मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक गुरु मधु लिमये आजीवन समाजवादी रहे लेकिन 1976 में अपने निधन से कुछ समय पूर्व लिखे एक लेख में उन्होंने देश की एकता के लिए कांग्रेस को जरुरी बताया था। ताउम्र कांग्रेस के नीतियॉ का विरोध करने वाले मधु लिमये का अंतिम लेख कांग्रेस के लिए ब्रह्मास्त्र बन गया और कांग्रेस ने भी इस लेख को प्रमाणिकता के रुप में खूब इस्तेमाल किया। लेख में लिमये का तर्क था कि सिर्फ कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसके पास अखिल भारतीय संगठन का ढाँचा मौजूद है। शायद मधु लिमये इस बात को भांप गए थे कि क्षेत्रीय पार्टी भले ही अपने क्षेत्र के राजनैतिक उम्मीदों को पूरा करने में सफल हों लेकिन उनका नज़रिया राष्ट्रीय राजनीति के लिए ठीक नहीं, और काफी हद तक क्षेत्रीय पार्टी में भी वंशवाद और निरंकुशता का गुण मौजूद है। उनकी यह शंका सही भी थी क्योंकि आज के मौजूदा हालात में क्षेत्रीय पार्टी का रवैया कोई तानाशाह से कम नहीं दिखता ये और बात थी के जब मधु लिमये ने लेख लिखा था उस वक्त एक राष्ट्रीय पार्टी थी आज कई हैं।
क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय राजनीति के प्रति कैसा नज़रिया रखते हैं इस बात को समझने के लिए कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के सुप्रीमो के नज़रिया को जरा टटोल कर देखिए। तृणमूल कांग्रेस जो गठबंधन की केंद्र सरकार में शामिल हो कर राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा तो बनी है लेकिन क्षेत्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पार्टी सुप्रीमो का नज़रिया / रवैया किसी से छुपा नहीं। उनकी राष्ट्रीय राजनीति तब तक बरकरार रहती है जब तक उनकी क्षेत्रीय राजनैतिक मकसद को पूरा करने में अवरोध न हो। इसका ताज़ा मिसाल हैं दिनेश त्रिवेदी जिनकी सोच मैनेजमेंट के जानकार होने के कारण व्यापक थी, उनकी योग्यता पार्टी सुप्रीमो की नज़र में बेकार हो गई और 12वीं पास मुकुल राय योग्य बन गए। कारण त्रिवेदी ने राष्ट्र हित में सोचा तो क्षेत्रीय सुप्रीमो को भला यह कैसे रास आता।
2009 में कांग्रेस की अगुआई में जब दुबारा संप्रग सरकार बनी थी तब मनमोहन सिंह ए राजा को संचार विभाग नहीं देना चाहते थे और शायद राष्ट्रीय राजनीति के लिए ठीक भी था लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कषगम के सुप्रीमों एम करुणानिधि के आगे मनमोहन सिंह को झुकना पड़ा परिणाम स्वरुप 1 लाख 76 हजार करोड़ का महाघोटाला का दाग़ कांग्रेस के दामन पर लगा जबकि यह क्षेत्रीय पार्टी के नेता की करतूत थी। जब भी क्षेत्रीय पार्टी का सहारा लेकर राष्ट्रीय पार्टी कोई गठबंधन कर सरकार बनाती है तब क्षेत्रीय पार्टी के तानाशाही नज़रिया के सामने राष्ट्रीय सोच को नज़र अंदाज करना पड़ा है जो देश के हित के लिए ठीक नहीं था। कुछ ऐसा ही समय आया था एनडीए गठबंधन से बनी केंद्र सरकार के सामने। जब शिवसेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे के अहं के सामने सरकार को झुकना पड़ा था। देश के बिजली सुधार कार्यक्रमों को प्रोफेशनल रुप देने में लगे उर्जा मंत्री सुरेश प्रभु का सुधार सुप्रीमो को पसंद नहीं आया और तब वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता और ताकतवर प्रधानमंत्री को शिवसेना सुप्रीमो के सामने झुकना पड़ा और सुरेश प्रभु के बेहतरीन कार्य को नज़रअंदाज़ कर हटा दिया गया।
इन सुप्रीमों का मिजाज़ भी मौसम की तरह बदलता है जब ये ताकतवर होते हैं तब ये तानाशाह बन जाते हैं और जब ये कमजोर होते हैं तब…। आज के मौजूदा हालात में भले ही देश के दोनों राष्ट्रीय पार्टी से आमजनता का मोह भंग होता प्रतीत हो रहा हो लेकिन क्षेत्रीय पार्टियॉ की तानाशाही किसी से छुपी नहीं। जब कई सुप्रीमो एक साथ होकर सरकार चलाएँगे उस वक्त्त आम जनता का कितना विकास होगा यह कह पाना कठिन है, लेकिन इतना तो तय है देश का विकास गठबंधन के सरकार और सुप्रीमो के शासन से तो होने से रहा। क्योंकि गठबंधन कि सरकार में थोड़े से योगदान के बदले क्षेत्रीय पार्टी के सुप्रीमो विकास के कार्य को रोक सकते हैं, तो जब इन सुप्रीमों की सरकार होगी तब इनको विकास के नाम पर उल्टी गंगा बहाने से भला कौन रोक सकता है।
लेखक अब्दुल रशीद पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


