निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा और विवादों का सिलसिला अनवरत जारी है। भक्त बाबा की कृपा पाने के लिए ब़ढते चले जा रहे हैं और आलोचक इसे हर कीमत पर ढकोसला सिद्व करने पर आमादा हैं। भक्तों को विश्वास है कि बाबा उन्हें गोलगप्पे खाने को कहें या हरी चटनी के साथ समोसे, वे इसे ईश्वरीय आदेश मानकर ईशकृपा पाने के लिए सब करने को तैयार हैं। किन्तु वे जो बाबा के विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते उन्हें ये सब बेमानी नजर आता है। उनके लिए बाबा आम जनता को बेवकूफ बनाकर मात्र पैसा बटोर रहे हैं। उनके लिए यह सब महज अंधविश्वास और छलावे के कुछ नहीं है। इस विवाद की जड़ में बाबा के बैंक एकाउंट खंगाले जा रहे हैं। उनका बीता कल तलाश किया जा रहा है।
बाबा और उन पर बरसने वाले विरोधियों के तर्कों पर नजर डालें तो समूचे प्रकरण में बाजारवाद की बू आती है। एक तरफ बाबा हैं जो दो हजार रुपए फीस लेते हैं और कृपा आने की एक आसान तरकीब बताते हैं। दूसरी ओर बाबा के विरोध करने वाले हैं जिन्हें केवल बाबा के भक्तों की दिनोंदिन बढ़ती संख्या और बाबा के बैंक खातों के हिसाब देखकर हैरत हो रही है। वे इसे लूट का पैसा बता रहे हैं। उनका मानना है कि जब बाबा की कृपा कुछ लोगों विशेषकर मीडिया के चंद चैनलों पर बनी हुई है तो वे क्यों न इसके हिस्सेदार बनें। क्योंकि लगभग पिछले तीन महीनों के ‘बाबा और विवादों’ के इस घटनाक्रम में सिर्फ चंद मीडिया वाले और चंद अन्य लोग ही बाबा के साथ विवाद को खड़ा किए हुए हैं। भारतीय जनमानस ने इस विवाद में अभी तक अपनी कोई विशेष प्रतिक्रियाएं नहीं दी हैं। वे समाचारपत्रों और न्यूज चैनलों पर छाए इस विवाद से केवल अपना मनोरंजन कर रहे हैं।
अहम बात यह भी है कि वह मीडिया जो इसे दिखा रहा है और गलत भी बता रहा है तो उसकी पहली जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसे विवादास्पद मसलों से अपने को दूर रखे और निर्मल बाबा के कार्यक्रमों को तुरंत प्रभाव से दिखाना बंद करे। और निर्मल बाबा ही क्यों वरन टीवी चैनलों पर हर दिन दिखाए जा रहे सैकड़ों बाबाओं के कार्यक्रमों की जिनमें तमाम तरह के टोने-टोटके, तंत्र-मंत्र और अन्य तरह के उपाय बताए जाते रहते हैं, कि अपने स्वयं के स्तर पर समीक्षा कर उन्हें प्रसारित करना बंद करे। भारतीय समाज ये भलीभांति जानता है कि इससे पहले भी बहुत सारे बाबा आए हैं, जिन्होंने समाज के समक्षं अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और आज वे अरबपति बने बैठे हैं। आज भ्रष्टाचार की आवाज बुलंद करने वाले बाबा रामदेव हजारों की मोटी फीस लेकर योग सिखाते सिखाते दवाईयों का कारोबार करने लग गए। इसी जनता के पैसे से आलीशान पतंजलि योगपीठ बनाकर शान से नेतागिरी करने में जुट गए। कोबरापोस्ट के स्टिंग आपरेशन में फंसे छह ख्यातिनाम बाबा जो करोडों को राशि को ब्लैक से व्हाइट करने के धंधे में लिप्त थे। इसके अलावा देश के हर हिस्से में तमाम धर्मों के धर्मगुरुओं के पास अकूत मात्रा में संपत्ति पड़ी हुई है।
गीता के एक अघ्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘इस संसार के सारे मार्ग मुझ से से निकलते हैं और मुझ में आकर समाहित हो जाते हैं।’ अगर ऐसा है तो निर्मल बाबा के बताए रास्ते में क्या दिक्कतें हैं जबकि उनके बताए रास्ते का अनुसरण करने वाले कोई सौ, दो सौ या हजार नहीं वरन लाखों में हैं। भारतीय सामाजिक संदर्भ में देखें तो यह कोई नई बात नहीं है। यहां हर कालखंड में इसी प्रकार के बाबा, संन्यासी, संत या महामानव समाज के समक्ष आते रहे हैं। हर एक ने अपने विचारों के अनुरूप दुखीजन को सांत्वना दी और उन्हें परेशानियों से निकलने के विकल्प बताए। समय की ज्यादा गहराई में न जाकर सिर्फ मध्य से लेकर आधुनिक भारत के इतिहास में देखें तो ब्राहमणवादी कर्मकांडों से त्रस्त लोगों को निजात दिलाने के लिए चैतन्य महाप्रभु, सूरदास, मीरा जैसी महान शख्सियतों ने मात्र नाचने और गाने के माध्यम से भगवद भक्ति का मार्ग निकाला था और तत्कालीन समाज के परंपरावादी धर्मगुरुओं ने इसके खिलापफ काफी जहर उगला था। शिर्डी के साईं बाबा के समय उनके विरोध करने वालों ने काफी कोशिशें की थी।
टीवी चैनलों पर आए दिन दिखाए जा रहे आग खाने वाले, पिटाई करने वाले, भभूत से समस्त रोगों का निदान करने वाले, चिमटा मारने वाले, लात मारने वाले, पीठ पर बैठने वाले जैसे बाबाओं की भीड़ में निर्मल बाबा के सुझाए एक आसान उपाय से आमजन को अगर कुछ राहत महसूस होती है तो निश्चित रूप से यह ईश्वर की प्राप्ति करने जैसा है। भले ही दूसरे लोग इसे अनास्था और अंध्विश्वास कहते हों। आस्थाओं और विश्वास के भरोसे चलने वाले समाज में निर्मल बाबा भी अपनी एक अलग धारा प्रवाहमान किए हुए हैं। अपने फार्मूले से वे समाज के उस वर्ग को राहत देने का प्रयास कर रहे हैं जो न जाने कब से और न जाने कहां कहां अपनी मुश्किलों का रोना रो चुके हैं। ऐसे में बाबा के बताए अनुसार चलने से शायद उन्हें कुछ समाधन मिलता हो तो कोई एक बार, दो बार या ज्यादा से ज्यादा चार बार बाबा के पास जाएगा, बार-बार नहीं।
लेखक संतोष मंगल एक कम्प्यूटर इंस्टीट्यूट के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डाइरेक्टर हैं.


