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हम खुद ज़िम्मेदार होते हैं….

जब हम सभी छोटे से थे तब हमने पढ़ाई के दौरान विज्ञान को एक विषय के तौर पर पढ़ा था और जब भी हम विज्ञान में कोई नया अध्याय पढ़ते थे तब उस अध्याय के अंत में एक लाइन में लिखा रहता था आओ कर के सीखें या आओ करके देखें और हम उसे जाकर तब प्रयोगशाला में करके देखते भी थे और अधिक से अधिक जानकारी भी प्राप्त करते थे उसी तरह आज 3 जी युग में आज के युवा भी ऐसे ही हो गए हैं वो सब काम आज उन लाइन पर करते हैं कि आओ कर के देखें.

जब हम सभी छोटे से थे तब हमने पढ़ाई के दौरान विज्ञान को एक विषय के तौर पर पढ़ा था और जब भी हम विज्ञान में कोई नया अध्याय पढ़ते थे तब उस अध्याय के अंत में एक लाइन में लिखा रहता था आओ कर के सीखें या आओ करके देखें और हम उसे जाकर तब प्रयोगशाला में करके देखते भी थे और अधिक से अधिक जानकारी भी प्राप्त करते थे उसी तरह आज 3 जी युग में आज के युवा भी ऐसे ही हो गए हैं वो सब काम आज उन लाइन पर करते हैं कि आओ कर के देखें.

 

आज समाज में बढ़ता भ्रष्टाचार, चोरी, लूट, अहिंसा सब शायद इस लाइन का ही परिणाम हैं जो उभर कर अच्छी तरह हमारे सामने आ रहा है. आज हमारे समाज में बढ़ती बेरोजगारी का भी इसी लाइन से कहीं न कहीं बहुत मतलब है. आज इन सब के पीछे भी बस हम ही ज़िम्मेदार हैं. मेरे कहने का पूरा मतलब ये है की आज हम अपने बच्चों को जो अपने युवा पीढ़ी में कदम रखने जा रहे हैं हम उनको ये बताते हैं की चोरी करना गलत बात है या चोरी करना पाप के समान है पर चोरी करना क्यों और कैसे गलत है ये कभी नहीं बताते और इसी भटकन से आज के जिज्ञासु युवा इन लाइनों का अनुसरण करते हैं कि आओ करके देखें. माता पिता बच्चों को ये तो बताते हैं कि गलत काम मत करो या नहीं करना चाहिए पर ये कभी नहीं बताते कि क्यों नहीं करना चाहिए? जिससे बच्चे ये जानने में लग जाते हैं कि चलो हम करके देखें. उनको ये नहीं बताया जाता की उन गलत कामों को करने से उन्हें क्या क्या नुकसान पहुंचेगा. उन्हें ये काम क्यों नहीं करना चाहिए? इसलिए आज हमारी युवा पीढ़ी कहीं न कहीं बरबादी की सीढ़ी चढ़ती नज़र आ रही है और इन सब के पीछे हमारा ही हाथ है क्योंकि किसी कार्य को करने से रोकना उसमें और जिज्ञासा पैदा करना होता है.

अगर खुद पर रख के सोचा जाये तो जब हम छोटे बच्चे थे और माता पिता किसी काम को करने से मना करते थे,तो लगता थे कि आओ ये कार्य करके देखें कि क्या होगा इस काम को करने से??…. बस इसी कसौटी पर खरे न उतरने पर इतना कुछ गलत हो जाता है कि हमारे पास पछतावे के बाद कुछ नहीं रह जाता है. अच्छा तो तब हो जब माता पिता उन बुराईयों के बारे में भी बच्चों को बताएं कि वो उनके द्वारा कैसे बच सकते हैं तभी तो जाकर वो प्रयोग न करें जिससे आज समाज में खतरे से बहुत हद तक हम और आप खुद बच सकते हैं. आज कल छोटे छोटे बच्चों में ये प्रवृति अक्सर पाई जाती है जिसका मन एक दम से अभी कच्चे घड़े के समान होता है.तो कहीं न कहीं अधिक से अधिक हम खुद ज़िम्मेदार होते हैं इन सभी तरह के मुद्दों में तो हमें ये ध्यान देना भी देना चाहिए की हम अपने बच्चों को कैसी शिक्षा आज के दिनों में दे रहे हैं और उससे भी बड़ी बात तो वो ऐसी हो जो उनके समझ के लायक हो. एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के साथ साथ उन्हें ये भी बताना बिलकुल जरूरी है कि वो गलत काम न करें और उससे भी ज्यादा ज़रूरी है की क्यों न करें, तब जाकर वो अपने प्रयोग करना बंद करेंगे और हम आप अपने को और भी सुरक्षित कर सकेंगे.

वाराणसी से नेहा श्रीवास्तवा

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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