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सियासत में कुछ काम ऐसे होते हैं जो सज्जनों के वश के नहीं होते

मैं नेता हूं। बचपन से ही यह गुण मेरे भीतर था। प्राइमरी स्कूल में साथियों के बस्ते से किताबें चुरा लेता था, उनकी दवात से दूधिया या स्याही अपनी दवात में चुपचाप ढरका लेता था। मुंशीजी जब कभी इतिहास या सामाजिक विज्ञान के सवाल पूछने के लिए सभी बच्चों को इकट्ठा करते तो मैं किसी न किसी बहाने से निकल लेता। ज्यादातर उनके लिए लकड़ी तोड़ने के बहाने। मुंशीजी का खाना पकाने की जिम्मेदारी मैंने संभाल रखी थी। उसके लिए सारा इंतजाम मैं ही करता। जब वे ककहरा, गिनती या पहाड़ा या कुछ और पूछने के लिए बच्चों को बुलाते, मैं बगीचे की ओर निकल लेता। मेरी दिलचस्पी पढ़ाई-लिखाई में बहुत कम थी। इतिहास और समाजशास्त्र में तो कतई नहीं। गड़े मुर्दों की दुर्गंध मुझे पसंद नहीं थी। समाज से कोई वास्ता नही था। मुंशीजी बच्चों के लिए बनने वाले मील में मेरी मदद से ही मिलावट कर पाते। उससे उनकी अच्छी-खासी कमाई हो जाती। मिलावटी सामग्री बच्चों को खिला देते और असली बाजार में बेच देते। मैं उनका पटु शिष्य था। इन सारे कामों में मैं गुरुजी की मदद करता। उनका आशीर्वाद मेरे ऊपर हमेशा बना रहता।

मैं नेता हूं। बचपन से ही यह गुण मेरे भीतर था। प्राइमरी स्कूल में साथियों के बस्ते से किताबें चुरा लेता था, उनकी दवात से दूधिया या स्याही अपनी दवात में चुपचाप ढरका लेता था। मुंशीजी जब कभी इतिहास या सामाजिक विज्ञान के सवाल पूछने के लिए सभी बच्चों को इकट्ठा करते तो मैं किसी न किसी बहाने से निकल लेता। ज्यादातर उनके लिए लकड़ी तोड़ने के बहाने। मुंशीजी का खाना पकाने की जिम्मेदारी मैंने संभाल रखी थी। उसके लिए सारा इंतजाम मैं ही करता। जब वे ककहरा, गिनती या पहाड़ा या कुछ और पूछने के लिए बच्चों को बुलाते, मैं बगीचे की ओर निकल लेता। मेरी दिलचस्पी पढ़ाई-लिखाई में बहुत कम थी। इतिहास और समाजशास्त्र में तो कतई नहीं। गड़े मुर्दों की दुर्गंध मुझे पसंद नहीं थी। समाज से कोई वास्ता नही था। मुंशीजी बच्चों के लिए बनने वाले मील में मेरी मदद से ही मिलावट कर पाते। उससे उनकी अच्छी-खासी कमाई हो जाती। मिलावटी सामग्री बच्चों को खिला देते और असली बाजार में बेच देते। मैं उनका पटु शिष्य था। इन सारे कामों में मैं गुरुजी की मदद करता। उनका आशीर्वाद मेरे ऊपर हमेशा बना रहता।

गन शुरू से ही मुझे अच्छी लगती थी। जब भी पिताजी मेले में ले जाते, मैं प्लास्टिक की घड़ी, रंगीन चश्मे और पिपिहरी की जगह गन, पटाखे और वान खरीदता। उसी दौरान पिताजी की जेब से पैसे चुराना भी आ गया। थोड़ा बडा हुआ तो मेरे दोस्तों ने मुझे ताश फेटना और जुआ खेलना भी सिखा दिया। तीन दो पांच और नौ दो ग्यारह में मेरी महारत थी। जुआड़ियों की पूरी मंडली बन गयी थी। सब हार-जीत से बेखबर। नये मुल्लों को फंसाना और उनकी जेब खाली कर लेना हमारे लिए बहुत आयान था। खूबसूरत चीजें मुझे बहुत पसंद हैं। मेरे पड़ोस में लक्षमनवा का घर था। वो मेरा दोस्त था। पता नहीं अब कहाँ होगा। उसकी बीवी बहुत सुंदर थी। मेरा दोस्त के घर आना-जाना था। उसका घर मेरे लिए अपने घर जैसा ही था। उसकी दुकान थी। उसका ज्यादा समय दुकान पर चला जाता। ऐसे में मैं घर के कामों में मदद कर देता। साग-सब्जी लाने से लेकर छोटी-मोटी खरीद तक। बहुत घुल-मिल गया था। एक दिन हिम्मत करके अपनी दीवार से उसके घर में एक सूराख बना डाला। यह न पूछिये कि दोस्त को मैंने कितना दगा दिया, पर दीवार तोड़कर किसी के घर में घुस जाने के इस अनुभव ने मेरी बहुत मदद की।

जवानी के दिनों में मैंने कई घरों में सेंध लगायी। काफी माल जुटाया। मेरा एक गैंग था। मैं उसका लीडर बना। लीडरी का यह मेरा पहला अनुभव था। धीरे-धीरे मैंने अपने गैंग को पेशेवर तरीके से लैस किया। फिर मुझे ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता। मेरे चेले सप्ताह में एक-दो बार निकलते। टारगेट पहले से ही तय होता। माल वाला कोई भी। फिर नियोजित ढंग से हमला किया जाता। चूक बहुत कम होती। मुझे मेरा हिस्सा मिल जाता। वही कमीशन। इस धंधे में कमीशनखोरी का जनक आप मुझे मान सकते हैं। जिस तरह मैं बड़ा हुआ था, वह उम्मीद बंधाने वाली बात थी। घर के लोगों को मुझसे कोई शिकायत नहीं रही। उन्हें तो पैसे से मतलब होता और पैसा मेरे लिए बहुत आसान चीज था। मैं नहीं जानता था कि मैं बड़ा होकर क्या बनूंगा। उसकी चिंता भी नहीं थी क्योंकि मुझे जो बनना था, वह मैं बन चुका था। जैसी मेरी शख्सियत थी, उसे देखते हुए सियासत मेरे लिए बेहतरीन रास्ता बन सकती थी। मैंने हाथ आजमाया। टिकट खरीदा, वोटर खरीदे और काम बन गया।

मुझे बाद में पता चला कि मैं दूसरों को खरीद सकता हूं तो मैं बिक भी सकता हूं। कई बार बिका। अच्छी कीमत मिली। करोड़ों में। एक दल से दूसरे दल में, दूसरे से तीसरे में। अब मैं इतना अनुभवी हो चुका हूं कि अपना दल बना सकता हूं। जब सारे दलों में भटकते-भटकते चक्र पूरा हो गया तो और रास्ता क्या है। बचपन में मेरे गाँव में लोग मुझे नेतवा कहा करते थे। आप चाहो तो मुझे नेताजी कह सकते हो। भगवान पर मुझे पूरा यकीन है। वह जो कुछ करता है, ठीक करता है। मैंने जो कुछ भी किया, उसी की प्रेरणा से। कोई पाप करता थोड़े ही है, पाप उससे भगवान कराता है। सूत्र उसी के हाथ में है, हम मनुष्य तो निरा कठपुतलियाँ है, निमित्त मात्र हैं। मैं गोस्वामी तुलसीदास का भक्त हूं। बंदऊं संत असज्जन चरणा। जो सज्जन हैं, वे भी आदरणीय हैं, जो दुर्जन हैं, वे भी सम्माननीय हैं।

सियासत में कुछ काम ऐसे होते हैं जो सज्जनों के वश के नहीं होते। जहाँ काम आवे सुई, का करि सके कटार। इसलिए दुष्ट जनों का भी मैं नमन करता हूं। मैं बली हूं तो भगवान की कृपा से, मुझसे लोग भयभीत रहते हैं तो उसी की मर्जी से, मेरे विरोधी नहीं हैं तो उसी की इनायत से। इतना कुछ होते हुए भी मैं निरभिमान होकर रोज पूजा-पाठ करता हूं। भगवान के चरण में सिर नवाता हूं। कहीं तो झुकता पड़ेगा। बजरंगबली की कृपा है मेरे ऊपर। दिन में एक बार हनुमान चालीसा का पाठ भी कर लेता हूं। बहुत बात हो गयी, चलें कुछ काम कर लें। बोलो बजरंगबली की जय।

वरिष्‍ठ पत्रकार डा. सुभाष राय का यह लेख जनसंदेश टाइम्‍स में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

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