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स्मार्ट रिपोर्टर : टेलीविजन रिपोर्टिंग पर एक सार्थक पहल

: पुस्‍तक समीक्षा : कभी-कभार ऐसा लगता है कि हमें किसी खास लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक सधे हुए माध्यम का इंतज़ार रहता है। वाणी प्रकाशन से आई शैलेश और ब्रजमोहन की किताब स्मार्ट रिपोर्टर ऐसे ही किसी बहु प्रतीक्षित लक्ष्य को पाने जैसा सुकून है। 176 पृष्ठों वाली हार्ड बाउंड में कसी 17 अध्यायों की यह किताब लेखकद्वय द्वारा बहुत ही लगन और परिश्रम से तैयार की गई एक शानदार कृति है। हिन्दी में आमतौर पर ऐसी किताबों का घनघोर अभाव है। तकरीबन 50 करोड़ हिन्दी भाषी प्रदेश में न्यूज़ और मनोरंजन समेत कई विविध आयामों को समेटे लगभग 300 सैटेलाइट टेलीविज़न चैनल सक्रिय हैं, जिनमें सिर्फ हिन्दी न्यूज़ चैनलों की संख्या 100 से ज्यादा हैं। इनमें वो तमाम क्षेत्रीय चैनल भी शामिल हैं जो प्रदेश विशेष को अपना फुट प्रिंट (देखा जाने वाला क्षेत्र) मानते हुए दर्शकों तक अपनी पहुँच बनाते हैं।

: पुस्‍तक समीक्षा : कभी-कभार ऐसा लगता है कि हमें किसी खास लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक सधे हुए माध्यम का इंतज़ार रहता है। वाणी प्रकाशन से आई शैलेश और ब्रजमोहन की किताब स्मार्ट रिपोर्टर ऐसे ही किसी बहु प्रतीक्षित लक्ष्य को पाने जैसा सुकून है। 176 पृष्ठों वाली हार्ड बाउंड में कसी 17 अध्यायों की यह किताब लेखकद्वय द्वारा बहुत ही लगन और परिश्रम से तैयार की गई एक शानदार कृति है। हिन्दी में आमतौर पर ऐसी किताबों का घनघोर अभाव है। तकरीबन 50 करोड़ हिन्दी भाषी प्रदेश में न्यूज़ और मनोरंजन समेत कई विविध आयामों को समेटे लगभग 300 सैटेलाइट टेलीविज़न चैनल सक्रिय हैं, जिनमें सिर्फ हिन्दी न्यूज़ चैनलों की संख्या 100 से ज्यादा हैं। इनमें वो तमाम क्षेत्रीय चैनल भी शामिल हैं जो प्रदेश विशेष को अपना फुट प्रिंट (देखा जाने वाला क्षेत्र) मानते हुए दर्शकों तक अपनी पहुँच बनाते हैं।

इससे इतर, सिर्फ न्यूज़ चैनलों में काम करने वाले रिपोर्टरों-पत्रकारों, प्रोड्यूसर और न्यूज़ मैनेजमेंट से जुड़े लोगों की फेहरिस्त पर निगाह डालें तो ये संख्या सिर्फ दिल्ली में 5,000 से ऊपर होगी और समूचे उत्तर भारतीय हिन्दी प्रदेश में, अहमदाबाद, जयपुर और भोपाल से लेकर पटना, लखनऊ और रांची तक ये आंकड़ा 10,000 के पार चला जाएगा। लेकिन जिस उच्श्रृंखल तौर-तरीके से हिन्दी न्यूज़ बाज़ार का कारोबार चल रहा है उसमें इस किताब की अहमियत कंटेंट को संभालने, सजाने और संवारने के लिहाज़ से बहुत ज्यादा है।

स्मार्ट रिपोर्टर का शिल्प और संयोजन शानदार है। जाहिर बात है, शैलेश जैसे दक्ष और अनुभवी पत्रकार के सैद्धांतिक और व्यावहारिक अनुभवों की झलक यहां साफ दिखती है। वे हिन्दी टेलीविजन पत्रकारिता जगत में उन चुनिंदा लोगों में हैं जिन्होंने जयप्रकाश आंदोलन में हिस्सा लिया, उस ज़माने में पत्रकारिता की पढ़ाई की, लंबे समय तक प्रिंट पत्रकारिता के हिस्सा रहे और फिर ‘आजतक’ के शुरूआती दौर (एस.पी.-सुरेन्द्र प्रताप सिंह) में बुलेटिन के एकलौते प्रोड्यूसर होने का श्रेय उन्हें जाता है। इसलिए उन्होंने बहुत ही शिद्दत के साथ अपनी इस किताब के साथ न्याय करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। हम जैसे टेलीविज़न पत्रकारों को टीवी न्यूज़ की परिभाषा से उन्होंने अवगत कराया और एस.पी. के नेतृत्व में नक़वीजी (क़मर वहीद) और शैलेश ने भाषा को जिस तरह तराश कर अमलीजामा पहनाया; आज देश के बड़े और प्रतिष्ठित हिन्दी टेलीविजन न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स उसी को अपना मापदंड मानते हैं। मुझे बखूबी याद है, उन्होंने 1996-97 में कई बार चले टेªनिंग सेशन और डेस्क पर स्क्रिप्ट से जूझते हुए बताया कि आपकी भाषा में वाक्य विन्यास 6 शब्दों से ज्यादा नहीं होना चाहिए और हमारी लंबी-लंबी 3 पन्नों वाली स्क्रिप्ट को अपनी सूझबूझ और काबिलियत के आधार पर 70-75 सेकेंड की स्टोरी में तब्दील करने में उन्हें महारत हासिल थी। हम कई बार नाराज़ भी होते थे कि इन्होंने तो सब काटपीट दिया। लेकिन रात 10 बजे जब अपनी स्टोरी टीवी स्क्रीन पर ऑन एयर देखते थे तो संतोष से लबरेज होते थे कि हमने अपनी लंबी स्क्रिप्ट में जो बातें कहनी चाही थीं, वो सब यहां उनके छोटे एडिटेड स्क्रिप्ट में बखूबी सुरक्षित थीं।

टेलीविज़न और खासकर टेलीविज़न न्यूज़ कम से कम समय में रफ़्तार के साथ-साथ सटीक चाक्षुस माध्यम है। न्यूज़ के इस माध्यम में ज्ञान और बौद्धिकता के लिए बहुत कम जगह है। यह घनघोर मेहनत और मशक्कत का माध्यम है। यह विजुअल और म्यूजिक के माध्यम से आपको खबरों की दुनिया की सैर कराता है, इसलिए यहां ज्ञान और भावुकता से ज्यादा संवेदना और बौद्धिकता से ज्यादा तत्पर/त्वरित विवेक की पहचान है। इस माध्यम से खब़रों के साथ रफ़्तार का होना ज़रूरी है इसलिए यहां विश्वसनीयता के खतरे भी ज्यादा हैं। इस विश्वसनीयता को बनाए रखने का जिम्मा रिपोर्टर के पास ही है इसलिए इस किताब की अहमियत और ज्यादा हो जाती है। यह किताब इस ओर बहुत संजीदगी से इशारा करती है और इसलिए अध्याय 5 से लेकर अध्याय 11 तक की विषयवस्तु में समाचार संग्रह, स्टोरी प्लानिंग और स्ट्रक्चर, साक्षात्कार, स्क्रिप्ट और फील्ड में रिपोर्टर जैसे अध्यायों में अनछुए पहलुओं पर बहुत बारीकी से और संजीदगी के साथ प्रकाश डाला गया है। विश्वास मानिए, अभी से पहले इन उपर्युक्त तथ्यों पर इस नजरिए से कम से कम हिन्दी में तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। यहां एक महत्वपूर्ण बात। अध्याय 10 में स्टोरी स्ट्रक्चर शीर्षक के तहत लेखकों ने टेलीविज़न न्यूज़ के उन तमाम आयामों को तफशील से बताया है जो ज्यादातर इस्तेमाल में हैं; लेकिन पता नहीं कैसे यहां वे ‘वॉक-थ्रू स्टोरी’ स्ट्रक्चर की चर्चा भूल गए हैं।

मसलन, एक रिपोर्टर किसी ऐसी जगह पहुँचता है जहां वह है, उसका कैमरा है और कुछ नहीं। फिर दर्शकों तक 2-3 मिनट के न्यूज़ कैप्सूल के तौर पर जो खब़र पहुँचती है, वो वॉक-थ्रू है और आजकल इसका प्रचलन काफी आम है। लेकिन इस फॉर्मेट की चर्चा का न होना यहां खटकता है। लगे हाथ एक और मुद्दे की बात। टेलीविज़न न्यूज़ और खासकर 24 घंटों के निजी सैटेलाइट चैनलों में ब्यूरो नेटवर्क की अहम भूमिका होती है। न जाने क्यों, यह पहलू भी अनछुआ रह गया है कि ब्यूरो नेटवर्क में आने वाले रिपोर्टरों की चुनौतियां क्या हैं और वो न्यूज़ सेंटर में स्थापित रिपोर्टरों से कैसे अलग होते हैं? इसके अलावा एक और तरीका आजकल बहुत लोकप्रिय है। यह नेटवर्क स्टोरी या नेटवर्क रिपोटर्स के रूप में जाना जाता है। यानी किसी एक खास रिपोर्ट में यदि 03 या 04 अलग-अलग रिपोर्टर्स शामिल हुए हैं तो ये नेटवर्क स्टोरी का स्ट्रक्चर है और इसमें हर-रिपोर्टर रिले रेस दौड़ने वाले उस धावक की तरह है जहां हर एक को समान रफ्तार और क्षमता के साथ परफॉर्म करना होता है और अगर एक रिपोर्टर भी लड़खड़ाया तो रिपोर्ट धराशायी। फिर इस तरह की रिपोर्टिंग की चुनौतियां और उनके आयाम क्या हैं? स्टार न्यूज़ पर चलने वाला एक बहुत ही लोकप्रिय बुलेटिन-24 घंटे, 24 रिपोर्टर उसी कड़ी की एक शानदार मिशाल है, जो स्टोरी न होकर पूरा का पूरा बुलेटिन है और दर्शकों का यह खासा पसंदीदा कार्यक्रम है।

टेलीविजन न्यूज़ बाईट क्लचर का माध्यम है। टेलीविज़न की खबरों या स्टोरी में बाईट (व्यक्ति विशेष द्वारा दिया गया वक्तव्य) का खासा महत्व है। इसी बाईट कल्चर का विलक्षण प्रयोग लेखकद्वय ने इस पुस्तक में भी किया है। अध्याय की बारीकियों से रु-ब-रु कराने के लिए व्यावहारिक अनुभवों का सहारा कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के हवाले से लिया है। बाईट के फार्म में उन्हें वक्तव्य के रूप में लगभग हर अध्याय में शामिल किया गया है। वैसे तो शैलेश ने अपनी प्रस्तावना में कई वरिष्ठ पत्रकारों के नाम गिनाए हैं, लेकिन जो तीन प्रमुख नाम बाईट के बहाने लगातार चलते हैं वे-परवेज़ अहमद, आशुतोष और प्रबल प्रताप सिंह हैं। यहां एक नाम बहुत झटके से खटकता है और वह नाम प्रबल प्रताप का है। प्रबल की जगह अगर उन्होंने दीपक चौरसिया को लिया होता और उसके वक्तव्य/अनुभव शामिल किए होते तो मेरी समझ से किताब की धार और धारा देखते ही बनती! प्रबल के पास आज भी बेचने के लिए उनका 10-12 साल पुराना अफगानिस्तान ही है; जबकि दीपक की फेहरिस्त लंबी ही नहीं अनगिनत है। जब आप ऐसे किसी किताब को भारतीय टेलीविज़न फलक पर डालते हैं तो सरलीकरण और पूर्वाग्रह से बचने की जरूरत होनी चाहिए, अन्यथा सरोकारों के भरा न्याय नहीं होता। मसलन, तुलनात्मक तौर पर ही देखें तो यह ऐहसास होता है कि दो कमेंटेटर तो धोनी (आशुतोष) और युवराज सिंह (परवेज़ साहब) हैं मगर तीसरा मुझे मुहम्मद कैफ (प्रबल) सा लगता है। यहीं अगर दीपक चौरसिया या रवीश कुमार या पुण्य प्रसून वाजपेयी होते तो आप इसकी शानदार बानगी के कायल होते!

किताब में कई तस्वीरें भी हैं जो स्टूडिया और न्यूज़ रूम से लेकर साक्षात्कार और फील्ड सिचुएशन या रिपोर्टर की स्थिति को दर्शाती हैं। लेकिन यहां ज्यादातर तस्वीरें जबरन या बेमानी लगती हैं। तस्वीरों के साथ कैप्शन का अभाव भी खटकता है। इसके अलावा इन तस्वीरों का संदर्भ भी स्पष्ट नहीं है। तस्वीरों को पाठकों के विवेक पर छोड़ा गया है कि स्क्रीन टेक्स्ट को देखकर आप अनुमान लगा लें कि ये तस्वीरें क्या कहना या बताना चाहती हैं? इससे भी ज्यादा जो बात खटकती है वह यह है कि, किताब में छापी गई सारी तस्वीरें एक ही हिन्दी न्यूज़ चैनल प्ठछ.7 की हैं। उन्हीं के स्क्रीन, रिपोर्टर, एंकर, स्टूडियो, इंटरव्यू, प्रोड्यूसर और न्यूज़ रूम। कैजुअल एप्रोच (सरलीकरण) की ये पराकाष्ठा है। इसलिए सरसरी निगाह में देखने पर ये किताब प्ठछ.7 का मैन्युअल या स्टाइलबुक का आभास देती है। अब यहां दो बातें। यदि तस्वीरें लेनी ही थीं तो आज तक, एनडीटीवी इंडिया और स्टार न्यूज़, हर जगह से लेकर डालते तो इस एकरसता से बचा जा सकता था और संतुलन भी होता। लेकिन इससे भी बेहतर यह होता कि इन तस्वीरों की जगह टेलीविजन न्यूज़ व्यवहार और व्यापार से जुड़े मानकों, मसलन सैटेलाइट, अपलिंक, डाउनलिंक, ओबी वैन, एमसीआर, पीसीआर के साथ-साथ इस व्यवस्था से जुड़ी और उन्हें चलाने वाली मशीनरी और संसाधनों की तस्वीरें या ग्राफिक्स शामिल किए जाते। विदेशों में इस तरह की व्यवहार कुशल शैक्षणिक व्यावसायिक पुस्तकों का खासा प्रचलन है। हमें इस मसले पर उनसे सीख लेने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि किताब के एक लेखक ब्रजमोहन, चूंकि प्ठछ.7 से जुड़े पत्रकार/प्रोड्यूसर हैं सो उन्होंने अपनी जगह का भरपूर इस्तेमाल किया है। चाहे मसला प्रबल के चयन का हो या सामग्री इकट्ठा करने का।

किताब में अध्याय 16 और 17 रिपोर्टर की लक्ष्मण रेखा और टेलीविजन के तकनीकी शब्द इसकी जान हैं। हालांकि इन तमाम खूबियों के बावजूद भारतीय टेलीविजन, खासकर हिन्दी न्यूज़ चैनलों में अवांछित आए कुछ कंटेंट प्रोफाईल और ‘ग्रे-मैटर’ को नज़र अंदाज करने की कोशिश हुई है लेकिन उससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। हालांकि एक रिपोर्टर की साख और न्यूज़ चैनलों की विश्वसनीयता जैसे ज्वलंत मुद्दे इससे जुडे़ रहे हैं। यहां एक और बात का जिक्र मैं लाज़िमी समझता हूँ। किताब के आखिर में अगर टेलीविज़न न्यूज़ और प्रोग्रामिंग में फर्क पर एक अध्याय जोड़ देते तो उन रिपोर्टरों के लिए वह अध्याय खासा सहायक होता कि अपनी 02 मिनट की रिपोर्ट को 30 मिनट के प्रोग्राम में कैसे बदला जाए? इसके अलावा किताब में 20-25 पृष्ठ और बढ़ाते हुए अगर 02-03 ‘टॉप टॉक्ड’ स्टोरी की स्क्रिप्ट भी समाहित कर दी जाती तो ये ‘टॉप प्रेफर्ड रिपोर्टर्स मैन्युअल’ का दर्ज़ा पा जाती। हालांकि किताब के पृष्ठ 95-97 पर दो स्क्रिप्ट फॉर्मेट शामिल हैं मगर वह सिर्फ खानापूर्ति का अहसास कराती हैं।

बहरहाल, इन तमाम बिन्दुओं के बावजूद हिन्दी टेलीविजन रिपोर्टरों के लिए यह एक अभूतपूर्व शानदार तेाहफा है। किताब की छपाई, गेटअप, साज-सज्जा और प्रस्तुतीकरण बेहतर है और वाणी प्रकाशन अगर इससे आधी कीमत के साथ पेपर बैक संस्करण भी बाज़ार में उतारे तो दूर-दराज में बैठे कस्बाई पत्रकारों का भी भला होगा। आखिर में, पुस्तक विमोचन समारोह में प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष और न्यायविद् मार्कंडेय काटजू ने इस किताब को टेलीविज़न पाठ्यक्रम में शामिल करने की सलाह दी तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए और अगर इसे अमली जामा पहना दिया गया तो हिन्दी टेलीविजन न्यूज़ रिपोर्टिंग का सर्वांगीण विकास ही होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

लेखक राकेश शुक्‍ला टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनकी यह समीक्षा महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय की समीक्षा पुस्तिका ‘पुस्‍तक वार्ता’ से साभार लिया गया है.

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