कई खट्टी-मीठी यादों के साथ साल 2012 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। बीता वर्ष न तो सबके लिये शुभ रहा और न ही सबसे लिये खराब। किसी ने थोड़ा पाया तो काफी खो दिया, तो कई ने पाया ज्यादा, खोया कम। खासकर राजनैतिक रूप से गुजरा साल काफी महत्वपूर्ण रहा। उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। युवा नेता के हाथ में मुख्यमंत्री की कुर्सी आई तो बसपा सुप्रीमो मायावती की सरकार जाती रही। जीत के लिहाज से समाजवादी पार्टी के लिए 2012 अच्छा रहा तो बसपा को हार का सबक देकर सोचने का मजबूर कर गया। इस सबके बीच प्रदेश की उस जनता को भी नहीं भूला जा सकता है जिसने बिना किसी दुविधा के मतदान किया, जिसका नतीजा यह निकला कि प्रदेश में एक बार फिर एक ही दल (2007 में बसपा की, 2012 में सपा की) की सरकार बनी। वर्ना इससे पहले तो कई वर्षों से खिचड़ी सरकार ही देखने को मिल रही थी। प्रदेश में एक तरफ सत्ता परिवर्तन हुआ तो दूसरी तरफ राजनीति मर्यादाओं के गिरने का स्तर बदस्तूर जारी रहा।
बसपा और समाजवादी पार्टी पूरे साल एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलती रहीं तो राहुल गांधी या कहें पूरे गांधी परिवार के लिए बीता साल कम से कम उत्तर प्रदेश में तो कड़वी यादों वाला ही रहा। यूपी कांग्रेस को पाताल से निकालकर आकाश में बैठाने को आतुर राहुल गांधी हीरो बनने के चक्कर में जीरो पर पहुंच गये। राष्ट्रीय दल कहलाने वाली भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पूरे साल हाशिये पर ही खड़े रहे। कांग्रेस के लिए तो पूरा घटनाक्रम इस लिये और भी दुखदायी रहा क्योंकि उसने राहुल के नेतृत्व में न केवल लंबी चौड़ी टीम चुनाव मैदान में उतारी थी, बल्कि केन्द्र सरकार ने भी यहां सरकारी पैसा पानी की तरह बहाया था। केन्द्र की तरफ से कई घोषणाएं की गईं, लेकिन जनता को उनकी बातों पर विश्वास कम खोट ज्यादा नजर आया। उत्तर प्रदेश में सत्ता बदली तो दिल्ली में बसपा और सपा दोनों को कांग्रेस गठबंधन सरकार अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती रही। माया-मुलायम के खिलाफ चल रही सीबीआई जांच ने कई बार यूपी के उक्त दोनों बड़े नेताओं को परेशान किया। केन्द्र सरकार कई मौकों पर दोनों दलों के प्रमुखों की कमजोरियों का फायदा उठाती दिखी। प्रदेश की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने तो सभी विचारधाराओं को ताक पर रखकर कांग्रेस के साथ सत्ता में भागीदारी के लिए समझौता ही कर डाला।
बहरहाल, भविष्य में जब कभी भी 2012 की बात चलेगी तो यह वर्ष उत्तर प्रदेश में राजनैतिक उठापटक के लिये सबसे अधिक याद किया जायेगा। 2012 के विधानसभा चुनाव के वक्त सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह को यह तो उम्मीद थी कि उनकी सरकार बन सकती है, लेकिन कहा यह भी जा रहा था कि सपा को बहुमत जुटाने के लिए अन्य दलों के सहारे की जरूरत पड़ेगी। इसी लिये विधान सभा चुनाव के बाद समाजवादी नेता सामान्य विचारधारा वाले दलों से बातचीत भी करने लगे थे, लेकिन नतीजे खुले तो सता की चाबी पूरी तरह से सपा के हाथ में आ गई। दरअसल, समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के लिए उनके पुत्र और युवा नेता अखिलेश यादव ट्रम्प कार्ड साबित हुए। चुनाव प्रचार के दौरान बसपाई और अन्य विपक्षी दल प्रचार करने में लगे थे कि प्रदेश में समाजवादी सरकार आई तो गुंडाराज कायम हो जायेगा। सपा के लिए गुंडाराज का जुमला भारी पड़ रहा था। मुलायम लगातार कह रहे थे कि अबकी उनके राज में गुंडागर्दी नहीं चलेगी, लेकिन उनकी बातों पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा था। ऐसे में अलिखेश ने मोर्चा संभाला और विश्वास दिलाया कि अबकी गुंडों की जगह जेल में होगी। अखिलेश युवा थे। पढ़े-लिखे थे। उनकी बातों पर जनता ने विश्वास किया। जनता ने मुलायम नहीं, अखिलेश की बातों पर विश्वास करके सपा के पक्ष में मतदान किया। यही वजह थी नजीते आने के बाद उसके युवराज अखिलेश को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाने के लिए किये जाने की चर्चा शुरू हो गई। यह एक तिलस्म की तरह था। मुलायम सिंह जनता की भावना के कायल हो गये। उन्होंने अखिलेश को गद्दी सौंपकर केन्द्र की राह पकड़ ली ताकि लक्ष्य 2014 पर गंभीरता से काम किया जा सके।
युवा मुख्यमंत्री के रूप में आसीन अखिलेश यादव का इकबाल जनता देखने के लिए आतुर थी। उम्मीद थी कि नौजवान मुख्यमंत्री प्रदेश में विकास की धारा बहाएगा, लेकिन जब मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो उसमें पूर्व समाजवादी सरकार का ही अक्स नजर आया। समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जैसे ही पता चला कि उनकी सरकार बनने वाली है, वह जगह-जगह उदंडता करने लगे। स्थिति अनियंत्रित हो गई। जनता को अपने फैसले पर अफसोस होने लगा। सरकार बनी तो एक मुख्यमंत्री को छोड़कर करीब-करीब सभी वह नेता मंत्रिमंडल में शामिल थे जो मुलायम के मंत्रिमंडल में मुख्य पदों पर आसीन हुआ करते थे। शिवपाल यादव, आजम खॉ, अहमद हसन, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैय्या ऐसे चंद नाम थे। अखिलेश मंत्रिमंडल में कुछ युवा चेहरे भी शामिल हुए थे लेकिन उनकी संख्या उंगली पर गिने जाने लायक थी। सरकार बनते ही कानून और व्यवस्था के नाम पर सरकार की किरकिरी होने लगी। इस बात को अखिलेश ने सदन के अंदर स्वीकारा कि उनकी सरकार इस मुद्दे पर पिछड़ रही है। अखिलेश की अनुभवहीनता उन पर भारी पड़ रही थी। मुलायम सिंह किंग मेकर के बाद पार्टी और सरकार के अभिभावक की भूमिका में आ गये थे। उन्होंने अखिलेश सरकार के खेवनहारों को डांट फटकार लगाकर कुछ करिश्मा करने की नसीहत दी। प्रदेश में एक दर्जन से अधिक हुए सांप्रदायिक दंगों के कारण अखिलेश डगमगाती नजर आयी। एडीजी कानून व्यवस्था बदले गये। फैजाबाद के डीआईजी, एसएसपी, डीएम हटा दिये गये। मगर साल बीतने के बाद भी कानून व्यवस्था की गाड़ी पटरी पर नहीं आई।
समाजवादी पार्टी की सरकार की एक तरफ फजीहत हो रही है तो दूसरी तरफ वह इन सब बातों को अनदेखा कर लोकसभा चुनाव पर नजर लगाये है। अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं। सपाई अपने बुजुर्ग नेता मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान करना चाहते हैं। आसन्न चुनाव के मद्देनजर सपा ने पहले से ही अपने लोकसभा चुनाव से बहुत पहले 80 लोकसभा सीटों में 64 प्रत्याशियों के नामों की घोषणा करते हुए उन्हें चुनाव क्षेत्रों में भेज दिया है। लोकसभा चुनाव में भी सपा मुखिया मुलायम सिंह अपने पुत्र पर भरोसा जताना चाहते हैं। उम्मीद है कि पिता-पुत्र की जोड़ी आम चुनाव में भी कुछ नया करेगी। लोकसभा चुनाव मजबूती के साथ लड़ा जा सके इसके लिए प्रदेश की समाजवादी अपने घोषणा पत्र को तेजी से पूरा करने में लगी है। इस बार उनके पास बेरोजगारी भत्ता वितरण, किसानों की कर्ज माफी, मुफ्त सिंचाई, बिजली, कन्या विद्याधन योजना बांटने जैसी योजनाओं को अमली जामा पहनाने वाला अमोघ शस्त्र मौजूद हैं। मुसलमानों के लिए सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशें केन्द्र लागू कराने जैसे मुद्दे भी उनके हाथ में हैं। उनके पास एक अन्य अस्त्र भी आ गया है, जिसे लेकर कभी भाजपा वार करती थी। वह है ‘प्रमोशन में आरक्षण‘ का विरोध। जिसे लेकर सपा मुखिया लोकसभा चुनाव में भरपूर प्रयोग करेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि सामान्य वर्ग के 18 लाख कर्मचारी भाजपा और कांग्रेस से पूरी तरह नाराज हैं। उनका मानना है कि भाजपा ने उनके साथ विश्वासघात किया है। अब वे उन्हें फूटी आंखों भी नहीं सुहा रहे हैं। इसके लिए कांग्रेस और भाजपा के कार्यालयों पर कर्मचारियों ने धरना प्रदर्शन कर अंडे फेंके और मुर्दाबाद के नारे भी लगाये। इससे मुलायम सिंह बहुत खुश हैं। उन्हें लगता है कि भले ही राज्यसभा में उनकी न चली हो लेकिन प्रोन्नित में आरक्षण का तीर उन्हीं की तरकश में है।
समाजवादी पार्टी अपनी सरकार को पिछली माया सरकार से अलग दिखाना चाहती है, जिसे सपाई तानाशाही सरकार की उपमा देते हैं। जनता के बीच अपनी अलग छवि दिखाने को उतावले अखिलेश यादव ऐसा करने के विशेष रूप से सक्रिय हैं। वह मायावती की तरह तानाशाही रवैया नहीं अपनाते हैं बल्कि मिलजुल कर और साथ लेकर चलने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। यही कारण है समाजवादी सरकार में काम करने का कल्चर बदल गया है। नौकरशाह अब मुख्यमंत्री के सामने जाने में थर्राते नहीं हैं। आम जनता के लिये भी वह सहज उपलब्ध रहते हैं। मायावती थीं तो नेता लेकिन उनका सामाजिक सरोकार सीमित था। मुख्यमंत्री रहते वह अपवाद को छोडकर न तो किसी नेता, नौकरशाह, उद्योगपित या फिर अपनी पार्टी के ही नेताओं-कार्यकताओं के विवाह समारोह जैसे कार्यक्रमों में शामिल हुई, न किसी के बुरे समय पर सहानुभूति दिखाने जाती थीं। माया राज में जनता दरबार बंद हो गया था। उनकी पार्टी के बड़े से बड़े नेता तक को उनसे मिलने के लिए समय लेना पड़ता था। अब ऐसा नहीं होता, अखिलेश कहीं से भी निमंत्रण आता है उसे सहज स्वीकार करते हैं। मौका निकाल कर जाते भी हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी बढ़-चढ़कर भागीदारी देखी जा सकती है। समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तो यह उसका सौभाग्य था, लेकिन पार्टी के भीतर जिस तरह से नेतागण वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं उससे तो यही आभास होता है कि यूपी में एक नहीं, दो नहीं पॉच-पॉच अघोषित मुख्यमंत्री काम कर रहे है। मुख्यमंत्री की कुर्सी समाजवादी राज में हास्य-परिहास का विषय बन गई है। इस बात का अहसास बीते दिनों राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह की बातों से हुआ। वह लखनऊ में आये थे। पत्रकार वार्ता में जब उनसे सवाल पूछा गया तो वह हंसते हुए बोले कि मुझे जो पता था उसके अनुसार यहां चार-पांच मुख्यमंत्री हैं, लेकिन अब पता चला है कि यहां एक मुख्यमंत्री और एक मुख्यमंत्राणी हैं। यह और बात था कि उन्होंने मुख्यमंत्राणी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन समझने वालों को देर नहीं लगी कि उनका इशारा किस तरफ था।
समाजवादी पार्टी के लिए बीता वर्ष खुशियों की सौगात लेकर आया तो बसपा के लिए सदमा साबित हुआ। बसपा के हाथ से सत्ता फिसल गई। बसपा राज में फैले भ्रष्टाचार ने बसपा की चूलें तक हिला दीं। ऐसा ही नजारा कांग्रेस में भी देखने को मिला। कांग्रेस के युवराज और महासचिव राहुल गांधी ने अपने चुनाव अभियान की शुरूआत जमीन अधिग्रहण के लेकर पुलिस तथा किसानों के बीच खूनी झड़प के गवाह बने भट्ठा पारसौल गांवों से की, वहीं वह गांव-गांव घूमे। गांव में जाकर गरीब किसानों की झोपड़ियों में बैठकर खाना खाया, रैन बसेरा किया। चौपाल लगायी। उन्होंने इलाहाबाद के फूलपुर की चुनावी रैली में अच्छी शुरूआत की। वह अल्पसंख्यकों के घरों में जाकर उनकी खैर सल्लाह पूछने भी गये। मुल्ला मौलवियों से मिले। मदरसों में जाकर बच्चों के साथ बैठकर गुफ्तगू की। मगर कोई खास फायदा न मिला। वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश मुस्लिम बहुल इलाकों में भी पहुंचे थे। लोकसभा की बहस में कभी मुंह न बोलने वाले राहुल गांधी ने अपने आप को जनता के सामने पेश करने की पुरजोर कोशिश की। मगर एक परिपक्व राजनीतिक की भूमिका में अपने को जनता के सामने स्थापित नहीं कर पाये, जिसके कारण उन्हें और कांग्रेस दोनों को चुनाव में मात खानी पड़ गयी।
बात भाजपा की भी करनी जरूरी है। भाजपा ने शोर तो खूब मचाया लेकिन वह भी कुछ हासिल नहीं कर पाई। भाजपा ने मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और नेत्री साध्वी उमा भारती को मैदान में उतार कर नया प्रयोग किया था। परंतु पार्टी के भीतर के विरोध ने उनको कभी खुल कर काम करने का मौका नहीं दिया। पार्टी के अन्य नेता भी आपस में लड़ते रहे। भाजपा ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत जोरदार ढंग से की थी, प्रचार के लिए स्टार प्रचारकों का प्रदेश में जमावड़ा हुआ, लेकिन सपा के बेड़े के आगे उसके प्रदेश के तमाम दिग्गज तो हारे ही, साथ ही अटल बिहारी के क्षेत्र लखनऊ में सपा के अदने से उम्मीदवारों ने कई मोर्चों पर पराजित कर आधे दर्जन से अधिक सीटें उनसे छीन लीं। भाजपा का चुनाव नतीजों के समय जब खाता खुला तो सौ सीटों पर आगे निकलती दिखी, लेकिन जैसे जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ी तो वह सिमटकर 47 सीटों पर गयी। उधर, बसपा अध्यक्ष मायावती ने पार्टी के ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्र और मुस्लिम मुखड़े नसीमुद्दीन सिद्दीकी को चुनाव में अहम जिम्मेदारियां देकर सोशल इंजीनियरिंग का दांव एक बार फिर
खेला, लेकिन असल रही। बसपा को मात्र 80 सीटों से सब्र करना पड़ा। 2012 के विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली तो बाकी को जनता ने सबक सिखाया की उन्होंने जनता की नब्ज को सही तरीके से नहीं पकड़ा। अब सपा से मात खाए विभिन्न राजनैतिक दलों की नजर 2014 के लोकसभा चुनाव पर लगी है। इसके लिए दिल्ली से लेकर गॉव-देहातों तक में बिसात बिछाई जा रही है। देखना, यह है कि 2014 में प्रदेश की जनता किसके सिर पर ताज पहनायेगी।
लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.


