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हर घर में हो चिराग, रोशनी चाहे कम ही हो

: रवीन्द्र रचना महोत्सव का दूसरा दिन : देशभर के कवियों ने सजाई बहुभाषीय काव्य गोष्ठी : जयपुर : शब्द राग रंग के रवीन्द्र रचना महोत्सव के दूसरे दिन यहां जवाहर कला केन्द्र के कृष्णायन सभागार में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं का पाठ हुआ। यहां टैगोर की कृष्णकलि, दो पंछी, यात्रा, त्राण, प्राण समेत कई चर्चित कविताओं का पाठ हुआ। राजस्थान के प्रख्यात कवि ऋतुराज ने समारोह की अध्यक्षता करते हुए कहा कि यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दुस्तान के हर आदमी के दिल में कहीं न कहीं टैगोर और महात्मा गांधी बसते हैं। टैगोर की कविताओं के पाठ में तकरीबन एक दर्जन लोग शामिल हुए। इसके बाद कार्यक्रम का दूसरा पड़ाव रहा काव्य संगोष्ठी। इस बहुभाषीय काव्य संगोष्ठी में राजस्थान ही नहीं देश के कोने कोने से आए डेलिगेट्स ने अपनी अपनी भाषाओं में कविता पाठ किया।

: रवीन्द्र रचना महोत्सव का दूसरा दिन : देशभर के कवियों ने सजाई बहुभाषीय काव्य गोष्ठी : जयपुर : शब्द राग रंग के रवीन्द्र रचना महोत्सव के दूसरे दिन यहां जवाहर कला केन्द्र के कृष्णायन सभागार में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं का पाठ हुआ। यहां टैगोर की कृष्णकलि, दो पंछी, यात्रा, त्राण, प्राण समेत कई चर्चित कविताओं का पाठ हुआ। राजस्थान के प्रख्यात कवि ऋतुराज ने समारोह की अध्यक्षता करते हुए कहा कि यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दुस्तान के हर आदमी के दिल में कहीं न कहीं टैगोर और महात्मा गांधी बसते हैं। टैगोर की कविताओं के पाठ में तकरीबन एक दर्जन लोग शामिल हुए। इसके बाद कार्यक्रम का दूसरा पड़ाव रहा काव्य संगोष्ठी। इस बहुभाषीय काव्य संगोष्ठी में राजस्थान ही नहीं देश के कोने कोने से आए डेलिगेट्स ने अपनी अपनी भाषाओं में कविता पाठ किया।

आदिल राजा मंसूरी ने अपनी नज्म लिबास में जीवन का फलसफा बताया। लटका दिया दिन खूंटी पर हैंगर से उतारी रात पहनने को, दिन और रात हो गए कितने पुराने, अगले सफर के लिए कौनसा लिबास मुनासिब होगा, उनके शब्द थे। जयपुर के कवि किशोर पारीक ने मायड भाषा में सुनाया- हंसी ठहाका लल्लड, बंगड, झूला मचका झोंटा दे, पतंग उडाऊं डांटे अम्मा, तिल का लड्डू मोटा दे। रश्मि भार्गव ने प्यास से पहले कविता सुनाई। अलवर से आए रेवती रमन शर्मा ने 42 शब्दों की कविता में मंदिर के मूक पाषाणों और बाहर खेजड़ली पर चहचहाती चिडिय़ा की कहानी कविता में सुनाई। डॉ. हरि राम आचार्य ने संस्कृत में कविता पाठ किया। तत्र जागतु नित्यं मदिय मन:, यत्र विश्व भवते नीडम प्रभू: के जरिए उन्होंने विश्व शांति पर अपने उदगार व्यक्त किए। हरीश करमचंदानी ने सिंधी में कविताएं सुनाईं। उनकी पहली कविता का अनुवाद, एक बच्चा खुश था खरीद कर गुब्बारा, एक बच्चा खुश हुआ बेचकर गुब्बारा, सुन जवाहर कला केन्द्र के कृष्णायन में तालियां गूंज उठी। फार्रुख इंजीनियर ने हर जगह ये आशियाना किस का है, जर्रे जर्रे में ठिकाना किसका है नज्म सुनाई। कवि गोविंद माथुर ने कम कम शीर्षक से दो कविताएं सुनाईं। उनकी ये पंक्ति यादगार बन गईं कि हर घर में हो चिराग, रोशनी चाहे कम ही मिले। विनोद परदज ने जन्मदेने वाली और पालने वाली स्त्रियों को अपनी कविता समर्पित की। कोलकाता से आए मृगांक ने बांग्ला में कविता पाठ किया। देवदीप ने हिन्दी में लघु कविताएं सुनाईं। मनोहरपुर के कैलाश मनहर ने पुराना शहर अभी पुराना ही है कविता से समा बांध दिया। कवि ऋतुराज ने रवीन्द्रनाथ टैगोर को समर्पित कविताएं सुनाईं।

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