुनरारम्भ भी। एक कवि आया क्षितिज पर। सभी जानते हैं कि प्रो. रमेश दीक्षित बेहतरीन राजनीतिक चिंतक हैं, अच्छे स-धार वक्ता हैं, पर वे सभी शायद यह नहीं जानते थे कि वे अच्छी कविताएं भी लिखते हैं। सबने जाना, ठीक से जाना। उनकी कविताएं हालांकि उत्तरार्ध या ऐसी ही कई पत्रिकाओं में छपती रही हैं, लेकिन अक्सर लंबा अंतराल किसी भी कवि के लिए कष्टकर हो सकता है। वह अंतराल आरंभ ने पाटने की कोशिश की। रविवार को नरेश जी के आवास पर कवियों, आलोचकों, संपादकों का अच्छा जमावड़ा रहा।

: प्रो. रमेश दीक्षित के एकल काव्यपाठ से आरम्भ का पुनरारम्भ : प्रख्यात कवि नरेश सक्सेना का आरम्भ प्रभावशाली रहा। आरम्भ की गोष्ठी या गोष्ठी का आरंभ, चाहे जो कह लें। कह सकते हैं आरम्भ का पुनरारम्भ भी। एक कवि आया क्षितिज पर। सभी जानते हैं कि प्रो. रमेश दीक्षित बेहतरीन राजनीतिक चिंतक हैं, अच्छे स-धार वक्ता हैं, पर वे सभी शायद यह नहीं जानते थे कि वे अच्छी कविताएं भी लिखते हैं। सबने जाना, ठीक से जाना। उनकी कविताएं हालांकि उत्तरार्ध या ऐसी ही कई पत्रिकाओं में छपती रही हैं, लेकिन अक्सर लंबा अंतराल किसी भी कवि के लिए कष्टकर हो सकता है। वह अंतराल आरंभ ने पाटने की कोशिश की। रविवार को नरेश जी के आवास पर कवियों, आलोचकों, संपादकों का अच्छा जमावड़ा रहा।

कई बार मोह बाँधता है, कई बार जगाता है, जगाये रखता है। नरेश जी के मन के भीतर कहीं गहरे कोने पड़े आरंभ के मोह ने उन्हें जगाया। वैसे तो वे जगे ही रहते हैं निरंतर, पर उनके जैसे कवि के लिए उजाले की हर नयी संभावना अलग-अलग समय में अलग-अलग दिशाओं में जागने और आवाज देने का उपक्रम रचती है। अब यह आरंभ एक निरंतरता ग्रहण करेगा, ऐसा मानने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। उन्होंने अपने शुरुआती वक्तव्य में बताया कि तद्भव और लमही लखनऊ से निकलने वाली दो बड़ी पत्रिकाएं हैं। तद्भव ने तो देश की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका होने की सामर्थ्‍य हासिल कर ली है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके आवास के नीचे के तल में, जहाँ यह गोष्ठी आयोजित हुई है, अब बैठने या छोटा-मोटा समारोह करने की बेहतर संभावना बन गयी है। शायद वहां बड़ी खुली जगह में एक रेस्तराँ शुरू हुआ है। यानी कि ज्यादा भाग-दौड़ की जरूरत नहीं होगी।

प्रो. रमेश दीक्षित ने लंबे समयांतराल में अपने विविध अनुभवों से रची गयी एक दर्जन से ज्यादा कविताएं सुनायीं। कहीं आक्रोश, कहीं जड़ता और ठहराव पर हमला, कहीं बुद्धिजीवियों की तंद्रा भंग करने, केवल बड़ी-बड़ी बतकही से बाहर आने की सलाह, कहीं अपने समय का राजनीतिक मूल्यांकन। तद्भव के संपादक और कथाकार अखिलेश ने ठीक कहा कि ये सभी राजनीतिक कविताएं हैं, कई अपने समय केसाथ कदमताल करती हुईं। कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा कि प्रो. रमेश ने इस कार्यक्रम के लिए अपनी एक भी प्रेम कविता नहीं चुनी। किसी ने कहा कि वे तो रमेशजी घर पर सुनाने के लिए सुरक्षित रखे हुए हैं। हास्य दिवस का भी असर गोष्ठी पर रहा। एक टिप्पणी गूंजी, वंदनाजी को तो जरूर सुनाया होगा। वंदनाजी मुस्कराकर रह गयी। वंदना जी स्वयं कवयित्री हैं और प्रो. रमेश की पत्नी हैं।

आलोचक वीरेंद्र यादव, कथाकार शीला रोहेकर, रंगकर्मी राकेश, कवि चंद्रेश्वर, दीपक कबीर, और भी कई लोगों ने प्रो रमेश के इस नये रूप को एक खास घटना के रूप में देखने की कोशिश की। वीरेंद्र यादव को ये कविताएं सार्थक वक्तव्य लगीं लेकिन वे मानते हैं कि रमेशजी का गद्यकार ज्यादा प्रभाव पैदा करता है, उनके भाषणों, उनकी टिप्पणियों की धार सबने देखी है। चंद्रेश्वर को ये कविताएं विवेक और समझ जगाती हुई दिखीं। कथाकार रवींद्र वर्मा का सुझाव था कि जल्द से एक संग्रह आना चाहिए। विजय राय ने इन रचनाओं की ताकत स्वीकार की, क्या कहूं, पाँच रचनाएं लमही के लिए दे दें। प्रो रमेश ने कई बार कहा कि दो ताजा रचनाएं तो अखिलेश के दबाव में पूरी हो गयीं पर अखिलेश जी चुप रहे। भगवान स्वरूप कटियार को इन कविताओं में महाभारत और रामचरित मानस के कुछ पात्रों को लेकर की गयी टिप्पणियों पर ऐतराज था। उन्हें कवि ने अपने मंतव्य से अवगत कराया। अखिलेश ने भी कहा कि कटियार जी ने जो सवाल उठाया वह एकदम गलत नहीं था, पर किसी कवि को इतनी आजादी तो होनी चाहिए कि ऐतिहासिक पात्रों को वह अपने नजरिये से देख सके।

आरम्भ का यह आरम्भ एक और मौका लेकर आया था। प्रख्यात रंगकर्मी सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ के साठ साल पूरे हुए थे। उन्हें बुके दिया गया और आशा जतायी गयी कि वे सठियायेंगे नहीं। इस क्रांतिकारी काव्यपाठ के बाद संध्या वंदन का अवसर सूर्यमोहन जी को दिया गया। अगली अनौपचारिक शाम रस गोष्ठी प्रो. रमेश दीक्षित के आवास पर हुई। सूर्यमोहन जी रस के पूरे बोतल ले आये, मगर निकले आधे। नाटक के भीतर नाटक था यह। हास्य दिवस पर व्यंग्य की स्थिति। उन्हें फिर भागना पड़ा। खैर वे लौटे तो, खूबसूरत और रोचक यादें माहौल को मधुर बनाये हुए थीं। उन्होंने भी अपना हिस्सा लिया, चषक उठाया और जम गये। कुछ देर बाद नरेशजी भी इस नयी महफिल में दाखिल हुए। देर रात तक चलती रही चुहल। गंभीर बातों के लिए ऐसी शामें नहीं होती और यह शाम भी साहित्य और इंटरनेट की दुनिया में चल रहीं मजेदार बातों में गुजर गयी।

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