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सवाल यह है… सोनिया गांधी को बीमारी क्या है?

हम भारतीय बड़े संवेदनशील होते हैं। किसी ने लाख गुनाह किये हों लेकिन जब उसके खराब स्वास्थ्य या दयनीय आर्थिक स्थिति अथवा किसी पारिवारिक समस्या के बारे में सुनते हैं तो हमारा मन दुखी हो जाता है। क्षमाशील स्वभाव के चलते हम उसके सारे पाप क्षमा कर देते हैं। संभवतः इसका एक कारण हमारे संत-महात्माओं द्वारा दी गयी शिक्षा और पौराणिक ग्रन्थों में क्षमादान को महादान बताना ही हो सकता है। इसके अलावा किसी को कष्ट में देखकर हृदय द्रवित हो जाना मानव स्वभाव तो है ही। हम लोगों की जल्दी भूल जाने की आदत के बारे में तो लिखा जाय तो कई अध्याय तैयार हो सकते हैं, ऐसे में पापियों के गुनाह भूल जाना एक तरह से सुखमय जीवन जीने का आधार ही कहा जा सकता है।

हम भारतीय बड़े संवेदनशील होते हैं। किसी ने लाख गुनाह किये हों लेकिन जब उसके खराब स्वास्थ्य या दयनीय आर्थिक स्थिति अथवा किसी पारिवारिक समस्या के बारे में सुनते हैं तो हमारा मन दुखी हो जाता है। क्षमाशील स्वभाव के चलते हम उसके सारे पाप क्षमा कर देते हैं। संभवतः इसका एक कारण हमारे संत-महात्माओं द्वारा दी गयी शिक्षा और पौराणिक ग्रन्थों में क्षमादान को महादान बताना ही हो सकता है। इसके अलावा किसी को कष्ट में देखकर हृदय द्रवित हो जाना मानव स्वभाव तो है ही। हम लोगों की जल्दी भूल जाने की आदत के बारे में तो लिखा जाय तो कई अध्याय तैयार हो सकते हैं, ऐसे में पापियों के गुनाह भूल जाना एक तरह से सुखमय जीवन जीने का आधार ही कहा जा सकता है।
इसके अलावा हम भारतीयों की एक कमी भी है। जरूरत से ज्यादा चिंता करना। जी हां, हम छोटी-छोटी बातों में चिंता करने लगते हैं। सुबह उठते ही सबसे पहली चिंता होती है कि पानी आ रहा है या नहीं, दूध वाला आया कि नहीं, अखबार वाला पेपर डालकर गया कि नहीं, बच्चों का होमवर्क न हुआ तो चिंता, कपड़ों पर प्रेस न हो तो चिंता, ब्रेकफास्ट में क्या बनना है यही एक बड़ा चिंता का सबब बन जाता है। ये तो शुरुआत है। नौकरी वालों को नौकरी की चिंता है और बिजनेस वालों को कारोबार की, मां-बाप को बच्चों की  पढ़ाई की चिंता है। गरीब-गुरबत में रहने वालों को दो वक्त की रोटी की चिंता है तो पैसे वालों की इस बात की चिंता कि आज आखिर खाने में क्या खाया जाय। मुसाफिरों को बस की चिंता तो ड्राइवर को ट्रैफिक की चिंता, जितने लोग, उतनी चिंता, अपने-अपने सुख, अपनी-अपनी चिंता। हालांकि हम केवल अपनी ही चिंता में घुले जाते हों, ऐसा भी नहीं है। अपनी और अपने परिजनों से फुर्सत मिले तो पड़ोसियों की चिंता। कुछ समाजशास्त्री इसे ईर्ष्या का नाम भी देते हैं- आज शर्मा जी ने नयी गाड़ी ले ली है अब तो मोहल्ले में उनका रौब बढ़ जायेगा, पड़ोसी के घर नया डायनिंग टेबल आया है अपने यहां कब आयेगा, गुप्ता जी की लड़के की शादी में कितना दान-दहेज आया है, हमारे यहां तो दाल-भात में निपटा दिया।

इसके अलावा देश-दुनिया की खबर रखने वाले ‘विचारवान’ लोग यही सोचकर फिक्रमंद रहते हैं कि दुनिया तरक्की कर रही है और हमारे नेता देश को लूटने में लगे हैं। सड़कों की हालत खराब है, सड़क पर गड्ढे हैं या गड्ढे में सड़क कुछ पता ही नहीं चलता। बिजली 12 घंटे आती है, 12 घंटे गायब। दुनिया के इस सबसे ‘युवा’ देश में बेरोजगारी भी सबसे ज्यादा है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करने के भी पैसे लगते हैं। सरकारी नौकरियों में खुलेआम रिश्वत ली और दी जा रही है। बच्चों की पढ़ाई पर कितना ज्यादा पैसा खर्च हो रहा है। मंहगाई ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है और मंत्रियों की आमदनी लाखों से करोड़ों और करोड़ों से अरबों में हो रही है। पहले एक-आध करोड़ के घोटाले होते थे और अब लाखों करोड़ के।

चिंता का सबसे ताजा प्रकरण अपने सेलिब्रेटियों की सेहत को लेकर है। लगता है कि ख्याति प्राप्त ‘सेलिब्रेटी’ लोगों की कुछ ग्रह दशा खराब चल रही है। अखबारों और टीवी चैनलों की कुछ सुर्खियां देखें- अमिताभ बच्चन को फिर पसली में चोट लगी, ब्लाग पर अमिताभ ने लिखा चिंता की कोई बात नहीं… जगजीत सिंह को ब्रेन हेमरेज, डाक्टरों ने किया आपरेशन, अब हालत स्थिर… अमर सिंह गुर्दे की बीमारी के चलते एम्स में भर्ती, डाक्टरों की रिपोर्ट देखने के बाद अदालत ने जमानत रद की। ऐसी खबरें पढ़ते-देखना एक स्वभाविक चिंता और उत्कंठा उत्पन्न कर देता है।

सबसे ज्यादा चिंता यूपीए चेयरपर्सन और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया को लेकर है। बकौल पार्टी प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी, मैडम का आपरेशन तो हो गया है लेकिन बीमारी क्या थी, इसे लेकर अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पाया है। रहस्य का एक आवरण सा चढ़ा रखा है कांग्रेस वालों ने सोनिया की बीमारी का। जिस वक्त गांधीवादी अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की दूसरी पारी का आह्मवान किया था, तब भी सोनिया गांधी इस ‘संदिग्ध’ बीमारी से पीड़ित थीं। वह बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में अविस्मरणीय योगदान के लिये अपनी सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मिले ‘बांग्लादेश फ्रीडम अवार्ड’ लेने के लिये 25 जुलाई को राजधानी ढाका पहुंची थीं और इसके बाद किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत नहीं की। मीडिया के माध्यम से यही खबर देशवासियों को दी गयी कि सोनिया का आपरेशन अमेरिका के अस्पताल में किया गया है और वह स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं। विदेशी मीडिया में भी इस तरह की खबर ‘अपुष्ट’ सूत्रों के हवाले से प्रकाशित की गयी कि सोनिया पिछले आठ माह से कैंसर की बीमारी से पीड़ित हैं। हालांकि असलियत क्या है, ये तो ईश्वर ही जाने या फिर सोनिया।

लेकिन आश्यर्च की बात है कि तिल का ताड़ बनाकर पेश करने वाला देश भर का मीडिया जगत इस सम्बन्ध में पूरी तरह खामोश है। सरकार के अन्दर तक पहुंच रखने वालो मीडिया मुगल भी इस बारे में कोई चुगलखोरी नहीं कर रहे हैं न ही किसी टीवी न्यूज चैनल ने इस मुद्दे पर बहस करायी है कि पिछले एक दशक से देश को दिशा और दशा प्रदान कर रही गांधी परिवार की बहु को आखिर क्या बीमारी है। कैसे आने वाले कल में देश पूरे आत्मविश्वास के साथ यूपीए चेयरपर्सन सोनिया के मार्गदर्शन में तरक्की कर पायेगा जब उनकी वास्तविक जानकारी ही देशवासियों को नहीं बतायी जा रही। अगले चुनावों में किस तरह वो कांग्रेस की नैया को पार लगा पायेंगी, यह सवाल तो खुद पार्टी कार्यकर्ताओं के जेहन में भी तैर रहा है।

सोनिया की मौजूदगी की कमी का अहसास पहली बार तब हुआ जब अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ तो सरकार ने गलतियों का पिटारा ही खोल दिया। पहले तो अन्ना को जेपी पार्क में अनशन करने की अनुमति नहीं दी गयी, फिर 16 की सुबह ही उन्हें दिल्ली पुलिस ने अपार्टमेंट से गिरफ्तार कर लिया और तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया। तीन घंटे बाद ही उन्हें रिहा करने के भी आदेश आ गये वो भी तमाम शर्तों के साथ। लेकिन अन्ना ने दिखाई अपनी असल ताकत। उन्होंने बोला कि मुझे गिरफ्तार क्यों किया, किया तो अब छोड़ क्यों रहे हो। बाहर भेजना है तो मेरी शर्तें मानो वरना अनशन जेल में ही चालू है। फिर क्या था, सारी पब्लिक जेल के बाहर और सरकार बैक फुट पर। पहले जिन मनीष तिवारी को सरकार ने अन्ना पोल खुलवाने के लिये मैदान में उतारा था, उन्हें मुंह छिपाकर भागना पड़ा। दिग्विजय सिंह को अपना बड़बोलापन भारी पड़ा। कपिल सिब्बल और गृहमंत्री चिदम्बरम को समझ ही नहीं आया कि अन्ना से कैसे निपटें। प्रधानमंत्री की अनशन न करने की अपील भी अन्ना ने ठुकरा दी। तब सरकार को सोनिया की छत्रछाया में जूते की नोक पर रहने वाला विपक्ष याद आया। जनलोकपाल के लिये सर्वदलीय बैठक हुई। संसद में चर्चा करायी गयी और जनलोकपाल को लागू करने की कसम खायी गयी तब जाकर अन्ना ने अनशन समाप्त कर सरकार का पीछा छोड़ा। अन्यथा बाबा रामदेव के समय में तो आधी रात को ही आर या पार का फैसला कर दिया गया था चाहे परिणाम जो भी हो…।

अब सोनिया गांधी स्वदेश वापस आ चुकी हैं लेकिन पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं और सक्रिय भी नहीं है। इसके बावजूद टूजी स्पेक्ट्रम मसले पर कैबिनेट के दो वरिष्ठतम मंत्रियों प्रणव मुखर्जी और चिदम्बरम के बीच ‘वित्त मंत्रालय के उस नोट’ को लेकर हुई तनातनी- जिसमें चिदम्बरम को टूजी घोटाले को रोकने में असफलता का जिम्मेदार ठहराया गया है- के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच-बचाव के बावजूद दोनों मंत्री अपनी सफाई देने सोनिया के दरबार में पहुंचे। लगता है कि इन सबके बीच सरकार यह समाधान तो निकाल लेगी कि भ्रष्टाचार, मंहगाई और मंत्रियों की आपसी खींचतान के चक्रव्यूह को किस तरह भेदना है लेकिन इस सवाल का जवाब देना भारी होगा कि आखिर सोनिया गांधी को हुआ क्या है!

लेखक निखिल अग्रवाल मेरठ के निवासी हैं तथा पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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