नई दिल्ली। देशभर के सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के संगठन कम्युनिटी रेडियो एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को खत लिखकर इन स्टेशनों से वसूली जाने वाली सालाना रॉयल्टी में की गई करीब पांच गुणा की बढ़ोतरी को तत्काल वापस लेने की मांग की है। स्पेक्ट्रम फीस में यह वृद्धि संचार मंत्रालय के डब्ल्यूपीसी विंग द्वारा मार्च में जारी एक आदेश के तहत हुई है जो एक अप्रैल से प्रभावी हो गया है। एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव वीरेन्द्र सिंह चौहान ने आज यहां कहा कि अब तक यह फीस उन्नीस हजार सात सौ रुपये वार्षिक थी और नई दर पर संचार मंत्रालय ने पिछले सप्ताह से सामुदायिक रेडियो स्टेशनों से नब्बे हजार सात सौ रुपये वसूलने प्रारंभ किए हैं। महासचिव ने कहा कि गैर-लाभकारी संगठनों व शिक्षण संस्थानों द्वारा संचालित सामुदायिक रेडियो किसी भी मायने में वाणिज्यिक उपक्रम नहीं है और उन पर फीस का यह बोझ कायम रहा तो भारत में फिलहाल चल रहे कई सामुदायिक रेडियो केंद्र स्वत: बंद हो जाएंगे।
मंत्रालय के इस निर्णय को अतार्किक करार देते हुए एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि बढ़ी हुई फीस ही वापस लेने से काम नहीं चलेगा और आवश्यकता इस बात की है कि सामुदायिक रेडियो को रॉयल्टी फीस से पूरी तरह मुक्त रखा जाए। एसोसिएशन के महासचिव चौहान ने बताया कि प्रधानमंत्री को भेजे पत्र की प्रतिलिपियां नेशनल एडवाइजरी कौंसिल की अध्यक्षा सोनिया गांधी को भेज कर उनसे भी इस मामले में सकारात्मक दखल की मांग की गई है। एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि उन्होंने हस्तक्षेप पर तुरंत मामले को नहीं सुलटाया तो देश में कार्यरत स्टेशनों को आंदोलनात्मक रूख अपनाना पड़ेगा और आवश्यकता पड़ी तो अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा। प्रधानमंत्री को प्रेषित पत्र में कहा गया है कि संचार मंत्रालय का कदम सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा देश में सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की संख्या बढ़ाने के लिए बीते कुछ सालों में किए गए प्रयासों पर एक झटके में पानी फेर देगा। पहले से ही आर्थिक किल्लतों से जूझ रहे स्टेशन एक एक करके बंद होने लगेंगे और नए स्टेशनों की स्थापना के लिए कोई भी शिक्षण संस्थान या नागरिक-सामाजिक संगठन आगे नहीं आएगा।
इसी क्रम में एसोसिएशन की ओर से एक पत्र संचार व सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल को भी भेजा गया है जिसमें संगठन के अध्यक्ष प्रो. कदंर्प दास ने संचार मंत्री को स्मरण कराया है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार रेडियो तरंगे जनता की संपत्ति हैं और इनके समाजहित में उपयोग में सरकार को रोड़ा नहीं अटकाना चाहिए। इस बीच एसोसिएशन ने सत्ताधारी व प्रतिपक्षी सांसदों से भी इस मामले को संसद में उठाने के लिए संपर्क किया है।
क्या है सामुदायिक रेडियो : सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट की सीमित शांति पर चलकर पांच से पंद्रह किलोमीटर के कवरेज क्षेत्र तक पंहुचने वाले छोटे रेडियो स्टेशन हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा जिस नीति दस्तावेज के तहत इन्हें संचालित किया जाता है उसमें इनके वाणिज्यिक उपयोग पर रोक है। इन्हें लाभ अर्जित करने के लिए नहीं चलाया जाता। इनसे प्राप्त कम या ज्यादा आय इन्हीं पर व्यय करने का प्रावधान है। इन स्टेशनों को कामर्शियल एफ.एम. की तरह कारोबार करने की छूट कतई नहीं है। इनकी स्थापना का मुख्य मकसद मनोरंजन करना न होकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण पर जनजागृति लाना और लोकसंस्कृति के संवर्धन के लिए कार्य करना है। विज्ञापन तो यह ले सकते हैं मगर बहुत सीमित मात्रा में। मौजूदा नजारा यह है कि गिने-चुने स्टेशनों को छोड़ दिया जाए तो सामुदायिक रेडियो स्टेशन अपना रोजमर्रा का खर्च निकालने में भी असमर्थ हैं। इनकी मांग हमेश से यही रही है कि सरकार इन्हें सालाना शुल्क से मुक्त करे। मगर संचार मंत्रालय ने ठीक उलटा कर डाला है।
९-१० मई को हंगामा होना तय : देश में सामुदायिक रेडियो नीति बने दस बरस हो गए हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस नीति की समीक्षा के लिए दो दिन की नेशनल कंसल्टेशन आगामी ९-१० मई को इंडिया हैबिटेट सेंटर में करने का ऐलान कर रखा है। विभिन्न मंत्रालयों के आला अधिकारियों के अलावा रेडियो स्टेशनों, उनके संगठनों व संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों के चुनिंदा नुमाइंदे इस कवायद के लिए आमंत्रित हैं। संचार मंत्रालय के फीस संबंधी निर्णय से इस कंसल्टेशन में चर्चा का मुख्य बिंदु सामुदायिक रेडियो नीति की समीक्षा के बजाय फीस वृद्धि की वापसी बनना तय है। एसोसिएशन के महासचिव वीरेंद्र सिंह चौहान के अनुसार इस मामले को पुरजोर ढंग से समीक्षा बैठक में उठाया जाएगा। चौहान ने कहा कि संचार मंत्रालय ने फीस की गणना के लिए सभी स्पेक्ट्रम उपभोक्ताओं के लिए एक ही फार्मूला लागू कर दिया है चाहे वे इसका उपयोग कारोबार के लिए कर रहें हों या सामुदायिक रेडियो की तरह समुदायक की सेवा के लिए। सबको एक ही छड़ी से हांकने की यह कवायद सामुदायिक रेडियो संचालकों को किसी सूरत में मंजूर नहीं है।


