हिन्द महासागर के लघु द्वीप मॉरीशस को भारत माता की संतान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारतीय संस्कृति की विराट झलक यहां देखने को मिलती है। दोनों देशों में विविध जातियां, विविध भाषाएं, विविध धर्मों के माननेवाले तथा विभिन्न संस्कृतियों के अनुयायी साथ निवास करते हैं। भारत पर हमें इसलिए गर्व है क्योंकि उसने अपने धर्म-दर्शन, कला-संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों से हमें सांस्कृतिक एकता की ओर अग्रसर किया। उक्त बातें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में विदेशी हिंदी शिक्षकों के लिए आयोजित अभिविन्यास कार्यक्रम में सहभागिता करने के लिए मॉरीशस से आयीं गीता नथ्थू ने एक खास मुलाकात में कही।
उन्होंने बताया कि सन 1832 में दास प्रथा की समाप्ति के उपरांत उपनिवेशवासियों के बागानों की आर्थिक स्थिति में संकट आया। मॉरीशस में भारत से मजदूरों को सन 1833-34 में गिरमिटिया के रूप में ले गए। भारत और मॉरीशस के ऐतिहासिक संबंध में भारतीय श्रमिकों और सिपाहियों ने हमारे द्वीप को चीनी प्रधान देश बनाया। बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में भारत के दो महापुरूष महात्मा गांधी और डॉ. मणिलाल मॉरीशस आए। इससे प्रवासी भारतीयों का नवजागरण हुआ। सन 1910 में भारत के डॉ. भारद्वाज के प्रयत्नों से वहां आर्यसमाज की स्थापना हुई, जिससे हिंदी भाषा का प्रचार देशभर में सुचारू रूप से होता रहा। डॉ. शिवसागर रामगुलाम के प्रयासों से सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं में हिंदी की पढ़ाई शुरू हुई। उस वक्त आर्य समाज तथा बैठकों में हिंदी भाषा की शिक्षा दी जाती थी। साथ ही वासुदेव विष्णुदयाल द्वारा हिंदी की पढ़ाई पर जोर देने के साथ-साथ धार्मिक प्रवचन तथा गीता की टीकायें लिखीं। देशभर में गीता कथा और उपनिषद कथा की धूम ने हिंदी को ऊंचाई प्रदान की। रामायण, महाभारत जैसे पवित्र ग्रंथ अप्रवासी भारतीयों के पास पहले से था।
उन्होंने बताया कि आर्यसमाज और मंदिरों में किये गए कार्यक्रमों के फलस्वरूप प्रवासी अपने रीति-रिवाज, भाषा, पहनावे और धार्मिक त्योहारों के प्रति आकर्षित होने लगे। वे संक्रांति, होली, दीवाली को सामूहिक रूप से मनाते थे तथा शिवरात्रि, रामनवमी, जन्माष्टमी, एकादशी, पूर्णमासी के अवसरों पर व्रत रखते थे। सामाजिक व धार्मिक अवसरों पर लोग सामूहिक रूप से जुड़ते और एक साथ बैठक करते इसलिए उसका नाम पड़ा ‘बैठका’। यही बैठका अप्रवासियों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक सूत्र की बुनियाद बना। इन्हीं बैठकों ने मॉरीशस में भारतीय संस्कृति को जीवित रखा। सन 1948 में यहां भारत का दूतालय खोला गया जहां पर भारत की अनेक पत्र-पत्रिकाएं पायी जाती हैं। वर्षों से सैकड़ों मेधावी मॉरीशस छात्रों को छात्रवृतियां प्रदान की जाती हैं जो भारत के विश्वविद्यालयों में अध्ययन करके यहां ऊंचे से ऊंचे पदों पर कार्य कर रहे हैं। आजकल दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से बहुत से विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि सांस्कृतिक प्रसार के लिए समय-समय पर भारत के संगीतकारों, कलाकारों, नाटककारों के आगमन होते रहते हैं। कुछ वर्षों पूर्व इसी लक्ष्य से एक केन्द्र ‘इंदिरा गांधी सेंटर फॉर इंडियन कल्चर’ मॉरीशस में खोला गया। सन 1965 में श्री यशपाल जैन के सहयोग से गांव-गांव में हिंदी पुस्तकालय खोले गए जिसे भारत सरकार की ओर से सहायता मिलती थी। दुर्भाग्यवश ये पुस्तकालय अब नहीं रहे। आजकल विभिन्न राजनीतिज्ञों के अथक प्रयासों से मॉरीशस में तीनों स्तरों पर अर्थात प्राथमिक, माध्यमिक एवं विश्वविद्यालय आदि में हिंदी की पढ़ाई हो रही है। कई लोग महात्मा गांधी संस्थान के हिंदी विभाग से एमए, एमफिल व पीएचडी की पढ़ाई कर रहे हैं। वर्तमान में बीए में 30 छात्र, एमए में 15 और चार-पांच शोधार्थी पीएचडी में शोधरत हैं। दूसरी ओर भोजपुरी ने मॉरीशस के सांस्कृतिक ढांचों में समाहित होकर अपना अस्तित्व कायम कर लिया है और आज एकाध स्कूल में पढ़ाई भी होती है। शब्दकोश भी उपलब्ध हैं। भोजपुरी ने समय के साथ-साथ क्रियोली बोली के शब्दों को आत्मसात किया है। यही कारण है कि इस लेन-देन की प्रक्रिया ने मॉरीशस की भोजपुरी से अलग किया है।
गीता नत्थू ने बताया कि 1975 ई. में महात्मा गांधी संस्थान खुला, जिसमें भारतीय संस्कृति, हिंदी सर्टिफिकेट, एचएससी तथा संस्कृत भाषा की कक्षाएं चलती हैं इसी संस्थान में भारतीय भाषाओं के अध्यापकों का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी समय-समय पर चलता रहता है, जैसे कि डिप्लोमा इन हिंदी विद एजुकेशन, ग्रेजुएट इन एजुकेशन (हिंदी)। इस संस्थान के प्रोडक्शन यूनिट में प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों की पाठ्य-पुस्तकें भी तैयार की जाती हैं। महात्मा गांधी संस्थान का एक प्रकाशन विभाग भी है, जिसके द्वारा समय-समय पर प्रवासी लेखकों के संग्रह प्रकाशित होते हैं। ‘वसंत’ तथा ‘रिमझिम’ जैसी मासिक पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं जिसका लक्ष्य सिर्फ नवोदित हिंदी साहित्यकारों को प्रोत्साहन देना है। प्रवासी मॉरीशस के लोगों में एक विशेषता है कि वे अपने पैतृक देश भारत के शिष्ट साहित्य से प्रेरणा पाते रहे, इनके साहित्यिक ग्रंथों का अध्ययन करते रहे। विविध कथा-स्त्रोतों की विद्यमानता के कारण मॉरीशस का लोक साहित्य समृद्ध हुआ; लोक गाथाएं, लोकगीत, लोक कथाएं व लोक नाट्य साहित्य में संचारित होते रहे। लोक गीत पर्व-त्योहार अथवा विवाह के अवसरों पर मांगलिक रूप से गाये जाते हैं। वहां साहित्य में गद्य तथा पद्य भी विकसित हुए जिसके कारण अनेक हिंदी साहित्यकारों को भारत ने सम्मानित किया है। पंडित वासुदेव विष्णुदयाल ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन में 1969 ई. में ‘साहित्य वाचस्पति’ की सर्वोच्च उपाधि से और प्रह्लाद रामशरण को राजकीय सम्मान से सम्मानित किया। अभिमन्यु अनंत की अधिक कहानियां भारत की पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। अपने उपन्यास ‘लाल पसीना’ के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया। मॉरीशस में कुछ सफल संपादक भी रहे जिनमें पं. आत्माराम जी हैं। मणिलाल डॉक्टर के आग्रह से इन्होंने ‘आर्योदय’, ‘हिंदुस्तानी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया जिसमें आर्य समाज की गतिविधियां प्रकाशित होती हैं।
इसके अलावा एमबीसी रेडियो तथा टीवी द्वारा हिंदी भाषा का प्रचार देशभर में सुचारू रूप से हो रहा है। यह बात उल्लेखनीय है कि भारत के आकाशवाणी से प्रवासी भारतीय हिंदी भाषा सीख पाते थे। आज भी लोग भारतीय चलचित्रों और फिल्मी गीतों के द्वारा हिंदी भाषा सीखते हैं। हिंदी के प्रसार में टीवी धारावाहिक व विज्ञापनों का योगदान भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा हिंदी में कई ऐसे कार्यक्रम हैं जो हिंदी को घर-घर पहुंचाते हैं। मॉरीशस में समय-समय पर भारतीय भाषाओं में गीत (शास्त्रीय, धार्मिक, बॉलीवुड तथा स्व लिखित) प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। आजकल हिंदी स्पीकिंग यूनियन तथा विश्व हिंदी सचिवालय अनेक प्रतियोगिताओं को आयोजित कर हिंदी भाषा-भाषियों को प्रेरित करते हैं जैसे कि निबन्ध लेखन, कविता लेखन, कहानी लेखन, वाद-विवाद स्पर्धा आदि। तुलसी जयंती के अवसर पर हिंदी दिवस मनाया जाता है। स्कूलों के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर अनेक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं जिनमें निबंध प्रतियोगिता, नाट्य प्रतियोगिता, नुक्कड़ प्रतियोगिता, अंताक्षरी कार्यक्रम आयोजित होते हैं। हिंदी दिवस के अवसर पर अनेकों कार्यक्रम हिंदी की गतिकी को तीव्र करते हैं।
गौरतलब है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा विदेशों में हिंदी अध्यापन में आ रही दिक्कतों से रू-ब-रू होने तथा पाठ्यक्रम निर्माण में एक समन्वयक की भूमिका निभा रहा है। पिछले जनवरी माह में विदेशी हिंदी अध्यापकों के लिए आयोजित अभिविन्यास कार्यक्रम में करीब आधे दर्जन से अधिक देशों के अध्यापकों ने शिरकत की थी। इसी कड़ी में दस दिनों के अभिविन्यास कार्यक्रम में मॉरीशस, श्रीलंका, हंगरी, न्यूजीलैण्ड, रूस, बेल्जियम, चीन, जर्मनी, क्रोशिया से दस अध्यापक सहभागिता कर रहे हैं। कुलपति विभूति नारायण राय ने बताया कि हम विदेश में पढ़ाने वाले हिदी अध्यापकों के लिए वर्ष में दो बार अभिविन्यास कार्यक्रम चलाएंगे, जिससे हम यह जान पायेंगे कि उन्हें हिंदी के शिक्षण में क्या-क्या चुनौतियां आ रही हैं।
अमित कुमार विश्वास की रिपोर्ट.


