मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। मीडिया, सुनकर ही हमे ऐसा लगता है “एक जिम्मेदारी”। पर क्या हमारा मीडिया उतना ही जिम्मेदार है? सच्चाई को सामने लाने में, सच को दिखाने में, जितना की हम सुनने और देखने को उत्साहित रहते है? क्या मीडिया समाज के प्रति पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है? कुछ चैनल है जो इस जमीनी जिम्मेदारी को 1 आध घंटें निभा रहे है। बाकी टीआरपी की जो मांग है उसी के तहत खबरों को परोसा जाता है। अब टीआरपी तो केवल उत्तेजना पैदा करने वाली खबरे ही दिला सकती है। जिससे आम जनता को केवल हत्या, समाजिक दुष्कर्म या किसी बड़े सेलिब्रेटी की ही खबरे मिलेगी और जो देश की मुख्य खबरे है, वो टीआरपी नहीं दिला पाने के कारण पीछे रह जाती है और जनता खबरों के नाम पर केवल मनोरंजन ही पाती है। इसमें नीरी मीडिया की ही गलती नहीं है। दर्शकों का भी बड़ा हाथ है। दर्शक जो देखेंगें मीडिया वहीं दिखाने की कोशिश करता है अपनी टीआरपी के लिए। आजकल मीडिया की कभी कोशिश ही नहीं होती की वो सच्ची और जमीन से जुङी जानकारी दे, वो तो केवल समाचार को सनसनीखेज बनाना चाहता है और सियाशी गलियों में ही मशगूल रहता है। लेकिन चिंता इस बात कि है कही लोग अब समाचारों में जानकारी की जगह सिर्फ मनोरंजन ही ना खोजे और उन्हें सिर्फ मनोरंजन ही मिले, खबर नहीं।
इन 1 आध घंटों में उन पत्रकारों का भी हाथ है जो जमीन से जुङी पत्रकारिता करते है। इन पत्रकारों में इन दो पत्रकारों का उदहारण काफी है। ibn7 पर ऋचा अनिरुद्ध जिंदगी लाइव कार्यक्रम में उन लोगों को लाती है जो जमीन से जुङे हुए है। इस कार्यक्रम में ऋचा अनिरुद्ध ने अपनी संवेदना को मरने नहीं दिया है। आम आदमी के साथ हंसी के अवसर पर खुश हुई है तो दुख में अपने आंसूंओं को भी नही रोक पाती। 27 फरवरी 2012 को गुजरात दंगों की बरसी पर प्रोग्राम ने एक बार फिर रोंगटे खड़े कर दिए। NDTV India के रवीश कुमार ने भी टीवी पर काफी जमीन को दिखाया है। रवीश ने एक रिक्शा वाले से लेकर जीबी रोङ के उन लोगों का भी जिक्र किया है जिसे समाज हिकारत भरी नजरों से देखता है। रवीश अब भी प्राईम टाइम में इन्ही मुद्दों पर बात करते है।
हर कोई अपने आस-पास की खबरें जानने और समझने के लिए ललायित है। लेकिन जिस गति से न्यूज चैनलों की संख्या देश में बढ़ी है उससे दोगुनी गति से न्यूज सेंस की कमी आई है। चौबीस घंटे न्यूज और हर दस मिनट में ब्रेकिंग न्यूज देना न्यूज चैनलों की व्यवसायिक मजबूरी है, ऐसे में दर्शकों का बांधे रखने और टीआरपी के चक्कर में खबर की गुणवत्ता की बजाए न्यूज की संख्या, मिर्च-मसाले और चटपटेपन पर अधिक ध्यान दिया जाता है। टीआरपी के चक्कर में रिपोर्टर सुनी-सुनाई अधकचरी और अधपकी कहानी चीख-चीखकर दर्शकों को बताते हैं।
हमारे देश में प्रेस अथवा मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ स्वीकार किया जाता है। जाहिर है इतने बड़े अलंकरण के बाद मीडिया की जिम्मेदारी उतनी ही बढ़ जाती है जितनी कि लोकतंत्र के शेष तीन स्तंभों की है। एक मीडियाकर्मी के नाते हमें सर्वप्रथम तो यही देखने व चिन्तन करने की जरूरत है कि हम अपनी जिम्मेदारियों और कत्तव्यों का निर्वहन सही तरीके से कर पा रहे हैं या नहीं। हमें जरुरत है जमीनी हकीकत बयां करने की। आम आदमी को इस खबर की कोई जरुरत नही कि पीएम ने क्या ट्वीट किया है बल्कि जरुरत है उनके हक की लड़ाई में साथ देने की। जब उनको फेसबुक और ट्वीटर का ज्ञान होगा तब न्यूज़ चैनलों की जरुरत नही रहेगी। तब ये खुद जान लेंगे पीएम ने क्या ट्वीट किया और सोनिया गाँधी ने क्या स्टेट्स डाला।
लेखक प्रमोद रिसालिया पत्रकार हैं.


