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समाजवादी पार्टी के पास वापस लौटने की कोई राह नहीं

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनना तय हो गया है और इसी के साथ मायावती का उत्तर प्रदेश में पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना भी चकनाचूर हो गया। चुनावी घोषणापत्र में 12वीं पास को लैपटॉप, बेरोजगारों को भत्ता, किसानों को बिजली और खाद में रियायत के साथ-साथ ऋण माफी के वायदे पूरा करने के लिये मुलायम सिंह के पास पांच साल का लम्बा वक्त है। ऐसे में उन्हें प्राथमिकता के तौर पर पार्टी की गुंडई और आतंक की पुरानी छवि से बाहर निकालकर विकास पुरुष के रूप में अपने को स्थापित करने में भी काफी मशक्कत करनी होगी। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अखिलेश सिंह ने स्वयं को कुशल चुनावी प्रबन्धक के रूप में साबित कर दिया है और डीपी यादव, अमर सिंह सरीखों को पार्टी से बाहर रखकर उन्होंने विपक्षियों को यह दिखा दिया है कि आने वाले समय में समाजवादी पार्टी बदलाव की राह पर बढ़ चुकी है और अब पीछे मुड़ने के लिये कोई रास्ता ही नहीं है। इसके साथ ही आजम खान और शिवपाल सिंह यादव को भी यह सबक मिल गया है कि पार्टी को अपराधियों से दूर रखें अन्यथा पार्टी उन्हें खुद से दूर कर देगी। सच तो यह है कि मायावती के शासन काल में समाजवादियों का जो हश्र किया गया है, अवसरवादी और तानाशाही राजनीति का दूसरा उदाहरण भारतीय समाज में नहीं मिलता।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनना तय हो गया है और इसी के साथ मायावती का उत्तर प्रदेश में पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना भी चकनाचूर हो गया। चुनावी घोषणापत्र में 12वीं पास को लैपटॉप, बेरोजगारों को भत्ता, किसानों को बिजली और खाद में रियायत के साथ-साथ ऋण माफी के वायदे पूरा करने के लिये मुलायम सिंह के पास पांच साल का लम्बा वक्त है। ऐसे में उन्हें प्राथमिकता के तौर पर पार्टी की गुंडई और आतंक की पुरानी छवि से बाहर निकालकर विकास पुरुष के रूप में अपने को स्थापित करने में भी काफी मशक्कत करनी होगी। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अखिलेश सिंह ने स्वयं को कुशल चुनावी प्रबन्धक के रूप में साबित कर दिया है और डीपी यादव, अमर सिंह सरीखों को पार्टी से बाहर रखकर उन्होंने विपक्षियों को यह दिखा दिया है कि आने वाले समय में समाजवादी पार्टी बदलाव की राह पर बढ़ चुकी है और अब पीछे मुड़ने के लिये कोई रास्ता ही नहीं है। इसके साथ ही आजम खान और शिवपाल सिंह यादव को भी यह सबक मिल गया है कि पार्टी को अपराधियों से दूर रखें अन्यथा पार्टी उन्हें खुद से दूर कर देगी। सच तो यह है कि मायावती के शासन काल में समाजवादियों का जो हश्र किया गया है, अवसरवादी और तानाशाही राजनीति का दूसरा उदाहरण भारतीय समाज में नहीं मिलता।

यहां तक कि इटावा, मैनपुरी आदि मुलायम सिंह के गढ़ में यह कहावत मशहूर हो गयी थी –

मायावती के राज में पंडित खाये खीर

साठ कौम चोरी करे, पकड़ा जाये अहीर

मुलायम सिंह भी बदले की भावना से काम करें यह जरूरी नहीं। शायद उन्हें जरूरत ही न पड़े। मायावती ने पिछले पांच साल में जन विरोधी कार्यों से अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार ली है। चुनावों से ठीक पहले एनएचआरएम घोटाले में उनके करीबियों अनंत मिश्र और बाबू सिंह कुशवाहा का नाम सामने आया। जेल में सीएमओ सचान की हत्या के बाद जारी सीबीआई जांच के छीटें मायावती के दामन पर पड़ना तय है। उनके विश्वासपात्र और शराब माफिया पोंटी चड्ढा के ठिकानों पर भी आयकर के छापे मायावती की छवि को धूमिल करने के लिये काफी थे। चुनावों से ऐन पहले मुस्लिम, जाट आरक्षण की मांग, पांच मिनट में प्रदेश को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव पारित करना और अपने 21 मंत्रियों समेत 100 विधायकों के खिलाफ की गयी कार्रवाई खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे जैसी कहावत को चरितार्थ कर गयी। रही सही कसर चुनाव आयोग ने हजारों करोड़ रूपये की लागत से तैयार की गयी उनकी और पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों के ढकने के आदेश से पूरी हो गयी। मायावती जहां खुला हाथी लाख का और बंद हाथी सवा लाख का बता रही थीं, अब निश्चित ही उन्हें पश्चाताप हो रहा होगा कि विकास के नाम पर व आतंक राज की मुक्ति के सवाल पर प्रदेश की जनता से मिले पूर्ण बहुमत का उन्होंने नाजायज इस्तेमाल न किया होता तो उनकी यह दुर्गति न हुई होती। भट्टा पारसौल, टप्पल जैसे स्थानों पर किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा करने की प्रदेश सरकार की नीति पर तो सुप्रीम कोर्ट को भी यह तीखी टिप्पणी करनी पड़ी थी कि सरकार प्रापर्टी डीलर की तरह व्यवहार कर रही है और अपनी जमीन का हक मांगने पर किसानों को लाठी-गोली खानी पड़ती है।

इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने भरसक प्रयास किया लेकिन चुनाव समाप्त होते-होते उनकी और सारी पार्टी की हवा निकल गयी। जिस राहुल के सहारे पार्टी चुनावी वैतरणी पार करने का ख्वाब बुन रही थी, वह पिछले चुनाव में 22 की अपेक्षा सिर्फ पांच-छह सीटों का ही फायदा करा सके। जिस समाजवादी पार्टी के शासनकाल की याद दिलाकर राहुल गांधी प्रदेश के लोगों को यह बरगला रहे थे कि आप विकास चाहते हो या आतंक का राज। वह केन्द्र में कांग्रेस की कारगुजारियों की चर्चा तक नहीं करते थे। यहां तक कि अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के खिलाफ केन्द्र सरकार के रवैये को उन्होंने अपनी मौन स्वीकृति दे दी थी, जिससे उनका दोहरा चरित्र और राजनीति का नौसिखियापन सबके सामने आ गया। वह मायावती के भ्रष्टाचार की पोल तो खोल रहे थे लेकिन टूजी, आदर्श सोसायटी, कामनवेल्थ खेलों में अरबों के घोटाले उनका पीछा नहीं छोड़ पाये। वह पार्टी के खूबसूरत स्टार चेहरे हैं, जो अपने प्रशंसकों की भीड़ तो खींच सकते हैं लेकिन उन्हें वोटों में तब्दील करने के लिये अभी काफी प्रयास करने होंगे। सच तो यही है कि कांग्रेस ही देश और प्रदेश में सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी है और उसकी साम्प्रदायिक और भेदभावपूर्ण नीतियों के चलते ही भाजपा, सपा, बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को अपना दबदबा कायम करने में कामयाबी मिली है। चुनाव से ठीक पहले मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण की घोषणा करना और फिर केन्द्रीय मंत्रियों सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद सरीखों का चुनाव आयोग को ताल ठोककर चुनौती देना, श्रीप्रकाश जायसवाल का कांग्रेस को बहुमत न मिलने पर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे दंभपूर्ण बयान से एक बार फिर जनता के बीच यही संदेश गया कि यह पार्टी भी मौकापरस्त है। कथनी और करनी में फर्क ही पार्टी को जनता से दूर करता जा रहा है, इस वास्तविकता को नकारना पार्टी के लिये आत्मघाती ही सिद्ध होगा।

जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, अब उसे भारतीय झंझट पार्टी या भारतीय झगड़ा पार्टी के नाम से पुकारा जा रहा है। जो हाल पार्टी का केन्द्र में है, उसी तरह के झगड़े प्रदेश में दिखाई दे रहे हैं। चुनावों से पहले पूर्व मुख्यमंत्री और राम मंदिर आंदोलन के अलंबरदार कल्याण सिंह ने यह कहकर भाजपा के दावों की हवा निकाल दी थी कि भाजपा की नैया डुबोने को राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र ही बहुत हैं। उनके दावों को हवा मिली जब उमा भारती को चुनाव में उतारने के अध्यक्ष नितिन गड़करी के फैसले का उक्त दोनों नेताओं ने विरोध किया। नरेन्द्र मोदी को प्रचार में न उतारने के पीछे संजय जोशी के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा तो था ही लेकिन मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की चिंता शीर्ष नेतृत्व को ज्यादा सता रही थी। ऐसे में जब राहुल गांधी ने उमा भारती के बारे में यह कहा कि उन्हें मध्यप्रदेश से भगाया गया है तो पार्टी का कोई नेता उनके बचाव में सामने नहीं आया। इतना ही नहीं टिकट वितरण में विरोध तो अब पार्टी की परिपाटी बन गया है। बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लाकर विनय कटियार जैसों ने स्वयं को दरकिनार करवाने का काम किया, वहीं किरीट सोमैया सरीखा पार्टी का एक धड़ा नाराज होकर अक्रियाशील हो गया। जो पिछले दो वर्षों से मायावती और उनके विश्वासपात्र कुशवाहा की पोल खोल अभियान में लगा हुआ था। राम मंदिर बनवाने और गाय देने के घोषणा पत्र के मुकाबले प्रदेश की जनता ने लैपटॉप, बेरोगारी भत्ता, किसान ऋण माफी जैसे मुद्दों को तरजीह दी और समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत का तोहफा दिया।

लेखक- निखिल अग्रवाल मेरठ में पत्रकारिता से जुड़े हैं

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