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सवा सौ साल पहले ही वर्तमान की तस्‍वीर खींच दी थी भारतेंदु ने

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1881 में नाटक लिखा था ‘‘अंधेर नगरी।’’  जो मैंने 100 साल बाद 1981 में प्रथमा (जूनियर) के पाठ्यक्रम में पढ़ा, बड़ा मजा आता था। बार बार पढ़ता था। जैन धर्मशाला लालपुरा में 1991 में महावीर जयन्ती महोत्सव का मुख्य आर्कषण था मेरे द्वारा निर्देशित ‘‘अंधेर नगरी।’’ इसके बाद 1998 में इकदिल कालेज के बच्चों से भी ‘‘अंधेर नगरी’’ का मंचन कराया। यह आत्मश्लाघा मैं क्यों कर रहा हूं? वर्षों से दुनिया भर के स्कूली फंक्शन में यह नाटक नन्हें मुन्ने बच्चे खेलते चले आ रहे हैं। 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1881 में नाटक लिखा था ‘‘अंधेर नगरी।’’  जो मैंने 100 साल बाद 1981 में प्रथमा (जूनियर) के पाठ्यक्रम में पढ़ा, बड़ा मजा आता था। बार बार पढ़ता था। जैन धर्मशाला लालपुरा में 1991 में महावीर जयन्ती महोत्सव का मुख्य आर्कषण था मेरे द्वारा निर्देशित ‘‘अंधेर नगरी।’’ इसके बाद 1998 में इकदिल कालेज के बच्चों से भी ‘‘अंधेर नगरी’’ का मंचन कराया। यह आत्मश्लाघा मैं क्यों कर रहा हूं? वर्षों से दुनिया भर के स्कूली फंक्शन में यह नाटक नन्हें मुन्ने बच्चे खेलते चले आ रहे हैं। 

 

दरअसल इस ‘‘अंधेर नगरी’’ की कथावस्तु से सभी परिचित हैं मगर मात्र हास्यरस प्रधान प्रहसन (कोमेडी ड्रामा) के रूप में ही पढ़ा, खेला और देखा जाता रहा है। इसका कथानक मेरी दृष्टि में काल्पनिक नहीं, भविष्य का शब्द-चित्र था, जो आईटी के क्रांति दौर की 21वीं शताब्दी में साक्षात् दृष्टिगोचर हो रहा है। महर्षि बाल्मीकि ने रामावतार से पहले ही रामायण लिखी थी, जो यथावत् सामने आती गई, वही भारतेन्दु के इस नाटक को एक शताब्दी बाद भारतवर्ष के धरातल पर देशा जा रहा है। आज राम और कृष्ण की दिव्य भूमि भारतवर्ष ‘‘अंधेर नगरी’’ के अलावा कुछ नहीं, स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते उस शिष्य की भांति हम आप सभी माल उड़ाने में लगे हैं, जो गुरु को छोड़कर मौज करने की इच्छा से ‘अंधेर नगरी’ में रुक जाता हैं। जहां सभी कुछ टके सेर मिलता है।

‘टके सेर भाजी, टके सेर खाजा’ से तात्पर्य है। सामाजिक समानता के नाम पर कूटनीतिक चालें, 6 दशक से समानता के नाम पर ‘आरक्षण’ व जातिवादी राजनीति सामाजिक छलावा कर रही है। सब टके सेर शिक्षित हो या निरक्षर, ज्ञानी हो या अज्ञानी, भोगी हो या योगी।

 

भारतेन्दु ने ‘अंधेर नगरी’ के बाजार के दृश्य को भी आज की मनोदशा का पूर्वानुमान लगाया होगा।

 

चूरन अमले जो सब खावें,

दूनी रिश्वत तुरत पचावें।

चूरन सभी महाजन खाते,

जिससे जमा हजम कर जाते।

 

कानून (संवैधानिक) का दृश्य किसी की दीवार गिरने से मरी बकरी इस अपराध की लम्बी सुनवाई के बाद फांसी की सजा मिलती है शहर कोतवाल को। मगर सजा भी कानूनन देहान्तरण हो जाती है। कोतवाल की गर्दन पतली थी, लिहाजा फंदे के नाप की गर्दन वाले व्यक्ति की खोज होती है, वही मजे उड़ाने की नियत से ‘अंधेर नगरी’ में रुक गये शिष्य को लटकाने का उपक्रम होता है। आज विभिन्न प्रकरणों में बहुधा लंबी जांच प्रक्रिया के चलते अपराधी साफ बच जात हैं और लीपा पोती कर दी जाती है। फंदे की नाप के रूप में सजा तो देनी ही है, लिहाजा कु-पात्र (निर्दाष) को फर्जी मामलों में फंसा दिया जाता है।

आप ताजा प्रकरणों को ही गौर से देंखें ‘‘चैपट राजा’’  की न्याय प्रक्रिया के अलावा कुछ नया नहीं दिखाई देंगा। भारतेन्दु ने ‘अंधेर नगरी’ में व्यवस्था परिवर्तन का जो दृश्य दिखाया वही ‘अंधेर नगरी’ को विश्वगुरू और सोने की चिड़िया बना सकता है। फांसी पर जब शिष्य को लटकाया जा रहा था तो उसने गुरू का स्मरण किया उन्होंने जो युक्ति सुझाई वही कारगर हुई यानी आज भी होगी।

 

स्वार्थ और महत्वाकांक्षा से दूर, अनासक्त कर्मयोगी गुरू आयेगा, जिसकी युक्ति से कुशासन रूपी चैपट राजा फांसी पर लटकेगा, व्यवस्था परिवर्तन होगा। आखिर कब होगा ‘अंधेर नगरी’ नाटक के अंतिम अंक का प्रस्तुतीकरण? पि‍छली अर्द्धशताब्दी से व्यवस्था परिवर्तन का झंडावरदार बनकर जो भी आता रहा, देशवासी उसे के हाथों छले जाते रहे। निश्चित ही जब ‘अंधेर नगरी’ नाटक का अधिकांश भाग प्रासंगिकता में है। तो अंतिम अंश की प्रतीक्षा करो। इस दिशा में भारतेन्दु के जीवन वृत्त को जानना जरूरी है।

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 में काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। 1857७ में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु 7 वर्ष की होगी। ये दिन उनकी आँख खुलने के थे। भारतेन्दु का कृतित्व साक्ष्य है कि उनकी आँखें एक बार खुलीं तो बन्द नहीं हुईं। पैंतीस वर्ष की आयु (सन्1885) में उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया। भारतेन्दु के पूर्वज अंग्रेज भक्त थे, उनकी ही कृपा से धनवान हुए। पिता गोपीचन्द्र ‘‘गिरिधर दास’’ की मृत्यु इनकी दस वर्ष की उम्र में हो गई। माता की पाँच वर्ष की आयु में हुई। इस तरह माता-पिता के सुख से भारतेन्दु वंचित हो गए। विमाता ने खूब सताया। बचपन का सुख नहीं मिला। शिक्षा की व्यवस्था प्रथापालन के लिए होती रही। संवेदनशील व्यक्ति के नाते उनमें स्वतन्त्र रूप से देखने-सोचने-समझने की आदत का विकास होने लगा। पढ़ाई की विषय-वस्तु और पद्धति से उनका मन उखड़ता रहा। क्वींस कालेज, बनारस में प्रवेश लिया, तीन-चार वर्षों तक कालेज आते-जाते रहे पर यहाँ से मन बार-बार भागता रहा।

 

स्मरण शक्ति तीव्र थी, ग्रहण क्षमता अद्भुत। इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक – राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द थे, भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते। उन्हीं से अंग्रेजी शिक्षा सीखी। भारतेन्दु ने स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं। अभावग्रस्त साधक की हर श्वांस ‘सत्य’ रूप होती है। पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी, अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने कवि वचन-सुधा नामक पत्र निकाला। वे बीस वर्ष की अवस्था मे आनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए।

 

साहित्य सेवा के साथ-साथ भारतेंदु जी की समाज सेवा भी चलती थी। उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना में अपना योग दिया। दीन-दुखियों, साहित्यिकों तथा मित्रों की सहायता करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। धन के अत्यधिक व्यय से भारतेंदु जी घ्णी बन गए और दुश्चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया। परिणाम स्वरूप 1885 में 35 अल्पायु में ही मृत्यु ने उन्हें ग्रास लिया। अंधेर नगरी ही नहीं, भारतेन्दु की प्रत्येक वाक्यांश अपने आप में वैदिक सूक्तियों से कम नहीं है। भारतेन्दु के नाटक जरूर पढ़ने ही नहीं चाहिए चिंतन भी करना होगा।  वैदिक हिंसा हिंसा न भवति (1873) भारत दुर्दशा (1875) सत्य हरिश्चंद्र (1876) श्री चंद्रावली (1876) नीलदेवी (1881) अँधेर नगरी (1881)

 

देवेश शास्‍त्री का लेख.

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