होली आयी कि नहीं.. बेसिर पैर की बातें शुरू हो गईं. होली ऐसे मनाइए. होली वैसे मनाइए, पानी की कमी है. पानी बचाइए. एक दिन पानी की बचत से पूरे साल भर के लिए पानी का जैसे कि इंतजाम हो जा रहा हो. जब से जन्म लिया.. तमाम नौटंकियां देखी. ऐसे-ऐसे ताने-नारे और कमेंट्स सुने कि दिल भी रोता रहता है. कहता है- अगले जन्म मोहे प्रभात न कीजो.
चाहे सांप या नेवला ही क्यों न बना दें. कम से कम छोटे से जीवन काल में इतने चोंचलो से तो पाला नहीं पड़ेगा. याद आता रहता है कि कैसे बचपन से जवानी और अब 35-36 साल की उमर तक में रिश्तों की पकड़ कमजोर होती चली गई. कैसे मुहल्लों में होली में निकलनेवाले हुड़दंगियों की संख्या हर साल कम होती चली गई. अब तो ऐसा लगता है कि होली खेलने निकलने पर कहीं कोई सिरफिरा न करार दे. न तो वो अपनापा रहा और न ही रिश्तों की वो बानगी. सूखी होली और पानी बचाने के नाम पर की जा रही तमाम अपीलें मेरे मन पर बारंबार चोट करती रहती हैं. वैसे देखा जाए, तो नौटंकी इस देश की नस-नस में भरी पड़ी है. अगर राजनीति करनी है, तो भगवान के भक्त होने की नौटंकी करो. अगर बिजनेस करना है, तो सोशल रिस्पांसबिल होने का एक मुखौटा पहन लो. सोशल वर्क के नाम पर एनजीओ खोल फंड बनाओ.
दोहरा चेहरा लिये हर कोई, हर बाशिंदा अपनी जिंदगी जीता चलता है. वैसा ही सूखी होली को लेकर मचे चिल्लपों को लेकर बात है. होली के दस दिन पहले से अपील ने सारा उत्साह धो डाला. सारे जोश ठंडे कर डाले. दुकानदार से रंगों की खरीद कमतर हो चली है. लोगों ने भी घर के दरवाजे की छिटकनियों को मजबूत कर दिया है कि कोई लोफड़ होली के दिन आकर रंग न डाल दे. हां, शाम में अबीर-गुलाल खेलने के नाम पर जरूर रस्म अदायगी की तैयारी है. हम तो सोचते हैं कि न तो ये होली खेली और न दिवाली मनाओ. न रस्म रहेंगे और न टेंशन होगी. इन तमाम मीडिया हाउसों या अपील करने वाले महानुभावों को सूखते जा रहे तालाब या नहर नहीं दिखते. पुराने तालाबों को जिंदा करने की कवायदें नहीं दिखतीं. न ही रोज खोदे जा रहे हजारों बोरिंग दिखते हैं.
सिर्फ स्क्रीन या पेज पर रंगीन अंदाज में अपील करते नजर आ जाते हैं, क्योंकि इससे उनकी मार्केट रेट हाई हो जाएगी. लोग टेंशन में रहेंगे. पानी नहीं रहेगा, तो कैसे जीएंगे. डर को भुनाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं. मैं तो कहूंगा कि खूब होली खेलो. जमकर होली खेलो. रिश्तों की बानगी को इस
कदर चमकीला बनाओ कि हर कोई होली खेले. फिल्मों में दिखाई देनेवाली मस्ती सचमुच में सड़कों पर उतरे.
प्रभात गोपाल झा


